
रत्नागिरी : सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘देवस्थान इनाम निर्मूलन कानून’ हिन्दू मंदिरों की भूमि हडपने वाला है। इसलिए सरकार इस कानून को स्थायी रूप से रद्द करे और इसके स्थान पर मंदिरों की भूमि की सुरक्षा के लिए तुरंत ‘देवस्थान भूमि संरक्षण कानून’ लागू करे, ऐसी मांग हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री रमेश शिंदे ने की। वे रत्नागिरी में हाल ही में आयोजित ‘महाराष्ट्र मंदिर महासंघ’ की ओर से मंदिर ट्रस्टियों की विशेष बैठक में बोल रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने यह भी कहा कि ‘देवस्थान भूमि संरक्षण कानून’ लागू कराने के लिए राज्य के साढ़े चार लाख मंदिरों को संगठित कर तीव्र आंदोलन खड़ा करना होगा।
श्री रमेश शिंदे ने कहा कि,
1. यदि सरकार हिंदुत्वनिष्ठ है, तो उसे देवस्थानों के हित में कानून बनाना चाहिए। गुजरात में सरकार ने वर्ष 2023 में देवस्थान की भूमि की सुरक्षा के लिए ‘एंटी लैंड ग्रैबिंग एक्ट’ लागू किया है। वहां मंदिरों की भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है। साथ ही अतिक्रमण हटाकर भूमि मुक्त कराने की जिम्मेदारी मंदिर की नहीं, बल्कि सरकार की है। महाराष्ट्र में भी ऐसा ही हिंदूहितकारी कानून बनाया जाना चाहिए।
2. मुंबई सहित अन्य भागों के मंदिरों की करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि पर आज भी वर्ष 1947 की दर से नाममात्र का किराया मिलता है। वक्फ बोर्ड के ‘वक्फ प्रॉपर्टी लीज रूल’ की तर्ज पर हिन्दू मंदिरों की भूमि के लिए भी ‘मॉडल रेंट लीज एक्ट फॉर टेम्पल लैंड्स’ बनाया जाना चाहिए, ताकि मंदिरों को किराये पर दी गई संपत्तियों का उचित प्रतिफल मिल सके।
3. देवस्थान इनाम निर्मूलन कानून के अनुसार वतन और भूमि विवादों पर अंतिम निर्णय लेने के असीमित अधिकार जिलाधिकारियों को दिए गए हैं और इसे अदालत में चुनौती भी नहीं दी जा सकेगी। इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा।
4. ‘धारा 9’ के कारण मंदिर के रास्ते, कुएं, तालाब और वाहन पार्किंग की जगह सीधे सरकार के स्वामित्व में चली जाएगी और मंदिर को कोई मुआवज़ा भी नहीं मिलेगा। यदि यह कानून कुलों (किरायेदारों/वंशपरंपरागत धारकों) के लिए है, तो सरकार इसमें ‘कुल’ कैसे बन गई? साथ ही वक्फ बोर्ड को कानून से बाहर रखकर केवल हिन्दू मंदिरों के लिए ऐसा कानून बनाना क्या संविधानसम्मत है? ऐसे प्रश्न भी उन्होंने उठाए।
5. प्रस्तावित देवस्थान इनाम निर्मूलन कानून पर फिलहाल केवल स्थगन मिला है और 15 अगस्त तक आपत्तियां दर्ज कराने की समयसीमा है। इसके लिए सभी मंदिरों को संगठित होकर स्थानीय विधायक और पालकमंत्री के समक्ष अपना पक्ष लिखित रूप में रखना चाहिए।
मंदिरों का ऐतिहासिक वैभव बचाने के लिए संगठन आवश्यक! – सद्गुरु सत्यवान कदम
प्राचीन काल से मंदिर हमारी संस्कृति और अर्थव्यवस्था के केंद्र रहे हैं। आज मंदिर धर्मशिक्षा और उपासना के केंद्र के रूप में पीछे छूटते जा रहे हैं। यह वैभव पुनः प्राप्त करने के लिए सभी ट्रस्टियों को एकजुट होना होगा और साधना के माध्यम से आध्यात्मिक बल प्राप्त करना होगा। लोकतंत्र में संगठित हुए बिना सरकार ध्यान नहीं देती। कुणकेश्वर की बैठक में उचित जागरूकता के कारण वहां के कुलों ने यह मान लिया कि “देव की भूमि देव की ही रहनी चाहिए” और भूमि पर अपना अधिकार छोड़ने को सहमति दी। यह मंदिर ट्रस्टियों के जागरण का बड़ा परिणाम है।
देवस्थान की भूमि देवस्थान के नाम पर ही रहनी चाहिए! – रविंद्र सुर्वे, अध्यक्ष, ग्रामदैवत श्री देव भैरी मंदिर
श्री देव भैरी देवस्थान के अंतर्गत आने वाले नवलाई मंदिर की देवराई भूमि पूर्वजों ने देवस्थान की रक्षा के लिए सुरक्षित रखी थी; लेकिन अब उस पर सरकार का नाम दर्ज हो गया है। भविष्य में भक्तों की सुविधाओं और मंदिर के विस्तार के लिए इस भूमि का सुरक्षित रहना आवश्यक है। कल को ट्रस्टी बदल जाएं, तब भी यह भूमि स्थायी रूप से देवस्थान ट्रस्ट के नाम पर ही रहनी चाहिए।
पारंपरिक वहिवाट बनाए रखने से सरकारी अधिग्रहण टल सकता है! – अधिवक्ता संजेश देसाई
देवराई और चरागाह (गायरान) भूमि की मालिकी भले ही राजस्व अभिलेखों में सरकार के नाम दिखाई देती हो, लेकिन यदि उनकी पारंपरिक वहिवाट सही प्रकार से और प्रत्यक्ष रूप में बनाए रखी जाए, तो उनका पुनः अधिग्रहण रोका जा सकता है। अपंजीकृत पुराने देवस्थानों को पंजीकृत कराते समय महाराष्ट्र शासन को पक्षकार बनाना पड़ता है और यह सिद्ध करना पड़ता है कि देवस्थान पीढ़ियों पुराना है। यदि ट्रस्टी इस परंपरागत वहिवाट को बनाए रखें, तो इन भूमियों का उपयोग देवस्थान के कार्यों के लिए सही प्रकार से किया जा सकता है।
बैठक का संचालन महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के रत्नागिरी जिला समन्वयक श्री सुरेश शिंदे ने किया। प्रस्तावना राज्य संयोजक श्री संजय जोशी ने रखी। इस बैठक में रत्नागिरी शहर और तालुका के साथ-साथ संगमेश्वर और राजापुर तालुका के मंदिर ट्रस्टी उपस्थित थे।








