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मुंबई उच्च न्यायालयद्वारा राज्यशासन एवं विठ्ठल-रुक्मिणी देवस्थान समितिको अपना कहना प्रस्तुत क

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, कलियुग वर्ष ५११६

हिंदु जनजागृति समितिकी पंढरपुरके विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिरके व्यवस्थापनके भ्रष्टचारके संदर्भमें याचिका


मुंबई : पंढरपुरके विठ्ठल-रुक्मिणी देवस्थान समितिके भ्रष्टचारके प्रकरणमें हिंदु जनजागृति समितिद्वारा प्रविष्ट याचिकापर १० जूनको हुई सुनवाईके समय मुंबई उच्च न्यायालयके न्या. अभय ओक एवं न्या. चांदुरकरके खंडपीठद्वारा इस प्रकरणमें गंभीर रूपसे ध्यान देते हुए राज्यशासनके विधि न्याय विभाग, महसूल एवं वन विभाग एवं विठ्ठल-रुक्मिणी देवस्थान समितिको अपना कहना प्रस्तुत करनेका आदेश दिया गया है । इस प्रकरणमें हिंदु विधिज्ञ परिषदके राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता श्री. वीरेंद्र इचलकरंजीकरने हिंदु जनजागृति समितिकी ओरसे युक्तिवाद किया गया ।
१. पंढरपुरका विठ्ठल-रुक्मिणी देवस्थान १९८५ से महाराष्ट्र शासनके नियंत्रणमें है । भ्रष्टाचार रोककर पारदर्शक कामकाज करनेके नामपर शासनने यह देवस्थान नियंत्रणमें लिया; परंतु स्वयं ही भ्रष्टाचार चालू रखा । अर्पणमें आई गायोंका विक्रय करना, दान राशि अधिकोषमें भरनेके स्थानपर बोरेमें बांधकर रखना, ऐसे अनेक घोटाले दिनदहाडे चालू थे । 
२. इसमें एक भागके रुपमें विठ्ठलभक्तोंद्वारा विठ्ठलको अर्पण ५०० हेक्टरसे अधिक अर्थात लगभग १ सहस्र २५० एकडसे अधिक भूमि सरकारने अबतक नियंत्रणमें नहीं ली है एवं पिछले २९ वर्षोंमें देवस्थान समितिको इस भूमिसे एक रुपएका भी उत्पन्न नहीं मिला । उसीप्रकार एक फूटकी भूमि भी देवस्थानके नियंत्रणमें नहीं है । इसका अर्थ यह प्रचंड बडा भ्रष्टाचार शासन, राजनीतिज्ञ एवं शासकीय अधिकारियोंने मिलकर किया है । विठ्ठल भक्तोंने भक्तिभावसे किए अर्पणका इस प्रकार अपहार एवं दुर्लक्ष केवल सामाजिक ही नहीं, अपितु धार्मिक पाप भी है ।
३. इस प्रकरणमें न्याय मिलने हेतु जून २०१३ में हिंदु जनजागृति समितिने पंढरपुरके साथ महाराष्ट्रके सभी स्थानोंपर आंदोलन आरंभ किया था ।. मुख्यमंत्रियोको पत्र लिखे थे । तब भी सरकारद्वारा कोई कार्यवाही न करनेके कारण अंतमें समितिने मुंबई उच्च न्यायालयमें जनहित याचिका प्रविष्ट की थी ।

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात 

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