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आत्मघाती हैं गंगा पर बने बांध : गिरिधर मालवीय

आषाढ शुक्ल पक्ष षष्ठी, कलियुग वर्ष ५११६

विश्व में गंगा ही एकमात्र ऐसी नदी है जिसका जल आप भले ही कितने ही वर्ष रख लें लेकिन वह खराब नहीं होता। कहा जाता है नेपाल नरेश ने गंगा जल ६० वर्ष तक रखा और वह वैसे का वैसा ही शुद्ध रहा। जयपुर के महाराजा ने भी काफी समय तक गंगा जल रखा और यह बिल्कुल शुद्ध रहा। इसलिए अगर हम इस नदी के जल की गुणवत्ता को बचाकर नहीं रख पाये तो यह गंगा के साथ ही नहीं बल्कि विश्व के साथ अन्याय होगा क्योंकि शुद्धता के मामले में गंगाजल अद्वितीय है। लेकिन गंगा की आज जो दयनीय हालत है उसे देखकर चिंता होती है। टिहरी में गंगा की धारा को रोककर ४६ किमी की जो झील बनायी गयी है उसमें पानी ठहरने के कारण दूषित हो गया है। उसमें कीड़े पड़ गये हैं। यह गंगाजी के साथ अन्याय है। हमने गंगा जल की पवित्रता और शुद्धता के उस महत्व को नहीं पहचाना है। हम इसे लगातार दूषित कर रहे हैं।

वैज्ञानिकों ने शोध के आधार पर गंगा जल की शुद्धता का राज बताया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय की चट्टानों पर बारंबार टकराने से गंगा जल में आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। इसके अलावा गंगा जल में एक खास किस्म का बैक्टीरिया पाया जाता है जिससे इसकी शुद्धता बढ़ जाती है। गंगा का पानी कम गहराई के साथ ही निरंतर प्रवाहमान रहता है इसलिए यह खराब नहीं होता। लेकिन गंगा पर बांध बनाकर, पानी को एक जगह इकट्ठा कर हम उसकी गुणवत्ता को खत्म कर रहे हैं। यह बहुत बड़ा अपराध है। गंगा पर बने बांध आत्मघाती हैं।

गंगा पर बांध बनाने का सिलसिला अंग्रेजों के राज में ही शुरू हुआ। १९१६ में ब्रिटिश सरकार ने हरिद्वार के निकट भीमगौडा में बांध बनाया। उस समय हमारे दादाजी महामना मदन मोहन मालवीय ने इसका कड़ा विरोध किया। मालवीय के विरोध के चलते अंग्रेज एक समझौता करने पर मजबूर हुए। यह समझौता ब्रिटिश सरकार और अंग्रेजों के बीच हुआ। समझौते की शर्त थी कि भविष्य में गंगा पर कोई बांध नहीं बनाया जायेगा। जो भी चेकडैम बनेगा, उसके लिए हिंदुओं से अनुमति ली जायेगी। यह समझौता आज भी मौजूद है। हमारा संविधान भी यही कहता है कि जो अंग्रेजों के साथ समझौते हुए थे वे तब तक मान्य रहेंगे जब तक हमारी संसद एक विशेष अधिनियम बनाकर उन्हें खत्म नहीं कर देती। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जब इस तथ्य का पता चलेगा तो शायद उनकी सरकार गंगा पर बांध नहीं बनने देगी।

