वीर सावरकर के योगदान को शामिल किया गया

नई दिल्ली – एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) की कक्षा 8 की संशोधित पुस्तक “Exploring Society: India and Beyond” में नेताजी सुभाषचंद्र बोस से जुड़े संदर्भों में हिटलर का उल्लेख हटा दिया गया है। साथ ही, स्वतंत्रता संग्राम में स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा की गई “स्वराज्य” की मांग को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त, भारत के विभाजन से संबंधित अध्याय “India’s Long Road to Independence” में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
1. भारत के विभाजन पर नया उल्लेख
नई पुस्तक में लिखा गया है कि, “भारत के विभाजन का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी बड़े स्तर पर विरोध किया था। विभाजन को स्वीकार करना ही एकमात्र रास्ता था या नहीं, यह आज भी बहस और चर्चा का विषय है।”
पुरानी पुस्तक में यह लिखा था कि विभाजन के समय उपमहाद्वीप की परिस्थितियों के कारण कांग्रेस के नेता विवश हो गए थे। उसमें यह भी उल्लेख था कि ब्रिटिशों ने हिंदू और मुस्लिम नेताओं के मतभेदों का लाभ उठाकर विभाजन का निर्णय लिया और महात्मा गांधी तथा अधिकांश कांग्रेस नेताओं के विरोध के बावजूद अंततः कांग्रेस ने इसे एकमात्र विकल्प मानकर स्वीकार कर लिया।
2. नेताजी सुभाषचंद्र बोस के संदर्भ से हिटलर और नाजी विचारधारा हटाई गई
आजाद हिंद फौज की स्थापना से जुड़े विवरण में भी बदलाव किया गया है। नई पुस्तक में केवल इतना कहा गया है कि, “नेताजी ने सेना के गठन के लिए ब्रिटिश विरोधी शक्तियों का समर्थन मांगा था।” जबकि पुरानी पुस्तक में स्पष्ट रूप से लिखा था कि नेताजी ने हिटलर से सहायता मांगी थी। साथ ही हिटलर को एक ऐसे तानाशाह के रूप में बताया गया था जिसकी नस्लवादी नाजी विचारधारा और विस्तारवादी नीतियों के कारण द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। संशोधित संस्करण से ये सभी संदर्भ हटा दिए गए हैं।
3. स्वातंत्र्यवीर सावरकर और “स्वराज्य” का समावेश

संशोधित पाठ्यक्रम में स्वतंत्रता आंदोलन के दायरे को विस्तृत करते हुए स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर के योगदान का भी उल्लेख किया गया है। पुस्तक में अब लिखा गया है कि, “वर्ष 1925 में विनायक दामोदर सावरकर ने भी ‘स्वराज्य’ की मांग की थी।”
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद संशोधन
इसी वर्ष फरवरी में कक्षा 8 की इस पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और लंबित मामलों से संबंधित टिप्पणियों के साथ-साथ हिटलर संबंधी संदर्भों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए पुस्तक की छपाई और डिजिटल वितरण पर रोक लगा दी थी। इसके बाद एनसीईआरटी ने क्षमा याचना की, पुस्तक को बाजार और डिजिटल मंचों से वापस लिया तथा संशोधित संस्करण प्रकाशित किया।








