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ब्रिटिश काल में जब्त की गई हनुमान जी की मूर्ति आज भी पुणे पुलिस के कब्जे में

अब तक पुलिस रिकॉर्ड में जप्त वस्तु के रूप में दर्ज

इसी मूर्ति के सामने नतमस्तक होकर चापेकर बंधुओं ने भारतमाता की स्वतंत्रता की शपथ ली थी!

संपादकीय टिप्पणी
क्रांतिकारियों की आस्था के प्रतीक को संरक्षित करने के बजाय उसे ‘मुद्देमाल’ मानकर रखना अत्यंत दुखद है। इस मूर्ति को कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से मुक्त कर किसी भव्य मंदिर में सार्वजनिक दर्शन हेतु स्थापित क्यों नहीं किया जाता?
— संपादक, हिंदू जनजागृति समिति
संपादकीय टिप्पणी
अब इस मूर्ति की मुक्ति के लिए हिंदू समाज को संगठित होकर आवाज उठाना आवश्यक है। - सम्पादक, हिन्दू जनजागृति समिति
— संपादक, हिंदू जनजागृति समिति

पुणे – जिस श्री हनुमान जी की मूर्ति के सामने नतमस्तक होकर क्रांतिकारी चापेकर बंधुओं ने भारतमाता की स्वतंत्रता की शपथ ली थी, वही मूर्ति स्वतंत्रता के 78 वर्षों बाद भी पुणे के फरासखाना पुलिस स्टेशन में ‘मुद्देमाल’ के रूप में रखी गई है। धर्माभिमानी और इतिहासप्रेमियों ने इस मूर्ति की सम्मानपूर्वक स्थापना करने की मांग की है।

एक समाचार पत्र के प्रतिनिधि द्वारा इस मूर्ति के बारे में पूछे जाने पर पुलिस ने बताया कि यह मूर्ति ‘जप्त की गई वस्तु’ (मुद्देमाल) के रूप में दर्ज है और न्यायालय के आदेश के बिना इसे किसी को नहीं दिया जा सकता। पुणे में हजारों हनुमान भक्त होने के बावजूद इस ऐतिहासिक मूर्ति की मुक्ति के लिए अब तक कोई आगे नहीं आया है। चूंकि यह मूर्ति पुलिस स्टेशन में है, इसलिए आम लोगों को वहां आसानी से प्रवेश नहीं मिलता। केवल पुलिस कर्मचारी ही इसकी पूजा-अर्चना करते हैं।

इतिहासकार डॉ. पांडुरंग बलकवडे के अनुसार, पेशवा काल में फरासखाना का स्थान कपड़े रखने का गोदाम था। अंग्रेजों ने वहां पुलिस स्टेशन स्थापित किया। रैंड की हत्या के बाद चापेकर बंधुओं को यहीं के कारागार में रखा गया था। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, मारुति (हनुमान) की यह मूर्ति उसी काल में पुलिस के कब्जे में आई।

इतिहास क्या बताता है…

क्रांतिकारी दामोदर चापेकर और बालकृष्ण चापेकर ने अत्याचारी ब्रिटिश अधिकारी डब्ल्यू.सी. रैंड की हत्या से पहले इसी हनुमान मूर्ति के सामने शपथ ली थी। वे इसी मूर्ति के सामने निशानेबाजी का अभ्यास भी करते थे। रैंड की हत्या के बाद क्रोधित अंग्रेजों ने चापेकर बंधुओं को गिरफ्तार किया और बदले की भावना से इस मूर्ति को भी साक्ष्य के नाम पर जब्त कर पुलिस स्टेशन में जमा कर दिया।

स्वतंत्रता के बाद भी कई वर्षों तक यह मूर्ति पुलिस के ‘मुद्देमाल कक्ष’ में ही रही। एक हनुमान भक्त पुलिस कर्मचारी ने इसकी पूजा शुरू की, जिसके बाद धीरे-धीरे पुलिस स्टेशन के भीतर ही एक छोटा मंदिर बना दिया गया। आज भी हर शनिवार को पुलिस कर्मचारी इस मूर्ति की पूजा करते हैं।

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