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भारतका पुनर्निर्माण आवश्यक !

आषाढ पूर्णिमा, कलियुग वर्ष ५११६

१. भारतका पुनर्निर्माण अर्थात भारतका गत वैभव एवं कीर्ति पुनः प्राप्त करना !


 ‘भारतके सनातन मूल्योंपर पूरी मानवजातिका भविष्य निर्भर है । भारतका पुनर्निर्माण अर्थात हम देशको भूतकालकी ओर ले जानेकी भाषा नहीं बोल रहे हैं, अपितु यह भारतका गत वैभव एवं कीर्ति पुनः प्राप्त करनेकी ही बात है । भारतका गत वैभव पुनः प्राप्त होना आवश्यक है; क्योंकि भारतका स्वाभिमान ही पूरी मानवजातिका स्वाभिमान एवं गौरव है ।' 

२. अंग्रेजोंद्वारा निर्माण किए गए अधिनियम, उनकी भाषा, वेश, आचार, विचार, भोजनमें स्वतंत्रताके पश्चात परिवर्तन न होनेके कारण वह अधूरा कार्य अब भारतीयोंको ही पूरा करना है और यही है भारतका पुनर्निर्माणकार्य !

अंग्रेजोंने भारतमें व्यापारके रूपमें प्रवेश किया; किंतु अपने षडयंत्र तथा धूर्त नीतिके बलपर वे भारतके राजनेता बन बैठे । भारतके अधिकांश राजाओं-महाराजोंके साथ मैत्री कर उन्होंने बलपूर्वक उनके राज्य छीन लिए । अंग्रेजोंने उन राज्योंपर अपना अधिकार जताकर वहांकी नैसर्गिक संपत्ति तथा धनको अनधिकृत रूपसे लूट लिया । अंग्रेजोंने केवल भारतकी नैसर्गिक संपत्ति एवं धन लूटनेके लिए ही एक प्रशासकीय व्यवस्थाकी स्थापना की । हमारे दुर्भाग्यसे उसे ही अधिनियम कहा जाता है । अपने भारतीय क्रांतिकारियोंने इस अंग्रेजी कानूनव्यवस्थाको ही (नैसर्गिक संपत्ति एवं धन लूटनेकी व्यवस्था) भारतसे हटानेका संकल्प लिया था; किंतु यह संकल्प १५ अगस्त १९४७ में हुए सत्ताके हस्तांतरणके साथ अधूरा रह गया । अंग्रेजोंके पश्चात भारतीयोंके पास सत्ता आई; किंतु कानूनव्यवस्थामें परिवर्तन नहीं हुआ । यह भारतका दुर्भाग्य है कि अंग्रेजोंने भारतका धन एवं नैसर्गिक संपत्ति लूटनेके लिए ही जो अधिनियम पारित किए थे, वे १५ अगस्त १९४७ के पश्चात भी उसीके अनुसार चल रहे हैं, उदा. भूमि अधिग्रहण अधिनियम, भारतीय पुलिस अधिनियम, भारतीय दंडसंहिता, दीवानी अधिनियम, भारतीय वनरक्षक अधिनियम, भारतीय प्रशासकीय नियम आदि । १५ अगस्त १९४७ को  सर्वप्रथम अंग्रेजी अधिनियम समाप्त करनेका कार्य करनेकी आवश्यकता थी । उसके साथ ही अंग्रेजी भाषा, वेश, आचार, विचार, भोजन इन सभी बातोंमें परिवर्तन करना आवश्यक था; किंतु कुछ भी परिवर्तित नहीं हुआ । आज स्वतंत्रताके ६७ वर्षोंके उपरांत भी ये सभी अधिक एवं अन्यायी रूपमें भारतमें चल ही रहे हैं । अंतमें हम सभी भारतीयोंको ही एकत्रित होकर शांतिसे १५ अगस्त १९४७ को छूटा हुआ यह अधूरा कार्य पूरा करना होगा । अंग्रेजोंकी नीति जो हमारे शासकीय व्यवस्थाका एक हिस्सा बन गई हैं, उनमें भी परिवर्तन करना होगा ।  

३. देशका अंग्रेजीकरण समाप्त कर पुनः एक बार स्वतंत्रताकी लडाई लडनेके लिए सिद्ध रहें !

स्वतंत्रताकी प्रथम लडाई अंग्रेजोंको हटानेके लिए लडी गई, अब दूसरी लडाई इस अंग्रेजीकरणसे छुटकारा पानेके लिए लडनी होगी । इसके पश्चात ही भारतका नवनिर्माण होगा । अंग्रेजीकरणका यह सांचा तोडनेके पश्चात ही भारतमें वास्तविक रूपसे स्वतंत्रता एवं सुराज्य आएगा तथा हमारे सभी आदरणीय क्रांतिकारियोंने यही सपना देखा था । 
– (भारत स्वाभिमानप्रणीत मैत्री परिवार (गोवा) द्वारा प्रकाशित पुस्तक `भारत का पुनरुत्थान’(प्रस्तावना)) 

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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