परिवर्तिनी एकादशी के दिन करते हैं, भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा-अर्चना

भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को पद्मा एकादशी और परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। इस बार यह एकादशी ९ सितंबर यानी आज है। पद्म पुराण के अनुसार चतुर्मास के दौरान आने वाली एकादशी का महत्व देवशयनी और देवप्रबोधिनी एकादशी के समान है। इस दिन भगवान विष्णु चतुर्मास के शयन के दौरान करवट लेते हैं इसलिए देवी-देवता भी इनकी पूजा करते हैं।

पुराण के अनुसार इस एकादशी पर व्रत और पूजन करने से पापों का नाश होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है और इच्छापूर्ति होती है। इस दिन भक्तों को भगवान विष्‍णु के वामन रूप की पूजा करनी चाहिए।

पद्म पुराण में वर्णित कथाओं के अनुसार, युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से एकादशी व्रत के महत्व को विस्तार से समझाने की विनती की। इस पर वासुदेव श्रीकृष्ण ने उन्हें सभी एकादशी का महत्व बताया। इसी क्रम में भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी की कथा और महत्व को श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस प्रकार समझाया…

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा, हे वासुदेव ! भाद्रपद शुक्ल पक्ष में आनेवाली एकादशी का क्या नाम है ? इसकी व्रत और पूजा विधि एवं इसका महात्म्य विस्तार से बताएं। तब भगवान श्नीकृष्ण ने युधिष्ठिर की विनती स्वीकार की और बोले, हे युधिष्ठिर भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में आनेवाली एकादशी को पद्मा एकादशी और परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। इस एकादशी पर व्रत और पूजन करने से पापों का नाश होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है और इच्छापूर्ति होती है। इस दिन भक्तों को मेरे वामन रूप की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद भगवान युधिष्ठिर को पूजा विधि, व्रत का महत्व और व्रत कथा सुनाते हैं।

त्रेतायुग में बली नामक एक असुर राजा था, परंतु वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों और याचनाओं से प्रतिदिन भगवान का पूजन किया करता था। नित्य विधिपूर्वक यज्ञ आयोजन करता और ब्राह्मणों को भोजन कराता था। वह जितना धार्मिक था उतना ही शूरवीर भी। एक बार उसने इंद्रलोक पर अधिकार स्थापित कर लिया।

स्वर्ग लोक देवताओं से छीन जाने से देवतागण परेशान होकर भगवान विष्णु के पास गए। देवगुरु बृहस्पति सहित इंद्र देवता प्रभु के निकट जाकर हाथ जोडकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान की स्तुति करने लगे। तब भगवान विष्णु ने उनकी विनती सुनी और संकट टालने का वचन दिया। अपने वचन को पूरा करने के लिए उन्होंने वामन रूप धारण करके अपना पांचवां अवतार लिया और राजा बली से सब कुछ दान स्वरूप ले लिया।

भगवान वामन का रूप धारण करके राजा बली द्वारा आयोजित किए गए यज्ञ में पहुंचे और दान में तीन पग भूमि मांगी। इस पर राजा ने वामन का उपहास करते हुए कहा कि इतने छोटे से हो, तीन पग भूमि में क्या पाओगे। लेकिन वामन अपनी बात से अडिग रहे। इस पर राजा ने तीन पग भूमि देना स्वीकार किया और दो पग में धरती और आकाश माप लिए। इस पर वामन ने तीसरे पग के लिए पूछा कि राजन अब तीसरा पग कहां रखूं, इस पर राजा बली ने अपना सिर आगे कर दिया, क्योंकि वह पहचान गए थे कि वामन कोई और नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं।

वामन रूप में मौजूद भगवान विष्णु राजा बली की भक्ति और वचनबद्धता से अत्यंत प्रसन्न हो गए और राजा बली को पाताल लोक वापस जाने के लिए कहा। इसके साथ ही भगवान विष्णु ने राजा बली को वरदान दिया कि चतुर्मास अर्थात चार माह में उनका एक रूप क्षीर सागर में शयन करेगा और दूसरा रूप राजा बली के साथ पाताल में उस राज्य की रक्षा के लिए रहेगा।

इस दिन राजा बली ने भगवान से अपने साथ रहने का वर मांगा तो भगवान बली के साथ पाताल लोक में रहने चले गए। धार्मिक मान्यताएं हैं कि इस दिन भगवान विष्णु करवट लेते हैं, इसलिए इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। जो लोग विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है और सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं। इस दिन भगवान को कमल अर्पित करने से भक्त उनके और अधिक निकट आ जाता है। इस दिन व्रत और पूजन करने से ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन करने का पुण्य प्राप्त होता है। अत: इस एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।

दान का महत्‍व

एकादशी पर दान का विशेष महत्व है। धार्मिक आस्थाओं के आधार पर इस एकादशी के दिन चावल, दही, तांबा और चांदी की वस्तु का दान करना अतिशुभ फलदायी होता है।

पूजन विधि

इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठें और स्नान के बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन करें। भगवान को स्नान कराएं, फूल-पत्तों और खासकर कमल के फूल से उनका मंदिर सजाएं। रोली का तिलक लगाकर अक्षत अर्पित करें और मिठाई से भोग लगाएं। विष्णु और लक्ष्मीजी की आरती करें। इस दिन रात्रि में भजन-कीर्तन करने का विशेष महत्व है।

स्त्रोत : नवभारत टाइम्स

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