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भारतीय परंपरा और संस्कृति के मुरीद हुए इटली के प्रेमी युगल

ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वितिया, कलियुग वर्ष ५११६

भारतीय परंपरा के आगे पाश्चात्य जीवन शैली एक बार फिर नतमस्तक !!!


इलाहाबाद-(उत्तर प्रदेश) : भारतीय परंपरा के आगे पाश्चात्य जीवन शैली एक बार फिर नतमस्तक दिखी। अंदाज जुदा और जज्बात चरम पर रहा। अवसर था तांत्रिक एवं योगी रमेश जी महराज के झूंसी के पीठम् आश्रम में अनोखी शादी का। इटली के क्लाडियो और लावरा बुधवार को यहां वैदिक रीति-रिवाज से हमेशा-हमेशा के लिए परिणय सूत्र में बंध गए। इस अनोखी बेला का साक्षी बना प्रयाग।

शादी की तैयारी सुबह से ही शुरू कर दी गई थीं। लावरा से शिवा बनीं दुल्हन को मेहंदी लगाई और सजाया संवारा गया। उधर, क्लाडियो से करन बने दूल्हे को भी दिनभर वैदिक रस्मों से होकर गुजरना पड़ा। यज्ञोपवीत संस्कार के बाद दिन में ही सिलमायन हो गया। इसके बाद शुरू हुई बारात की तैयारी। रात साढ़े आठ बजे धूमधाम से बरात उठी। आश्रम से थोड़ी दूर से गाजेबाजे के साथ दूल्हा पैदल ही विवाह मंडप तक पहुंचा। यहां लावरा दूल्हे का इंतजार करती मिलीं। दोनों ने एक दूसरे के गले में वरमाला डाली। इसके बाद दुल्हा दुल्हन विवाह के लिए मंडप में बैठ गए। आचार्य पवन कुमार द्विवेदी के नेतृत्व में 11 आचायरें ने वैदिक रीति से दोनों की शादी कराई। कन्यादान की रस्म आचार्य बिंदेश्वरी प्रसाद ने निभाई।

आई डोंट नो सोनिया गांधी

वैदिक रीति से शादी रचाने वाले इटली के क्लाडियो और लावरा को भारतीय संस्कृति से बेपनाह प्यार तो है पर वह अपने हमवतन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को नहीं जानते। पूछने पर क्लाडियो तपाक से बोल पड़ते हैं, आई डोंट नो सोनिया गांधी। कहते भी हैं, उन्हें राजनीति में कोई रुचि नहीं है। हालांकि यहां के लोगों की जिंदादिली के वह कायल हैं। भारतीय संस्कृति उन पर इस कदर हावी हुई कि क्लाडियो करन बन गए तो लावरा शिवा।

इटली से दो साल पहले शांति की खोज में भारत पहुंचने वाले क्लाडियो ने कभी नहीं सोचा था कि यहां आकर उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी। बास्केट बाल खिलाड़ी और पेशे से ध्यान योग शिक्षक क्लाडियो को यहां आकर नया नाम तो मिला ही, साथ ही मिली शांति, जिसकी खोज में वह निकले थे। इसे किस्मत कहें या और कुछ, जिस समय वह भारत आए, प्रयाग में महाकुंभ चल रहा था। मुंबई में इस बात की जानकारी मिलने पर वह प्रयाग आ पहुंचे। यहां आकर उन्होंने जो नजारा देखा, उसकी तो कभी कल्पना भी न की थी। अध्यात्म की इस सरिता में उन्होंने भी डुबकी लगा ली। आगे बढ़े तो तांत्रिक व योगी रमेश जी महराज के आश्रम पहुंच गए। भारतीय संस्कृति से असली परिचय उनका यहीं हुआ। गुरु मिले तो उनके अनेक सवालों का हल भी मिला। यह बात उन्होंने वापस लौटकर अपनी दोस्त लावरा को बताई। भारतीय संस्कृति के बारे में जानकर लावरा भी बहुत प्रभावित हुईं। दोनों ने तय कर लिया कि शादी वह प्रयाग में ही करेंगे।

स्त्रोत : जागरण

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