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डॉ. नरेंद्र दाभोलकर हत्या प्रकरण में सचिन अंदुरे को मुंबई उच्च न्यायालय से जमानत स्वीकार !

आजीवन कारावास की सजा पर भी न्यायालय की ओर से रोक !

मुंबई – महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में कथित आरोपी श्री सचिन अंदुरे को मुंबई उच्च न्यायालय ने जमानत पर मुक्त कर दिया है । इसके साथ ही पुणे विशेष न्यायालय द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास के दंड पर भी न्यायालय ने रोक लगा दी है । १८ अगस्त के दिन न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल और न्यायमूर्ति रणजीतसिंह भोसले की पीठ ने यह निर्णय दिया । श्री सचिन अंदुरे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नितिन प्रधान, वरिष्ठ अधिवक्ताओं शुभदा खोत, अधिवक्ता सिद्धविद्या, अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने पैरवी की । इस मामले के आरोपियों की ओर से अधिवक्ता सिद्धविद्या, अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय, अधिवक्ता सुभाष झा, अधिवक्ता सुवर्णा आव्हाड-वत्स, अधिवक्ता सचिन कणसे, अधिवक्ता प्रकाश सालसिंगीकर मुकदमा लड रहे थे ।

१. सचिन अंदुरे वर्ष २०१८ से जेल में थे । इस मामले के अन्य आरोपी श्री शरद कलासकर को २९ अप्रैल २०२६ के दिन मुंबई उच्च न्यायालय ने जमानत पर रिहा किया था । डॉ. दाभोलकर हत्या मामले में पुणे के विशेष न्यायालय ने सचिन अंदुरे और शरद कलासकर को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास का दंड सुनाया थी । इस निर्णय को दोनों ने मुंबई उच्च न्यायालय में चुनौती दी है ।

२. ‘अपील के अंतिम निर्णय तक सजा स्थगित कर जमानत दी जाए’, ऐसी मांग सचिन अंदुरे के अधिवक्ताओं ने न्यायालय से की थी । न्यायालय ने उनकी यह मांग स्वीकार कर ली ।

३. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने सचिन अंदुरे की ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ (गवाह आरोपी को पहचान सकता है अथवा नहीं, यह परखने के लिए ली जानेवाली पहचान परेड) न कराकर तस्वीरों के द्वारा गवाहों से पहचान कराने का प्रयास किया । सचिन अंदुरे की जमानत स्वीकार करते हुए न्यायालय ने इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर संदेह व्यक्त किया । ‘अपील की सुनवाई और अंतिम निर्णय में अधिक समय लग सकता है । इसलिए सचिन अंदुरे को अनिश्चित काल के लिए जेल में रखना उचित नहीं होगा’, ऐसा तर्क सचिन अंदुरे के वकीलों ने न्यायालय में प्रस्तुत किया ।

क्या सत्र न्यायालय ने तथ्यों की जानबूझकर अनदेखी की, यह प्रश्न उठता है ! – अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर

“‘जिन गवाहों के आधार पर ये सजाएं सुनाई गईं, वे तीनों गवाह फर्जी (बोगस) प्रतीत होते हैं’, यह हमने सत्र अदालत (सेशन कोर्ट) के समक्ष प्रमाणों के साथ साबित करने का प्रयास किया था, जिस पर कोई विचार ही नहीं किया गया । जो तथ्य हमने सत्र न्यायालय में प्रस्तुत किए थे और जिन तथ्यों के आधार पर मुंबई उच्च न्यायालय ने सचिन अंदुरे तथा शरद कलस्कर को जमानत दी है, उससे यह स्पष्ट होता है कि मुंबई उच्च न्यायालय ने हमारे द्वारा रखे गए तथ्यों को स्वीकार किया है । तो फिर सत्र न्यायालय के न्यायाधीश पी.पी. जाधव ने इन तथ्यों पर विचार नहीं किया था अथवा इन्हें जानबूझकर अनदेखा किया ? यह प्रश्न मेरे मन में उठता है ।”

उच्च न्यायालय ने जो टिप्पणी की, वही ‘द रैशनलिस्ट मर्डर्स’ पुस्तक में भी प्रस्तुत की गई है ! – डॉ. अमित थडानी, प्रसिद्ध शल्यचिकित्सक

अंदुरे की जमानत स्वीकार करते समय उच्च न्यायालय ने जो टिप्पणी की है, वही मैंने अपनी ‘द रैशनलिस्ट मर्डर्स’ पुस्तक में लिखी है और कई साक्षात्कारों में भी मैंने यही विचार रखा है । उनके विरुद्ध साक्ष्य इतने कमजोर हैं कि, उनके निर्दोष बरी होने की संभावना स्वयं उच्च न्यायालय ही व्यक्त कर रहा है ।

“… यह सत्य की विजय है ! – सनातन संस्था

डॉ. दाभोलकर हत्या प्रकरण में हिन्दुत्वनिष्ठ सचिन अंदुरे को विशेष न्यायालय द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध अंदुरे ने उच्च न्यायालय में जमानत याचिका दाखिल की थी । अंदुरे की इस याचिका का विरोध करते हुए दाभोलकर परिवार ने ‘सचिन अंदुरे को जमानत न दी जाए’, ऐसी मांग करनेवाली स्वतंत्र याचिका दाखिल की थी; लेकिन उच्च न्यायालय ने उनकी इस मांग को स्पष्ट रूप से निरस्त करते हुए अंदुरे को जमानत मंजूर कर दी । इस निर्णय से सनातन संस्था और हिन्दुत्वनिष्ठों पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें फंसाने का दाभोलकर परिवार का षड्यंत्र अब बेनकाब हो गया है, साथ ही जांच एजेंसियों का खोखलापन भी उजागर हो गया है और यह सत्य की बडी विजय है, ऐसा रुख सनातन संस्था के प्रवक्ता श्री. अभय वर्तक ने रखा है ।

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