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राजीव गांधी हत्‍याकांड : केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- दया के काबिल नहीं हत्‍यारे

माघ शुक्ल पक्ष षष्ठी, कलियुग वर्ष ५११५


नई दिल्‍ली : पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड में सजा-ए-मौत का सामना कर रहे तीन दोषियों की याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। मामले में दोषी मुरुगन, सांथन और पेरारिवालन ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय में याचिका दाखिल कर फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग की थी।

प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने राजीव गांधी हत्याकांड मामले में मौत की सजा कम करने के लिए तीन दोषियों संतन, मुरूगन और पेरारिवलन के वकीलों तथा केन्द्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती की दलीलों को सुना। अटार्नी जनरल ने दलील दी कि दया याचिका के निबटारे में विलंब के आधार पर दोषियों की सजा कम करने हेतु उच्चतम न्यायालय के लिए यह उचित मामला नहीं है। वाहनवती ने स्वीकार किया कि दया याचिकाओं पर निर्णय करने में विलंब हुआ है लेकिन यह विलंब मौत की सजा कम करने के लिए अनुचित और अविवेक पूर्ण नहीं था।

उन्होंने कहा कि अत्यधिक विलंब के आधार पर मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने का आधार बनाने संबंधी शीर्ष अदालत का हालिया निर्णय भी इस मामले में लागू नहीं होता है क्योंकि मौत की सजा पाये कैदियों को वेदना, यंत्रणा और अमानवनीय अनुभवों से नहीं गुजरना पड़ा है जैसा कि २१ जनवरी के फैसले में कहा गया है। इन दोषियों के वकील ने वाहनवती की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि दया याचिकाओं के निबटारे में अत्यधिक  विलंब के कारण उन्हें भी कष्ट भोगना पड़ा है। इसलिए शीर्ष अदालत को इसमें हस्तक्षेप करके तीनों दोषियों की सजा उम्रकैद में तब्दील करनी चाहिए।

 इन दोषियों ने अपनी याचिका में कहा है कि उनके बाद दया याचिकाएं दायर करने वाले कैदियों की याचिकाओं पर फैसला किया गया लेकिन सरकार ने उनकी याचिकाओं को लंबित रखा। शीर्ष अदालत ने मई, २०१२ में मृत्यु दंड के खिलाफ राजीव गांधी के हत्यारों की याचिकाओं पर विचार करने का निर्णय किया था। न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय में दायर याचिकाएं अपने पास मंगा लीं थीं। न्यायालय ने एल के वेंकट की याचिका पर यह आदेश दिया था। वेंकट ने इन याचिकाओं को शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने का अनुरोध करते हुये कहा था कि तमिलनाडु के तनावपूर्ण माहौल के कारण वहां निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से सुनवाई संभव नहीं है।

तीनों दोषियों की याचिका पर हाईकोर्ट ने नौ सितंबर, २०११ को उन्हें फांसी देने पर रोक लगाते हुए केन्द्र और तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किए थे। इन दोषियों का मुख्य तर्क था कि  उनकी दया याचिकाओं के निबटारे में ११ साल चार महीने का वक्त लगा है जो मौत की सजा के निर्णय पर अमल के लिये अनावश्यक कठोर और ज्यादती वाला है जिससे संविधान के अनुच्छेद २१ में प्रदत्त जीने के अधिकार का हनन होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने २१ जनवरी को अपने फैसले में मौत की सजा पाए १५ कैदियों की सजा उम्रकैद में तब्दील करते हुए कहा था कि ऐसे दोषियों की दया याचिका के निबटारे में विलंब सजा कम करने का आधार हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष १९९९ में तमिल टाइगर मुरुगन, सांतन, पेरारिवलन और नलिनी को मौत की सज़ा की पुष्टि की थी। बाद में नलिनी के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया था। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने अगस्‍त २०११ में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के लिए फांसी की सजा पाए तीनों दोषियों की दया याचिका खारिज कर दी थी।

गौरतलब है कि श्रीलंका में चल रहे लिट्टे और सिंघलियों के बीच युद्ध को शांत करने के लिए राजीव गांधी ने भारतीय सेना को श्रीलंका में तैनात कर दिया। जिसका प्रतिकार लिट्टे ने तमिलनाडु में चुनावी प्रचार के दौरान राजीव गांधी पर आत्मघाती हमला कराया। २१ मई १९९१ को सुबह १० बजे के करीब एक महिला राजीव गांधी से मिलने के लिए स्टेज तक गई और उनके पांव छूने के लिए जैसे ही झुकी उसके शरीर में लगा आरडीएक्स फट गया. इस हमले में राजीव गांधी की मौत हो गई।

स्त्रोत : दैनिक भास्कर

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