देवस्थान की जमीनें कब्जाधारकों को देने वाला प्रस्तावित कानून तुरंत रद्द करें, अन्यथा राज्यभर में तीव्र आंदोलन किया जाएगा!– सुनील घनवट, महाराष्ट्र मंदिर महासंघ

नागपुर : महाराष्ट्र शासन के महसूल (राजस्व) विभाग की ओर से देवस्थान इनाम भूमि और मंदिरों की अन्य जमीनों को कुळ (किराएदारों) या कब्जाधारकों को हस्तांतरित करने के लिए एक नया कानून प्रस्तावित किया जा रहा है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने इस नीति का कड़ा विरोध जताया है और यह शंका निर्माण हो रही है कि, क्या यह हिंदू देवस्थानों के अस्तित्व को समाप्त करने और भू-माफियाओं की जेबें भरने का कोई दांव तो नहीं है। इसलिए शासन इस बेकायदेशीर और अन्यायपूर्ण मसुदे (मसौदे) को तत्काल वापस ले; अन्यथा राज्यभर में मंदिरों की ओर से तीव्र जनआंदोलन छेड़ा जाएगा, ऐसी चेतावनी महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संगठक श्री सुनील घनवट ने नागपुर के प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार परिषद में सरकार को दी।
इस अवसर पर श्री अनुप जैसवाल (महाराष्ट्र मंदिर महासंघ राज्य कोर कमेटी सदस्य), पूज्य भागीरथी महाराज (अध्यक्ष, गुरुकृपा सेवा संस्था, नागपुर), श्री दिलीप कुकडे (श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर के अध्यक्ष और महाराष्ट्र मंदिर महासंघ नागपुर जिला संयोजक), श्री विनीत पाखोडे (श्री पिंगळादेवी संस्थान, अमरावती), अधिवक्ता अभिजीत बजाज (अमरावती), श्री चेतन राजहंस (राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था), श्री रामनारायण मिश्रा (महाराष्ट्र मंदिर महासंघ, विदर्भ संयोजक) उपस्थित थे।
इस विषय में विस्तृत भूमिका रखते हुए महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संगठक श्री सुनील घनवट ने कहा कि , “भारतीय कानून के अनुसार हिंदू देवता (मूर्ती) एक ‘विधिक व्यक्ति’ (Juristic Person) है। इसलिए देवस्थान की संपत्ति का मूल मालिक ‘देव’ होता है और महाराष्ट्र राज्य सरकार, मुख्य रूप से ‘महाराष्ट्र सार्वजनिक विश्वस्त व्यवस्था अधिनियम, 1950’ के अंतर्गत, नियामक, प्रशासनिक और आर्थिक अधिकारों के माध्यम से सार्वजनिक मंदिरों पर नियंत्रण रखती है। विश्वस्त (ट्रस्टी) और शासन को देवस्थान के मूल मालिक की जमीन परस्पर किसी तीसरे पक्ष को या कब्जाधारकों को बांटने का कोई अधिकार नहीं है। सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के प्रस्थापित फैसलों के अनुसार देवस्थान जमीनों पर कुळ (किराएदार) मालिकाना हक नहीं जता सकते। ऐसा होते हुए भी यह कानून लाना संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 300-A के मूलभूत अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।”
मंदिर महासंघ के श्री अनुप जैसवाल ने कहा कि, “मंदिर और वक्फ प्रॉपर्टी के बारे में शासन का दुजाभाव क्यों? शासन ने 13 अप्रैल 2016 को परिपत्र निकालकर वक्फ संपत्तियों के 7/12 उतारे पर ‘वक्फ प्रतिबंधित सत्ता प्रकार’ ऐसी नोंद लेने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं। यदि शासन एक ओर वक्फ बोर्ड की संपत्तियों का रक्षण कर रहा है, तो दूसरी ओर हिंदू देवस्थानों की जमीनें कब्जाधारकों के गले क्यों उतार रहा है? यह संविधान के समानता के सिद्धांत (अनुच्छेद 14) का खुला उल्लंघन है। साथ ही ‘महाराष्ट्र कुळवहिवाट व शेतजमीन अधिनियम’ के अनुच्छेद 88-B/129-B के अनुसार देवस्थान जमीनों को कुळ कानून से पहले ही संरक्षण मिला हुआ है। इस मूल कानून के संरक्षण को दरकिनार कर, विकास के नाम पर प्राइम लोकेशन की जमीनें बिल्डरों और भू-माफियाओं की झोली में डालने का यह छुपा प्रयास है, जिससे मंदिरों की आर्थिक स्वायत्तता खतरे में आएगी।”
महाराष्ट्र मंदिर महासंघ की शासन से 5 प्रमुख मांगें हैं:
1. देवस्थान इनाम एवं देवस्थान की जमीनों को कुळ/कब्जाधारकों को हस्तांतरित करने के संदर्भ में प्रस्तावित कानून का मसुदा (Draft) तत्काल और कायमस्वरूपी (स्थायी रूप से) पीछे लिया जाए।
2. वक्फ की तरह संरक्षण दें: हिंदू देवस्थानों की सभी जमीनों के 7/12 उतारे पर “देवस्थान प्रतिबंधित सत्ता प्रकार – अहस्तांतरणीय” ऐसी स्पष्ट नोंद लेने का परिपत्र शासन तत्काल निकाले।
3. गुजरात राज्य की तर्ज पर महाराष्ट्र में कठोर ‘एंटी लैंड ग्रैबिंग एक्ट’ (Anti-Land Grabbing Act) लागू किया जाए और देवस्थान जमीन हड़पने वालों को 14 वर्ष का सश्रम कारावास और गैर-जमानती सजा का प्रावधान हो।
4. पिछले 25 वर्षों के सभी देवस्थान भूमि हस्तांतरण, बोगस पंजीकरण और अतिक्रमणों की जांच के लिए उच्च पदस्थ आईएएस (IAS) अधिकारी के नेतृत्व में विशेष जांच दल (SIT) गठित की जाए।
5. देवस्थान जमीनों के बारे में महसूली (राजस्व) और दीवानी न्यायालयों में प्रलंबित विवादों को त्वरित निपटाने के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित कर 6 महीने में खटले निपटाए जाएं।
सनातन संस्था के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री चेतन राजहंस ने कहा कि, “देवस्थान की जमीनें केवल महसूल विभाग के दफ्तर के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि वे महाराष्ट्र की संस्कृति, श्रद्धा और समाज जीवन का मूल आधार हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज का आदर्श सामने रखकर शासन को धर्मदाय संपत्तियों के ‘विश्वस्त’ (Trustee) के रूप में रक्षण करना चाहिए। शासन को मंदिरों के कामकाज में प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इन वस्तुनिष्ठ और कानूनी बातों की अनदेखी कर यदि यह कानून थोपने का प्रयास किया गया, तो राज्यभर का समस्त हिंदू समाज, सभी मंदिर, भाविक, पुरोहित, पुजारी और विभिन्न हिंदू, सामाजिक व आध्यात्मिक संगठन एक साथ आकर तीव्र आंदोलन करेंगे। हिंदुत्ववादी शासन को मंदिरों की मांगों पर तत्काल विचार करना चाहिए।”








