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ओडिशा सरकार के रवैये से पुरी रथयात्रा में टूटी सदियों पुरानी परपंरा !

आषाढ शुक्ल पक्ष अष्टमी, कलियुग वर्ष ५११६ 

भुवनेश्वर –  पुरी की ऐतिहासिक रथयात्रा इस वर्ष एक विवाद छोड़ गई है। परंपरा के अनुसार पुरी की गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंदजी रथ पर चढ़कर पूजा करते हैं, इसके बाद रथयात्रा आरंभ होती है, लेकिन इस वर्ष जिला प्रशासन ने इस पर रोक लगा दी थी। इसके बाद शंकराचार्य ने रथयात्रा का बहिष्कार कर दिया था। इस मामले में ओडिशा सरकार की भूमिका की तीखी आलोचना हो रही है।
ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर की सालाना रथयात्रा २९ जून को निकली थी। सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार पुरी पीठ के शंकराचार्य रथयात्रा शुरू होने के पूर्व रथ की पूजा करते हैं, लेकिन इस बार पुरी के जिला प्रशासन ने इस पर पाबंदी लगा दी थी। इसके विरोध में स्वामी निश्चलानंदजी ने खुद को रथयात्रा से दूर रखा। उसके बाद से ओडिशा में यह मामला गरमाया हुआ है।

पटनायक ने की निंदा

असम के राज्यपाल और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री जेबी पटनायक ने कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

दो केंद्रीय मंत्री खफा

इस मामले में ओडिशा सरकार के रवैए की केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर और आदिवासी मामलों के मंत्री जुएल ओरावं ने कड़ी निंदा की है। जावडेकर ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष देश में सरकार को किसी भी समुदाय के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। पुरी में आज भगवान जगन्नाथ के दर्शन के बाद पत्रकारों से चर्चा में उन्होंने यह बात कही। उधर जुएल ओरांव ने पूरे मामले की जांच की मांग की और कहा कि परंपरा तोड़ने के जो भी दोषी हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मामला गरमाने के बावजूद राज्य सरकार ने अभी तक शंकराचार्य से चर्चा नहीं की है।

राजनीति करने का आरोप

उधर, ओडिशा के आबकारी मंत्री दामोदर राउत ने पटनायक के बयान को राजनीति से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि जानकी बाबू 14 साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और उन्हें जगन्नाथ संस्कृति की जानकारी है। उन्हें निंदा करने की बजाए विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के सुझाव देना चाहिए। इस बीच ओडिशा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जयदेव जेना ने हाईकोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप विवाद का तत्काल हल निकालने की अपील की है।

क्यों हुआ विवाद

रथयात्रा के पूर्व पुरी के जिला प्रशासन ने शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती को पत्र लिखकर कहा था कि वे अकेले आकर भगवान जगन्नाथ की पूजा कर सकते हैं, उन्हें अपने अनुयायियों के साथ आने की अनुमति नहीं रहेगी। पहली बार इस तरह की पाबंदी लगाए जाने से शंकराचार्य खफा हो गए और उन्होंने रथयात्रा में शामिल नहीं होने का फैसला किया।

स्त्रोत : जागरण 

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