“अर्बन नक्सलवाद का बीज कांग्रेस ने ही बोया था” – माधव भांडारी, भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं प्रवक्ता

पुणे – वर्ष 1942 में स्वतंत्रता संग्राम सफल न हो, इसके लिए साम्यवादियों ने अंग्रेजों से हाथ मिलाया था, इसका उल्लेख इतिहास में मिलता है। उन्हीं अंग्रेजों के चापलूसों को सम्मान देने का कार्य पंडित नेहरू ने किया। चाहे बंगाल का नक्सलवाद हो या पंजाब की खालिस्तानी समस्या, कांग्रेस ने कभी भी उसका समाधान करने का ईमानदार प्रयास नहीं किया। आज देश के समक्ष खड़ी अर्बन नक्सलवाद की समस्या के असली जनक कांग्रेस ही हैं, ऐसा स्पष्ट प्रतिपादन भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं प्रवक्ता श्री. माधव भांडारी ने किया। परिसंवाद में हिन्दू जनजागृति समिति के श्री. सतीश कोचरेकर ने प्रास्ताविक किया और सूत्रसंचालन श्री. चैतन्य तागडे ने किया।
पुणे के टिळक स्मारक मंदिर में 19 अगस्त को ‘राष्ट्रभक्त अधिवक्ता समिति’ की ओर से ‘बढ़ता अर्बन नक्सलवाद और जनसुरक्षा कानून’ विषय पर विशेष परिसंवाद आयोजित किया गया। इस परिसंवाद में ‘असत्यमेव जयते’ और ‘डावी वाळवी’ पुस्तकों के प्रसिद्ध लेखक अभिजीत जोग, हिंदू विधिज्ञ परिषद के अध्यक्ष अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर, हिंदु जनजागृति समिति के राज्य संघटक श्री सुनील घनवट, लेखक-विचारक श्री विक्रम भावे और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रसाद काथे यह मान्यवर उपस्थित थे। पुणे जिले सहित पूरे राज्य से विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान, हिंदुत्वनिष्ठ और धर्मप्रेमी ऐसे एक हज़ार से अधिक राष्ट्रभक्त नागरिक भारी वर्षा की परवाह न करते हुए बड़ी संख्या में इस परिसंवाद में उपस्थित हुए।

इस अवसर पर श्री. सुनील घनवट ने कहा कि, अर्बन नक्सलवाद का मुकाबला करने के लिए हिंदुओं को अपना स्वयं का इकोसिस्टम खड़ा करना होगा। साम्यवादी आर्थिक बल पर आक्रमण करते हैं। पुरस्कार लौटा दिए लेकिन मिले हुए पैसे रख लिए – यह उनकी दोहरी नीति है। इसलिए हिंदुओं को संगठित होकर सक्रिय कदम उठाने की आवश्यकता है । श्री. अभिजीत जोग ने स्पष्ट किया कि, साम्यवादियों का मुख्य हथियार है समाज में निरंतर अराजकता पैदा करना। गरीब-अमीर, स्त्री-पुरुष के बीच संघर्ष खड़ा करना और भारतीय संस्कृति पर बार-बार आक्रमण करना यही उनकी नीति है। इसलिए इस संघर्ष का वैचारिक स्तर पर उत्तर देना आवश्यक है। अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने कहा कि, व्यवस्था की मानसिकता बदले बिना नए कानूनों का उपयोग सीमित रहता है। हिंदुओं को प्रत्येक कार्य में ईश्वरी अधिष्ठान रखना चाहिए। साथ ही जनसुरक्षा कानून को और अधिक कठोर एवं व्यापक स्वरूप देने के लिए आगे आना चाहिए। श्री. विक्रम भावे ने अनुभव साझा करते हुए बताया कि, कारागृह में रहते हुए मैंने प्रत्यक्ष देखा कि शहरी नक्सलवादी कैदियों के मन में भारतीय संस्कृति के विरुद्ध विष बो रहे थे। इसलिए इस संघर्ष में प्रत्येक को ‘हिंदू’ के रूप में खड़ा होना चाहिए।
परिसंवाद के सूत्रसंचालक श्री. प्रसाद काथे ने आवाहन किया कि, हिंदू संस्कृति का कोई विकल्प नहीं है। अन्य पंथों के अपने देश हैं; लेकिन हिंदुओं के लिए भारत के सिवा कोई दूसरा आधार नहीं। हमारे पूर्वजों ने कठिनाइयाँ झेली हैं; इसलिए अब हमें ही सजग होना होगा।








