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‘संविधान समता दिंडी’द्वारा वारी में घुसे सचिन माळी एवं शीतल साठे शहरी नक्सलवादी ही हैं !

दोनों ही गृहविभाग द्वारा नक्सलवादी संगठन के रूप में घोषित किए गए ‘कबीर कला मंच’के कार्यकर्ता !

विद्रोही विचारों द्वारा शहरी नक्सलवादियों का एजेंडा कार्यान्वित हेतु प्रयत्नशील !

शहरी नक्सलवादियों का वारी में क्या काम ? वारी में सम्मिलित होकर समाज में फूट डालना अथवा वारी में तोड-फोड अथवा हिंसाचार करवाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता । पुलिस इन पर क्या कार्यवाही करेगी ? – सम्पादक, हिन्दुजागृति

शीतल साठे एवं सचिन माळी

मुंबई – ‘एक दिन तो अनुभव करें वारी’, ऐसा आवाहन करते हुए वर्ष २०२२ में ‘संविधान समता दिंडी’ में सम्मिलित हुए सचिन माळी एवं शीतल साठे नामक दंपति गडचिरोली में नक्सलवादियों की कार्यवाहियों में सक्रियरूप से सम्मिलत थे । उनकी नक्सलवादी कार्रवाहियों के ठोस प्रमाण उपलब्ध होने पर वर्ष २०१३ में ‘अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (युएपीए) अंतर्गत इन दोनों को बंदी बनाया गया था । महाराष्ट्र राज्य के गृहविभाग द्वारा ‘नक्सलवादी संगठन’ के रूप में घोषित किए गए ‘कबीर कला मंच’के ये दोनों ही कार्यकर्ता हैं । ये दोनों ही नास्तिक हैं । इन दोनों का एक ओर नक्सली गतिविधियां करना और दूसरी ओर वारी के ‘संविधान समता दिंडी’में सम्मिलित हाेना, यह प्रकार अत्यंत संशयास्पद है । इससे पहले भी अंनिस के पदाधिकारी अविनाश पाटील के नेतृत्व में भगवान को न माननेवाले कुछ अंनिसवाले वारी में सम्मिलित हुए थे ।

सचिन माळी एवं शीतल साठे, दोनों ही गीतों और पारंपरिक लोकगीतों द्वारा समाज में विद्रोही विचार फैलाने का काम अनेक वर्षों से कर रहे हैं । उनके गीत जालस्थलपर आज भी उपलब्ध हैं । ‘भगवान को एक ओर रखो’ इसप्रकार खुले आम आवाहन करनेवाले ये लोग विद्रोही विचारों द्वारा शहरी नक्सलवादियों का एजेंडा कार्यान्वित करने के लिए ही वारी में घुसे हैं । उसके लिए बडी सरलता से संविधान को आगे कर रहे हैं । इस संदर्भ में राष्ट्रप्रेमियों का कहना है कि इन सभी शक्तियों की पुलिस द्वारा गहन छानबीन होना आवश्य है ।

नक्सली कार्रवाहियों में सक्रिय सहभाग !

नवंबर २०११ और अप्रैल २०१२ में गडचिरोली के जंगलों में इन दोनों का नक्सलवादियों के साथ सक्रिय हाेने के प्रमाण मिलने की जानकारी गडचिरोली के तत्कालीन पुलिस उपमहानिरीक्षक रवींद्र कदम ने माध्यमों की दी है । वर्ष २०१३ में शीतल साठे और सचिन माळी ने विधानभवन में जाकर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया था । तब शीतल साठे गर्भवती थी । कहा जाता है कि वे किसी भी प्रकार का संकट मोल लेना नहीं चाहते थे, इसलिए वे दोनों पुलिस की शरण चले गए । उन्हें बंदी बनाने के पश्चात शीतल साठे को मारा-पीटा न जाए, इसलिए फ्रांस, कैनडा, ब्रिटन, थायलैंड, पुर्तगाल और जर्मनी, देशों से ५० से भी अधिक पत्र मुंबई के आर्थर रोड कारागृह में और भायखळा के महिला कारागृह में आए । यह सब कुछ संदेहजनक है ।

नास्तिक अंनिसवाले वारी में किसलिए ?

सचिन माळी जैसे ‘कबीर कला मंच’में सम्मिलित था, वैसे ही वह अंनिस में भी सक्रिय था । ‘मैंने अपना पूजाघर हटा दिया है´ ऐसा उसने स्वयं अपने यू ट्यूब पर वीडियो में स्वयं ही कहा है कि ‘मैं वर्ष २००१ में जब आंदोलन से जुडा, तब अंनिस का काम कर रहा था ।’ इस वीडियो में डॉ. दाभोलकर के कार्य का समर्थन देने का उसने आवाहन भी किया है । वर्ष २०११ में महाराष्ट्र गुप्तवार्ता विभाग के उपआयुक्त ने सभी जिलों के पुलिस अधीक्षक एवं आयुक्तों को ऐसे ६२ संगठनों के नाम भेजे थे जिनमें से ७ का नक्सली कार्यवाहियों से सीधा संबंध था और ५५ ऐसे जिनका संबंध नक्सलवादियों से था । उन संगठनों में ५० वें क्रमांक पर महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (अंनिस) का नाम है । अंनिस के गोंदिया जिले के कार्याध्यक्ष नरेश को ८ मई २००७ को पुलिस ने अरुण फेरीरा, धमेंद्र भुरले को नक्सलवादियों के साथ बंदी बनाया था । यह सभी प्रकार अंनिस के कार्य के विषय में संशय व्यक्त करनेवाले हैं ।

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