Menu Close

मस्जिदों पर अवैध रूप से लाउडस्पीकर लगाना कोई मौलिक अधिकार नहीं है – मुंबई उच्च न्यायालय

मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकरों के विरुद्ध शिकायतों और की गई कार्रवाई की जानकारी 2 सप्ताह में प्रस्तुत करें! – मुंबई उच्च न्यायालय का राज्य सरकार को निर्देश

मुंबई – मस्जिदों तथा अन्य प्रार्थना स्थलों पर लगे लाउडस्पीकरों से होने वाले ध्वनि प्रदूषण की शिकायतों पर पुलिस ने अब तक क्या कार्रवाई की है, इसका विस्तृत प्रतिवेदन 2 सप्ताह के भीतर न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए, ऐसा निर्देश मुंबई उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को दिया। मस्जिदों पर कथित रूप से अनधिकृत लाउडस्पीकरों से होने वाले ध्वनि प्रदूषण के संबंध में नागरिकों द्वारा बार-बार शिकायत किए जाने के बावजूद मुंबई पुलिस द्वारा कार्रवाई नहीं किए जाने पर न्यायालय ने असंतोष व्यक्त किया।

1. कांदिवली की अधिवक्ता रीना रिचर्ड ने प्रतिदिन प्रातःकाल मस्जिद से होने वाले तेज ध्वनि प्रदूषण के संबंध में समतानगर पुलिस थाने में कई बार शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया; किंतु शिकायतों पर कार्रवाई न होने के कारण उन्होंने मुंबई उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। इस याचिका पर न्यायमूर्ति अजय गडकरी तथा न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई हुई।

2. प्रतिवादियों की ओर से कहा गया कि लाउडस्पीकरों का मुख मस्जिद के अंदर की ओर है तथा उनकी ध्वनि कम डेसिबल पर रखी गई है। हालांकि, याचिकाकर्ता ने इस दावे का खंडन करते हुए न्यायालय को बताया कि शांत क्षेत्र में ये लाउडस्पीकर तेज आवाज में बजाए जा रहे हैं। इसके बाद न्यायालय ने राज्य सरकार को उपर्युक्त निर्देश जारी किए।

कानून का पालन सभी के लिए अनिवार्य! – मुंबई उच्च न्यायालय

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अवैध रूप से लाउडस्पीकर लगाना किसी का भी मौलिक अधिकार नहीं हो सकता। सभी प्रार्थना स्थलों को ध्वनि संबंधी नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रार्थना स्थल भी शांत क्षेत्र (Silence Zone) का हिस्सा होते हैं, इसे पुलिस को नहीं भूलना चाहिए। कानून के अनुसार आवासीय क्षेत्र में ध्वनि की अधिकतम सीमा 65 डेसिबल तथा शांत क्षेत्र में 55 डेसिबल निर्धारित है और यह सीमा सभी प्रकार के लाउडस्पीकरों पर समान रूप से लागू होती है। इसलिए कानून की यह व्यवस्था सभी के लिए समान रूप से बाध्यकारी है।

स्रोत : सनातन प्रभात

Latest News