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सभी क्षेत्रोंमें भारतकी अधोगति करनेवाली मेकालेप्रणित शिक्षापद्धतिका भयावह वास्तव जानें !

आषाढ शुक्ल पक्ष चतुर्थी, कलियुग वर्ष ५११६

पर्वरीमें ५ जनवरीको शारदा व्याख्यानमालाके अंतिम व्याख्यानमें ‘भारतीय शिक्षा एवं मेकाले’ विषयपर पुणेके सामाजिक कार्यकर्ता गिरीश प्रभुणेने मार्गदर्शन करते समय प्रतिपादित किया कि मेकालेद्वारा वर्ष १९३१ में कुटिलतासे भारतमें पश्‍िचमी सभ्यतावाली शिक्षाप्रणाली लाई गई । दुर्भाग्यवश पश्‍िचमी सभ्यताकी साम्यवादी विचारधारावाले तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरूद्वारा वही शिक्षापद्धति यथावत स्वतंत्र भारतपर लादी गई । इसलिए देशमें बेरोजगारीके समान समस्याएं बढीं । यहांके कलाकार, परंपरागत कारीगर, वैद्य तथा व्यवसायिक समाजके प्रवाहसे बाहर फेंक दिए गए ।

स्वकेंद्रित बनानेवाली इस शिक्षासे देशका व्यक्ति काला अंग्रेज बन गया । इस शिक्षासे भारतीय व्यक्ति भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी एवं संस्कृतिहीन बन गया । वह स्वभाषा, स्वसंस्कृति तथा स्वदेशको तुच्छ  समझने लगा है । 

मेकालेने देशकी संस्कृतिको उखाड दिया !

भारतमें सर्वत्र भ्रमण करते समय ईसाई धर्मप्रचारकके पुत्र मेकालेको भारतीय  समाज  सुसंस्कृत स्थितिमें दिखाई दिया । ऐसे समाजपर राज्य करना अंग्रेजोंके लिए असंभव था; इसलिए उन्होंने भारतमें सर्वत्र भ्रमणकर  इस देशकी संस्कृति तथा शिक्षाप्रणाली नष्ट करने हेतु कुटिलतापूर्वक एक शिक्षाप्रणालीकी रचना की । मेकालेने ब्रिटिश संसदमें सूचित किया कि इस शिक्षासे भारतीय नागरिक काला अंग्रेज बनेगा एवं शतकोंतक ब्रिटिशोंका दास बना रहेगा । भारतमें स्वतंत्र शिक्षाप्रणाली थी । निःस्पृह ब्राह्मणवर्ग संपूर्ण देशमें समाजको विद्यावान बनानेका कार्य कर रहा था । गुरुकुल पद्धति अस्तित्वमें थी । ब्रिटिशोंने इस पद्धतिको नष्ट किया । ब्रिटिशोंद्वारा लिखित विकृत इतिहास विद्यार्थियोंको सिखाया गया एवं अभीतक सिखाया जा रहा है ।

पेट भरनेवाले समाजकी उत्पत्ति !

अभी तक  ७० प्रतिशत समाजको शिक्षाका अवसर नहीं मिलता । शिक्षा ग्रहणके लिए जानेवाले ३० प्रतिशत समाजमें २ से ३ प्रतिशत लोग पूरी शिक्षा ग्रहण कर रोजगार प्राप्त करते हैं । स्वकेंद्रित शिक्षाके कारण समाज केवल पेट भरनेवाला बन गया ।

शिक्षामें दिखावा आ गया !

देशाभिमानका अभाव होनेसे शिक्षित युवक विदेश जा रहे हैं । इस शिक्षामें साहित्य तथा  विचार इत्यादिके विषयमें कोई शिक्षा नहीं दी गई । केवल दिखावटी अंग्रेजी शिक्षा भारतीय समाजद्वारा ग्रहण की गई ।

समाज विघटित हो गया !

पूर्वमें भारतीय समाज अखंड था । बहुसंख्यक श्रमिक समाज एवं लिपिकका कार्य करनेवाले २-३ प्रतिशत समाजमें भेदभाव उत्पन्न हो गया । इस शिक्षासे एक समय समाजमें प्रतिष्ठित ब्राह्मण वर्ग अधिक अपकीर्त हो गया एवं समाजसे दूर चला गया ।

भाषावादकीr उत्पत्ति !

केरलके  तमिल  भाषिक आदि शंकराचार्यको देशने स्वीकार किया था । इस समय भाषावाद नहीं था । मेकालेकी शिक्षापद्धतिके कारण भाषावादकी उत्पत्ति हुई ।

विद्यापीठ बंद हो गए एवं नैतिकताका अधःपतन हो गया !

भारतके प्राचीन तक्षशीला समान अनेक  विद्यापीठ  मेकालेद्वारा  लादी गई शिक्षापद्धतिके कारण इन १०० वर्षोंकी कालावधिमें बंद हो गए । वर्तमानमें भारतमें वैश्विक स्तरका ज्ञान  देनेवाले विद्यापीठ नहीं हैं । सामाजिक  रचना उद्ध्वस्त हो गई है । पूर्वमें विकसित ज्ञान देनेवाले विद्यापीrठ थे । भारतकी आदर्श समाजरचना ज्ञानपर आधारित  थी । मेकालेकी शिक्षापद्धतिसे समाजमें फूट पड गई । एकत्व देखनेवाला समाज विभक्त हो गया । स्त्रियां भ्रष्ट हो गर्इं । मेकालेकी शिक्षापद्धतिके अनुसार शिक्षाग्रहण करनेवाला मनुष्य व्यभिचारी एवं बलात्कारी बन गया । भारत विस्थापित हो गया ।…
पश्‍िचमी सभ्यताका संशोधन कार्य यथारूप लाया गया । इसलिए संशोधनके क्षेत्रमें भारतने आवश्यक प्रगति नहीं की । मेकालेकी शिक्षापद्धतिके कारण संपूर्ण  भारत  भटक गया है । नौकरी हेतु युवक भटकने लगे । भारत विस्थापित हो गया । इस शिक्षापद्धतिके कारण देशमें कागदका राज्य स्थापित हो गया । इस शिक्षासे यहांके नागरिक अनाडी एवं भ्रष्ट हो गए । यहांका नागरिक दास बन गया ।

संतोेंने देशको संवारा !

ऐसे कठिन समयमें प्रत्येक प्रांतमें संत उत्पन्न हुए एवं उन्होंने समाजको अपनी शिक्षासे सुसंस्कृत किया । सभी प्रांतों एवं भाषाओंमें तत्त्वज्ञान बतानेवाले संत उत्पन्न हुए । उन्होंने प्रत्येक घरको गुरुकुलमें रुपांतरित किया ।

प्राचीन परंपरा एवं आधुनिक विज्ञानका समन्वय रहनेवाली शिक्षापद्धति आवश्यक है !

भारतको प्राचीन परंपरा एवं आधुनिक विज्ञानका समन्वय करनेवाली स्वतंत्र शिक्षापद्धतिको स्वीकारना होगा एवं उसे आचरणमें लानेपर ही अगले १०० वर्षोंमें संपूर्ण भारत ज्ञानवान एवं विचारसंपन्न बनेगा ।

– श्री. गिरिश प्रभुणे, सामाजिक कार्यकर्ता, पुणे

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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