दरअसल बांध बनने से गंगाजी की महत्ता खत्म हो रही है। मानूसन से पहले गंगा में जलस्तर काफी कम होता है। कई जगहों पर जलस्तर बहुत कम रह जाता है। हरिद्वार में कई नहरें निकालने के लिए गंगा का पानी रोका गया है। यहां से गंगा के लिए साढे़ छब्बीस हजार क्यूसेक पानी छोड़ा जाना चाहिए। यह जल नरौरा पर आकर रुकता है। नरोरा से आखिरी नहर निकली है। नरौरा से कम से कम १५० क्यूसेक जल छोड़ा जाना चाहिए। यह जल कानपुर पहुंचता है। कानुपर में भी बैराज बनाया गया है। वहां जल इकट्ठा हो गया है। कानुपर की जलापूर्ति इससे की जाती है। लेकिन कानुपर से आगे के लिए एक भी क्यूसेक जल छोड़ने की व्यवस्था नहीं है। कानपुर से आगे जो भी जाता है, वह सीवर का गंदा पानी होता है। कानुपर के आसपास लगी टेनरीज से निकलने वाली खतरनाक गंदगी भी बिना साफ किये गंगा में उड़ेल दी जाती है। इलाहबाद में कुंभ और माघ मेले जैसे आयोजन के वक्त एक करोड़ से अधिक लोग इकट्ठे होते हैं। साधु संत और आम लोग मजबूरन इसी गंदे जल में डुबकी लगाकर चले जाते हैं। उच्च न्यायालय जब संज्ञान लेता है तो नरोरा से थोड़ा पानी छोड़ा जाता है। गंगा का इस हद तक दोहन हो रहा है। और गंगा की यह स्थिति हमने बनायी है।

हमारे यहां गंगा को मां कहते हैं। मैं आपको न्यूजीलैंड का उदाहरण देता हूं। न्यूजीलैंड की सरकार ने पहली बार अपनी नदियों को भी मानव शरीर की तरह एक शरीर घोषित किया। वहां की सरकार ने तय किया कि किसी नदी से उसी तरह जल लिया जायेगा जैसे हम किसी व्यक्ति से रक्तदान कराते हैं। कहने का मतलब यह कि नदी से सिर्फ उतना ही जल निकाला जाये, जिससे नदी की अपनी तबियत खराब न हो। लेकिन हमने गंगाजी का आधा सफर पूरा होने से पहले साढ़े छब्बीस हजार क्यूसेक जल निकाल लिया।

दुनिया के लोग कर रहे हैं लेकिन हम इसे भूल रहे हैं। इलाहबाद उच्च न्यायालय ने निर्णय किया कि आप ५० प्रतिशत जल रहने दीजिए। इसलिए गंगा को बचाये रखने के लिए निरंतर प्रवाह बनाये रखना बेहद जरूरी है।

मैं मानता हूं कि सिंचाई के लिए जल की आवश्यकता है। पानी की कमी कहां हैं। नहर सिस्टम से गंगाजल का व्यवसायीकरण हो गया है। हमें गंगा का व्यवसायीकरण नहीं चाहिए। विदेशों में बसे भारतीय बताते हैं कि वे तरल सोना बोतल में खरीद सकते हैं, लेकिन शुद्ध गंगाजल नहीं मिल सकता। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि वह गंगा में ड्रेजिंग करायेंगे। लेकिन मेरा कहना है कि जब आप गंगा में बड़े-बड़े जहाज चलायेंगे तो उससे तेल का रिसाव होगा। इससे कछुआ सहित तमाम जलचर खत्म हो जायेंगे जो जल की शुद्धता बनाये रखने के लिए जरूरी थे।

इसलिए भले ही हमारी सरकार को आर्थिक लाभ थोड़ा कम हो जाये लेकिन गंगा का व्यवसायीकरण नहीं होना चाहिए। अक्सर सुनाई देता है कि बिजली बनाने के लिए बांध जरूरी हैं। हमारे देश में सौर और पवन ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं।

जहां तक गंगा की सफाई के लिए सरकारी प्रयासों की बात है, तो राजीव गांधी ने नेक इरादे से गंगा एक्शन प्लान शुरु किया लेकिन वह असफल साबित हुआ। उन्होंने यूरोप के अनुरूप यहां भी व्यवस्था बनाने की कोशिश की थी लेकिन वह कामयाब नहीं रही। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गंगा को नया जीवन देने के लिए मंत्रालय बनाया है। इस मंत्रालय की जिम्मेदारी उमा भारती को दी है जो खुद गंगा की पद यात्रा कर चुकी हैं। उम्मीद है हमारे साथ-साथ हमारी आने वाली पीढि़यां भी एक स्वच्छ और अविरल गंगा देखेगी।

(गिरिधर मालवीय-पूर्व न्यायाधीश, इलाहबाद उच्च न्यायालय़ डबीएचयू के संस्थापक और स्वतंत्रता सेनानी महामना मदन मोहन मालवीय के  पुत्र )

स्त्रोत : दैनिक जागरण

 

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