
कोल्हापुर, २९ मार्च (वार्ता.) – दीपक मुळे की विद्यापीठ के ‘कुलसचिव रजिस्ट्रार’ के रूप में जून २०१० से २ जून २०१५ तक नियुक्ति की गई थी । उनके कार्यकाल में अवैध नियुक्ति होने के विषय में विधानसभा में प्रश्न उपस्थित किया गया था । इस संदर्भ में पूछताछ के लिए २ समितियां नियुक्त की गई । पहली समिति के धनराज माने द्वारा दिया गया ब्योरा मार्च २०१७ में प्रस्तुत किया गया । तदुपरांत पुन: विद्यापीठ ने निवृत्त न्यायाधीश शानभाग की अध्यक्षता में समिति की स्थापना की थी । इस अवधि में दीपक मुळे निवृत्त होने के पश्चात उन्हें अनुशासनभंग कार्रवाई के लिए आरोपपत्र दिया गया । तब तांत्रिक सूत्र का आधार लेकर दीपक मुळे मुंबई उच्च न्यायालय में गए और प्रश्न उपस्थित किया कि ‘निवृत्ति के उपरांत अनुशासनभंग की कार्रवाई कैसे की जा सकती है ?’ वहां निर्णय उनके हित में होने से विद्यापीठ सर्वोच्च न्यायालय में गई; परंतु वहां भी तांत्रिक सूत्रों के कारण शिवाजी विद्यापीठ हार गई । इस प्रकरण को देख ऐसा प्रश्न उठता है कि यह सब दिखाऊ कुश्ती तो नहीं ? तांत्रिक सूत्रों के कारण मुळे छूट गए, तब भी जो अवैध नियुक्तियां हुई हैं, उससे लोगों की हानि हुई है और कुछ लोग अवैधरूप से नौकरी का अपलाभ ले रहे हैं ।
इसपर विद्यापीठ व्यवस्थापन समिति और सरकार द्वारा कब कार्रवाई होगी ? ऐसा प्रश्न हिन्दू विधिज्ञ परिषद के अध्यक्ष अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने पत्रकार परिषद में उपस्थित किया । इस प्रसंग में धनराज माने द्वारा दिया गया देशपांडे समिति का ब्योरा पत्रकारों के सामने प्रस्तुत किया गया । कोल्हापुर शहर के ‘प्रेस क्लब’ में हुई इस पत्रकार परिषद के लिए अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर सहित ‘पतित पावन संगठन’के पश्चिम महाराष्ट्र संपर्क प्रमुख श्री. संजीव सलगर, जिला सचिव श्री. काकाजी मोहिते एवं श्री. सुरेश शिंत्रे उपस्थित थे ।
१० दिनों में कार्यवाही न होने पर तीव्र आंदोलन ! – संजीव सलगर, पश्चिम महाराष्ट्र संपर्क प्रमुख, पतित पावन संगठन
अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर द्वारा प्रस्तुत सभी तांत्रिक सूत्रों पर उच्च एवं तंत्र शिक्षामंत्री, राज्यपाल, इसके साथ ही शिवाजी विद्यापीठ १० दिनों में कार्यवाही करे । पिछली भरती प्रक्रिया में अनियमितता में सुधार किए बिना शिवाजी विद्यापीठ नई भरती प्रक्रिया न करे । हम नई भरती का विरोध करते हैं । अन्यथा पतित पावन संगठन की ओर से तीव्र आंदोलन छेडा जाएगा ।
तारांकित प्रश्नों और आश्वासनों की धारिका (फाईल) मंत्रालय से गायब ?
