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सिंधुदुर्ग जिले के बंद मंदिरों के द्वार खुले, गांवों में फिर गूंजी घंटियों की आवाज!

बाईं ओर पहली पंक्ति में सर्वश्री सुनील परब, दत्ताराम राऊळ, संजय जोशी, सद्गुरु सत्यवान कदम, राजेंद्र पाटील, शिवराम गावडे, दीपक गावडे; तथा पीछे की पंक्ति में सर्वश्री घनश्याम राणे, यशवंत परब, विलास गावडे, गोविंद परब, रामचंद्र चव्हाण उपस्थित थे।

सिंधुदुर्गनगरी: दशकों के आंतरिक मतभेदों, मानकरियों (पारंपरिक सेवादारों) के बीच समन्वय की कमी और मार्गदर्शन के अभाव के कारण सिंधुदुर्ग जिले के जो मंदिर ताले में बंद थे, उनमें ‘महाराष्ट्र मंदिर महासंघ’ के प्रयासों से फिर से चैतन्य की घंटियां गूंजने लगी हैं। महासंघ द्वारा आयोजित नामसत्संग, माणगांव में जिला स्तरीय मंदिर परिषद और प्रत्यक्ष संवाद की त्रिसूत्री के कारण घारपी का बंद मंदिर खुला, माडखोल के बिखरे हुए मानकरी एकजुट हुए, और पडवे, ओसरगांव व उगाडे के देवस्थानों ने सुप्रबंधन और धर्मरक्षा का मार्ग अपनाया है। आध्यात्मिक हानि को रोकने के लिए महासंघ द्वारा खड़ी की गई यह संगठन शक्ति जिले के लिए प्रेरणादायी सिद्ध हो रही है। यह जानकारी महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के श्री. संजय जोशी ने एक पत्रकार वार्ता में दी।

 

​पत्रकार वार्ता में सनातन संस्था के धर्मप्रचारक सदगुरु सत्यवान कदम, मंदिर महासंघ के श्री. शरद राऊळ, श्री. यशवंत परब, हिंदू जनजागृति समिति के श्री. राजेंद्र पाटील और विभिन्न मंदिरों के मानकरी उपस्थित थे।

पत्रकार वार्ता के मुख्य बिंदु

​घारपी (सावंतवाडी): २० साल का गतिरोध समाप्त। दो दशकों से बंद पड़े ग्रामदेवता के मंदिर को महासंघ के समन्वय प्रयासों से पुनः खोल दिया गया है।

माडखोल (सावंतवाडी): ‘नामसत्संग’ के माध्यम से मानकरियों में एकता आई और मंदिर का प्रबंधन सुचारू हुआ।

पडवे एवं ओसरगाव (कुडाळ): जिला मंदिर परिषद से प्रेरणा लेकर यहां के ट्रस्टी अब प्राचीन परंपराओं की रक्षा के लिए सक्रिय हो गए हैं।

​उगाडे (दोडामार्ग): सुप्रबंधन के अंतर्गत ‘वस्त्र संहिता’ (ड्रेस कोड) लागू की गई और धर्मशिक्षा के माध्यम से सात्विक वातावरण निर्मित किया गया।

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