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एक बार फिर अमेरिकी प्रोफेसर को माघ मेले में खींच लाई भगवान शिव की नगरी

प्रोफेसर ब्राइन के. पेनिंग्टन बाडाहाट (उत्तरकाशी) के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व पर एक किताब लिख रहे हैं। इसके लिए प्रो.ब्राइन ने लंदन की एक लाइब्रेरी से बाडाहाट से जुडे तथ्य भी जुटाए हैं। बाडाहाट उत्तरकाशी का पौराणिक नाम है, जिसका अर्थ है ‘बडा बजार’ ! वर्ष १९६२ के भारत-चीन युद्ध से पहले तिब्बत के व्यापारी बाडाहाट में ही मंडी लगाते थे। इन्हीं स्मृतियों को संजोने के लिए वर्तमान में माघ आयोजित किया जाता है !

अमेरिका के ऐलोन विश्वविद्यालय में सीनियर प्रोफेसर ब्राइन के. पेनिंग्टन एक बार फिर माघ मेले में आए हैं ! वह उत्तरकाशी के इतिहास एवं संस्कृति को संजोने यहां आए हैं !

उत्तरकाशी : अमेरिका के ऐलोन विश्वविद्यालय में धार्मिक इतिहास विषय के सीनियर प्रोफेसर ब्राइन के. पेनिंग्टन को भगवान शिव की नगरी उत्तरकाशी एक बार फिर माघ मेले (बाडाहाट का थौलू) में खींच लाई है। इस बार वह केवल मेले का हिस्सा बनने नहीं, बल्कि बाडाहाट (उत्तरकाशी) के इतिहास एवं संस्कृति को संजोने यहां आए हैं !

वह बाडाहाट के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व पर एक किताब लिख रहे हैं। इसके लिए प्रो. ब्राइन ने लंदन की एक लाइब्रेरी से बाडाहाट से जुडे तथ्य भी जुटाए हैं। बाडाहाट उत्तरकाशी का पौराणिक नाम है, जिसका अर्थ है ‘बडा बजार’ ! वर्ष १९६२ के भारत-चीन युद्ध से पहले तिब्बत के व्यापारी बाडाहाट में ही मंडी लगाते थे। इन्हीं स्मृतियों को संजोने के लिए वर्तमान में माघ आयोजित किया जाता है।

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वर्ष २००६ में प्रो. ब्राइन अमेरिका से जब पहली बार उत्तरकाशी आए तो इस शहर की पौराणिक पृष्ठभूमि ने उन्हें खासा प्रभावित किया। उन्होंने बाडाहाट का थौलू (मेला), यहां के मंदिर एवं मूर्तियों की पौराणिकता जानने के साथ ही क्षेत्र की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का अध्ययन भी किया। तब से वह लगातार बाडाहाट का थौलू देखने के लिए यहां आ रहे हैं। बकौल प्रो. ब्राइन, ‘वर्ष २००६ से लेकर अब तक यहां काफी बदलाव आ चुका है। अगस्त २०१२ व जून २०१३ में आयी आपदा के कहर को भी मैंने देखा है और उसके बाद हुए विकास कार्यों को भी देख रहा रहा हूं। मैं बाडाहाट की धर्म-संस्कृति पर एक किताब भी लिख रहा हूं, जिसका प्रकाशन जल्द होगा। पुस्तक को प्रामाणिक बनाने के लिए मैंने लंदन की लाइब्रेरी में भी कई इतिहासकारों की पुस्तकें पढ़ीं। साथ ही उत्तरकाशी के कई बुजुर्गों से भी बातचीत की है। यहां की देव डोलियों, प्राचीन मंदिरों और धार्मिक आयोजनों की परंपराओं के बारे में भी मैं जानकारी जुटा रहा हूं !’

प्रो. ब्राइन के अनुसार गंगा के मायके ने उन्हें उत्तराखंडी परंपराओं को जानने-समझने के लिए प्रेरित किया। अब उनका प्रयास रहेगा कि इन समृद्ध परंपराओं से पूरी दुनिया को परिचित कराएं। लगातार उत्तरकाशी आते रहने के कारण प्रो. ब्राइन हिंदी के साथ ही गढ़वाली भाषा को भी न केवल अच्छी तरह समझ लेते हैं, बल्कि बोलने भी लगे हैं। इस बार २३ जनवरी तक वह उत्तरकाशी में रहेंगे।

लोकगाथाओं की भी दे चुके हैं नाट्य प्रस्तुति

प्रो. ब्राइन बताते हैं कि जनवरी २०१५ के माघ मेले में भी वे उत्तरकाशी आए थे। तब उन्होंने यहां लोकगाथा पर आधारित नाटक ‘जीतू बगड्वाल’ की प्रस्तुति देखी। इस नाटक से वह खासे प्रभावित हुए। जुलाई २०१५ में जब श्रीलंका में विश्वस्तरीय धर्म-संस्कृति सम्मेलन आयोजित हुआ तो वहां उन्होंने जीतू बगड्वाल के बारे में बताया। वर्ष २०१६ में नाटक ‘गंगू-रमोला’ का मंचन देखा। इन नाटकों को देखकर महसूस हुआ कि उत्तरकाशी के माघ मेले में प्राचीन कहानियों को नया जीवन मिल रहा है। इस बार वे नाटक ‘कच्चड़ू देवता’ का मंचन देखेंगे !

स्त्रोत : जागरण

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