तत्कालीन विधायकों ने विधानसभा में ऐसा आरोप भी किया था कि मंत्रालय के अधिकारी उनका साथ दे रहे हैं । इसके उत्तर में तत्कालीन मंत्रियों ने आश्वासन दिया था कि ‘इसकी पूछताछ की जाएगी’, परंतु विधानसभा में जो तारांकित प्रश्न तत्कालीन विधायक सुरेश हाळवणकर ने प्रस्तुत किया था और तब उन्हें जो आश्वासन दिया गया, पता चला कि उन तारांकित प्रश्नों और आश्वासनों की धारिका ही गायब हो गई है । अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने बताया कि यह उत्तर मंत्रालय से आया है ।
धनराज माने समिति के ब्योरे के कुछ विशेष सूत्र
१. प्राणिशास्त्र विषय के लिए डॉक्टर झोडापे को नियुक्त किया; परंतु उन्हें उपयुक्तता परीक्षण (स्क्रीनिंग टेस्ट) के समय अतिरिक्त १० मार्क (गुण) दिए गए, परंतु उसका स्पष्टीकरण नहीं है ।
२. डॉ. पंकज पवार के ‘पी.एच्.डी.’ मार्गदर्शक न होने से उनका चयन नहीं किया जा सकता था; परंतु उनसे ‘स्टैंप पेपर’पर ऐसा लिखवाकर उन्हें नियुक्त किया है कि ‘मैं पात्र नहीं हूं इसका मुझे भान है । अत: संचालक उच्च शिक्षण पुणे एवं सहसंचालक उच्च शिक्षण कोल्हापुर द्वारा अनुमति अस्वीकार होने पर मेरी नियुक्ति रहित की जाए !’
३. सुनील मधुकर गायकवाड को अवैधरूप से इंटरव्यू लेकर उन्हें नियुक्त किया गया ।
४. सागर दगडू बेलेकर को रसायनशास्त्र विषय के लिए नियुक्त करते समय ‘पीएच्.डी.’ विद्यार्थियों के मार्गदर्शक होने चाहिए, ऐसी शर्त थी; परंतु १४ सितंबर २०१२ को पात्रता दर्शाने के लिए जो कागद-पत्र जोडे थे, वे भविष्यकाल के अर्थात २४ नवंबर २०१२ के थे ।
५. डॉ. अनिल घुले का अनुभव अनुचित है । इसलिए वास्तव में उन्हें अपात्र होना चाहिए था; परंतु तब भी उनकी नियुक्ति हुई ।
६. ग्रंथपाल के रूप में नमित खोत को नियुक्त करते समय केवल एक ही ‘आइ.एस्.बी.एन्.’ क्रमांक की पुस्तक उन्होंने प्रस्तुत की ।
७. भरती प्रक्रिया में यह भी ध्यान में आया कि कुल भरती लगभग ८५ प्रतिशत चयन हुए उम्मीदवार शैक्षणिक योग्यता और अनुभव शिथिल करने से शिवाजी विद्यापीठ में कार्यरत कर्मचारियों में से हुई है ।
दुबार (डुप्लीकेट) प्रमाणपत्र मुद्रण का सूत्र भी दो समितयों को नियुक्त कर प्रलंबित रखना !
जुलाई २०१९ के ‘महाराष्ट्र टाइम्स’में शिवाजी विद्यापीठ के ५४ वें दीक्षांत समारोह में हस्ताक्षर की गडबड, निकृष्ट दर्जे का कागद, गलत रंगों में मुद्रण (छपाई), नाम में गलतियां, कुलसचिव के हस्ताक्षर को हटा देना, ऐसी अनेक चूकें हुईं । इसकारण लगभग २५ सहस्र प्रमाणपत्र रहित किए गए । इस संदर्भ में प्रस्तुत किए गए दो ब्योरों पर कोई भी निर्णय नहीं हुआ है । कोई भी कार्रवाई नहीं की है, जो दोषी हैं वे निवृत्त हो रहे हैं, उनकी मृत्यु हो जाती है अथवा नौकरी छोडकर चले जाते हैं । ऐसे अनेक कारणों से उन्हें बचाना सरल हो जाता है । इसलिए प्रकरण आगे-आगे ढकेलते रहना और भ्रष्टाचार करनेवालों की सहायता करना, इस पद्धति से विषय प्रलंबित रखकर पैसे खाए जा रहे हैं क्या ? या फिर विद्यापीठ की व्यवस्थापन समिति अकार्यक्षम है, ऐसा प्रश्न भी अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने इस अवसर पर उपस्थित किया ।
पत्रकार परिषद में की गई मांगें ….
१. शानभाग समिति और माने समिति का ब्योरा उजागर हो । अवैध गैरकानूनी नियुक्तियां रहित हों ।
२. दुबार (डुप्लीकेट) प्रमाणपत्र मुद्रण का निर्णय अब तक प्रलंबित है, ऐसे और कितने ब्योरे और प्रकरण दबाकर रखे हैं ? इसका अन्वेषण हो ।








