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सहारनपुर (उत्तरप्रदेश) : प्राणनाथ ज्ञानपीठ वार्षिकोत्सव में हिन्दू जनजागृति समिति का सहभाग

सनातन संस्कृति की शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा है ! – सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळे

सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) – मनुष्य योनि सर्व योनियों में सर्वोच्च है । मनुष्य योनि में जन्म लेने के उपरांत व्यक्ति के इस जन्म का उद्देश्य क्या है ? तथा उसे वह कैसे साध्य करे, यह प्रश्न निर्माण होने पर ही मनुष्य के जन्म की यात्रा आरंभ होती है । आज सनातन संस्कृति की शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा रखनेवाले अत्यंत सीमित हैं । आज के तम प्रधान काल में अधिकतर पशुवृत्तिवालोें का मनुष्य देह में जन्म हो रहा है – चाहे मांसाहार हो, शराब हो, तामसिक वृत्ति हो, ईर्ष्या हो, स्पर्धा हो, अहंकार हो । यह सभी इसी बात के लक्षण हैं । जैसे पशुओं में भाईचारा नहीं होता, वैसा वातावरण आज निर्माण हो गया है ।

सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में आयोजित प्राणनाथ ज्ञानपीठ वार्षिकोत्सव में उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु चारुदत्त पिंगळेजी ने कहा कि ‘‘संसार में कुछ गिनती के ही जीव होते हैं, जो योग्य संस्कार लेकर जन्म लेते हैं एवं जिनका जन्म दिव्य कार्य करने के लिए होता है । हमारी शिक्षा घर से आरंभ होती है, माता पिता शिक्षित होंगे, तो ही योग्य संस्कार अगली पीढी तक पहुंच पाएंगे । परन्तु आज माता-पिता बहुत व्यस्त हैं, उन्होंने बच्चों को टी.वी. तथा मोबाइल दे दिया है । इसलिए बच्चों में अनुचित संस्कार निर्माण हो रहे हैं ।

आज बच्चा स्वधर्म-स्वकर्तव्य को समझे बिना, अपनी धर्म परंपरा को समझे बिना, अपनी मातृ संस्कृति को समझे बिना, आधुनिक शिक्षा ले रहा है । यह अयोग्य है ।

जिस प्रकार वृद्ध पशु को काम होने के बाद स्लॉटर हाउस को बेच दिया जाता है, उसी प्रकार आज पाश्चात्य परंपरा का अनुकरण कर वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम में भेजा जा रहा है । वर्तमान शिक्षा प्रणाली में ऐसा एक भी विषय नहीं है, जो हमें तनाव आने पर, अस्वस्थ लगने पर, जीवन में संकट आने पर, ऐसी अनेक  प्रतिकूल परिस्थितियों में मन को स्थिर रखने की शिक्षा देता हो अथवा जीवन में संकट आए, तो स्वयं को संयमित तथा स्थिर रखकर संकट का सामना करने की दिशा दे ।

जिस पाश्चात्य संस्कृति को हम आसुरी संस्कृति कहते हैं, आज वह हमारे घर में द्वार खटखटाकर प्रवेश कर रही है । हम जो वर्तमान शिक्षा ले रहे हैं, वह योग्य नहीं है । उसमें भी विकृतियां हैं । आज की शिक्षा पद्धति से बच्चे असंयमित स्पर्धा सीखते हैं, ईर्ष्या सीखते हैं, द्वेष सीखते हैं । इसके विपरीत सनातन की शिक्षा एवं वेदों की शिक्षा, वह वृत्ति के स्तर पर सद्गुण, दिव्य गुण, आध्यात्मिक गुण, व्यापक वृत्ति, परोपकारी वृत्ति, एक-दूसरे का विचार करने की वृत्ति, एक-दूसरे के प्रति त्याग करने की वृत्ति निर्माण करने की प्रक्रिया सिखाती है । इसलिए वेदों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था को स्वीकार करने एवं उसका आचरण करने में ही हमारा कल्याण है ।

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