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एक खासियत से भारतीय नस्ल की गायों की विदेशों में बढ़ी मांग

श्रावण शुक्ल पक्ष नवमी, कलियुग वर्ष ५११६

राजस्थानके थारपाकड़ नस्लकी गाय

 

  • भारतीय देसी गायों में अधिक तापमान बर्दाश्त करने की अद्भुत क्षमता

  • कीट तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं पौष्टिक तत्वों की कम जरूरत

नई दिल्ली : जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि के मद्देनजर देसी नस्ल की भारतीय गायों पर अनुसंधान की दुनिया के प्रमुख देशों की बढ़ती रूची को देखते हुए सरकार ने भी देसी नस्ल के संरक्षण और संवर्द्धन का कार्य तेज कर दिया है।

भारतीय देसी गायों में अधिक तापमान बर्दाश्त करने की अद्भुत क्षमता, कीट तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं पौष्टिक तत्वों की कम जरूरत और रख रखाव में आसान होने के कारण दुनिया के प्रमुख राष्ट्र इसका आयात कर रहे हैं। इन देशों में अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील भी शामिल हैं।

ये देश इन गायों पर अनुसंधान करने तथा इसमें अपने यहां के अनुकूल उन्नत नस्ल की गाएं विकसित करने के लिए कर रहे हैं। विदेेशियों की रूचि शारीवाल, राठी, थारपाकड़, गिर और कांकरेज नस्लकी गायों में है। शाहीवाल नस्ल की गाएं पंजाब में, राठी और थारपाकड़ राजस्थान में तथा गिर और कांकरेज नस्ल की गाएं गुजरात में पाई जाती हैं।

ऎसा माना जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन और तापमान में वृद्धि के कारण २०२० तक देश में ३२ लाख टन दूध का उत्पादन कम हो जाएगा, जो दूध के अभी के मूल्य से ५००० करोड रूपए से अधिक का होगा।

५०० करोड़ का राष्ट्रीय गोकुल मिशन

वर्ष २००७ की गणना के अनुसार, देश में लगभग नौ करोड़ देसी नस्ल की गाएं थीं। इससे पूर्व १९९७ की तुलना में २००३ में देसी गायों की संख्या घट गई थी। देश में ३७ किस्म की देसी नस्लों की गायों की पहचान की गई है। केन्द्र सरकार ने देसी गायों के संरक्षण और संवर्द्धन तथा महानगरों में आवारा पशुओं पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय गोकुल मिशन की शुरूआत की है।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान देसी गायों को बढ़ावा देने पर ५०० करोड़ रूपए खर्च किए जाएंगे। वर्ष २०१४-१५ के दौरान इस योजना पर १५० करोड़ रूपए खर्च किए जाएंगे। इस योजना को राज्य सरकारों की एजेंसियों, गाोशाला बोर्ड, स्वयंसेवी संगठनों आदि के माध्यम से लागू किया जाएगा।

इस योजना का एक उद्देश्य परियोजना क्षेत्र में देसी गायों का दूध उत्पादन एक हजार लीटर तक बढ़ाना तथा अच्छी नस्ल के गायों के लिए बेहतरीन किस्म के सांढ़ों को तैयार करना भी है ताकि इसका वितरण गावाें में किया जा सके।

गोकुल ग्राम योजना के तहत बड़े शहरों के आसपास लगभग एक हजार गायों का एक साथ रखा जा सकेगा। इनमें साठ प्रतिशत देसी दुधारू गायों तथा ४० प्रतिशत बिना दूध देने वाली गाएं होंगी। इन गायों का पालन पोषण वैज्ञानिक ढंग से किया जाएगा तथा समय-समय पर इनके स्वास्थ्य की जांच की जाएगी।

गोकुल ग्राम प्रबंधन की गोपालन को लेकर प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। यहां जो दूध का उत्पादन होगा, उसकी सही तरह से जांच की जाएगी तथा वैज्ञानिक ढंग से उसका भंडारण किया जाएगा। फिर इसकी बिक्री की जाएगी। गाय के गोबर से जैविक उत्पाद तैयार किया जाएगा। गोकुल ग्राम में बायो संयंत्र भी स्थापित किया जाएगा, जिसमें यहां बिजली की सुविधा मिलेगी।

स्त्रोत : राजस्थान पत्रिका

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