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वृंदावन: बांके बिहारी मंदिर में स्टील रेलिंग लगाने का ठेका मुस्लिम ठेकेदार को दिए जाने के विरोध में संतों का प्रदर्शन

ठेकेदार द्वारा उसकी मूल पहचान छिपाकर ठेका प्राप्त करने का संतों ने लगाया आरोप

 

मथुरा (उत्तर प्रदेश) – यहां के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर परिसर एवं सुसज्जित मार्ग के मध्य लगाए जानेवाले स्टील रेलिंग लगाने का ठेका एक मुसलमान ठेकेदार को दिए जाने की जानकारी मिलते ही यहां के साधु-संतों एवं हिन्दू संगठनों ने ‘यह कृति धार्मिक आस्था पर किया गया आघात है’, ऐसा बताते हुए विरोध आरंभ किया है । संतों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर यह ठेका तुरंत निरस्त करने की तथा इसके उच्चस्तरीय जांच की मांग की । संतों ने यह आरोप लगाया है कि, इस ठेकेदार ने अपनी मूल पहचान छिपाकर यह ठेका प्राप्त किया है । संबंधित काम का ठेका मेरठ के ‘कनिका कंस्ट्रक्शन’, इस प्रतिष्ठान को दिया गया है । इस प्रतिष्ठान का मुख्य भागीदार सलीम मोहम्मद है, ऐसा बताया जा रहा है । कुछ लोगों के अनुसार इस भागीदार का नाम सलीम खान है तथा वह कांग्रेस का नेता है ।

संतों का यह कहना है कि, जहां परमपावन वातावरण में भगवान की नित्य सेवा चलती है, ऐसे मंदिर में गैरसनातनी व्यक्ति को निर्माणकार्य का दायित्व देना हमारी परंपराओं के विरुद्ध है । ‘श्रीकृष्णजन्मभूमी संघर्ष न्यास’के अध्यक्ष दिनेश फलाहारी महाराज ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि सनातन धर्म को न माननेवाले तथा गोमांस खानेवाले लोग कभी भी ब्रजवासियों के लिए स्वीकार्य नहीं होंगे । ये लोग हिन्दुओं को ‘काफिर’ (इस्लाम को न माननेवाले मूर्तिपूजक) कहते हैं । ऐसे लोगों को मंदिर के प्रांगण से एक किलोमीटर तक भी अंदर आने नहीं देना चाहिए । भारत में कुशल हिन्दू ठेकेदारों का कोई अभाव नहीं है, तब भी पहले मंदिरों को ध्वस्त कर वहां नमाज पढनेवाले इन ‘मुघलों के वंशजों’ को ही यह काम क्यों दिया गया ?, यह प्रश्न भी उन्होंने उठाया ।

यह ठेका देने में मथुरा के एक अतिरिक्त जिलाधिकारी स्तर के अधिकारी का हाथ होने की चर्चा है । कोरोना महामारी के समय में इसी प्रतिष्ठान को भोजन वितरण का ठेका दिए जाने का भी उल्लेख किया जा रहा है ।

व्यवस्थापन समिति ने रक्षा अपना पक्ष

बांके बिहारी मंदिर की हाई पॉवर व्यवस्थापन समिति के सदस्य शैलेंद्र गोस्वामी ने उनका पक्ष रखते हुए कहा, ‘यह ठेका लेनेवाले प्रतिष्ठान का मालिक मुसलमान है, इसकी आधिकारिक जानकारी मुझे नहीं थी ।’ आगे जाकर गोस्वामी ने यह भी तर्क दिया कि ‘बांके बिहारीजी के प्राकट्यकर्ता (जिनके माध्यम से कोई दैवीय रूप, देवता अथवा तत्त्व विश्व के सामने प्रकट हुआ, वह व्यक्ति) स्वामी हरिदास के दर्शन करने हेतु तथा उनका संगीत सुनने हेतु मुघल सम्राट अकबर भी यहां आया था । संतों ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दर्शन करना तथा मंदिर के गर्भगृह के पास निर्माण कार्य करना, इसमें आकाश-पाताल का अंतर है, यह स्पष्ट किया ।

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