१. ‘केवल पैसा कमाना, यही जीवन का उद्देश्य है’, ऐसा दृष्टिकोण होना
‘केरल के हिन्दू उच्चशिक्षित हैं ! ये उच्चशिक्षित लोग विदेश जाकर नौकरी करते हैं अथवा भारत में ही किसी बडे पद की नौकरी कर पैसा कमाते हैं ।
२. हिन्दुओं का व्यक्तिगत जीवन में सुखी न होना
केरल में व्यक्तिगत जीवन में सुखी ऐसे हिन्दुओं की संख्या बहुत अल्प है ! यहां के घर घर में कोई न कोई बडी समस्या तो होती ही है, उदा. पति-पत्नि की नहीं जमती, बच्चे माता-पिता की नहीं सुनते अथवा उनमें झगडे होते हैं, तो कुछ परिवार के सदस्य बुरी आदतों के आधीन होते हैं ! यहां उपर्युक्त अथवा ऐसी अनेक समस्याएं हैं । केरल के बहुत से लोगों में ऋण लेने की आदत होती है; परंतु उसको चुकाते हुए उनको बहुत कष्ट होता है ! ये लोग ऋण के माध्यम से स्वयंपर आर्थिक समस्याएं ओढ लेते हैं, जैसे की ‘आ बैल मुझे मार !’
३. हिन्दू धर्म के संदर्भ में अधिक जानकारी न होते हुए भी कर्मकांड के प्रति बहुत विश्वास रखनेवाले केरल के हिन्दू !
३ अ. प्रतिदिन सुबह मंदिर जाना, वहां दिया जलाना एवं धन अर्पण करने जैसे कृत्यों को बहुत महत्त्व देना : केरल के हिन्दुओं को हिन्दू धर्म के संदर्भ में अत्यल्प जानकारी है; परंतु वे कर्मकांड पर बहुत विश्वास रखते हैं, जो महत्त्वपूर्ण है ! उन्हें प्रतिदिन सुबह अथवा सप्ताह में न्यूनतम एक बार तो मंदिर जाना महत्त्वपूर्ण लगता है । यहां के अनेक लोगों में ‘देवालय की हुंडी में धन अर्पण करने से, हमारा सब अच्छा होगा’, ऐसा विश्वास है । यहां के लोग अलग-अलग देवताओं के मंदिरों में जाकर दिया जलाना, अर्चना करना आदि कृत्य करते रहते हैं !

३ आ. अन्नदान के लिए बडी धनराशि का चंदा देना : यहां के लोग अन्नदान को बहुत महत्त्व देते हैं एवं उसके लिए कितनी भी बडी धनराशि का चंदा देने की उनकी सिद्धता होती है; क्योंकि ‘अन्नदान करने से बहुत पुण्य मिलता है’, ऐसे उनके विचार हैं ! वास्तव में अन्नदान के नाम पर बहुत अन्न व्यर्थ जाता है एवं उससे अन्न का अनादर भी होता है !
३ इ. धार्मिक ग्रंथों का पठन करना : यहां के लोग ललितासहस्रनाम एवं विष्णुसहस्रनाम इन ग्रंथों के पठन को बहुत महत्त्व देते हैं ! यहां के लोगों में यह मान्यता है कि श्रीमद्भागवत का श्रवण करने से बहुत लाभ मिलता है । अतः यहां के अनेक स्थानोंपर भागवत सप्ताहों का आयोजन किया जाता है । इस भागवत सप्ताह में दिन के सत्र में वयस्क लोग होते हैं । दोपहर में बाहर से अनेक लोग भोजन करने यहां आते हैं; परंतु भोजन के पश्चात उनमें से अत्यल्प लोग सहभाग लेते हैं !
४. उत्सव के समय अधिकाधिक हाथियों को मंदिर लाकर उत्सव को प्रतियोगिता का स्वरूप देनेवले एवं इन्हीं हाथियों के माध्यम से उत्सव के विध्वंस को शांति से देखनेवाले जन्महिन्दू !

उत्सव के दिन यहां के मंदिरों में अधिकाधिक संख्या में हाथि खडा करना महत्त्वपूर्ण माना जाता है ! यहां के मंदिरों में अधिकाधिक हाथि खडा करने की प्रतियोगिता होती है, उदा. एक मंदिर में ३ हाथी खडे किए गए, तो दूसरे मंदिर में ५ हाथी खडे किए जाते हैं । इनके ‘रामचंद्रन्’, ‘भाग्यलक्ष्मी’ जैसे नाम होते हैं । ‘कौनसे हाथी को मंदिर लाया गया ?’, इसे भी यहां महत्त्वपूर्ण माना जाता है । ये हाथी अन्य धर्मीय लोगों के होते हैं । हिन्दू लाखों रुपयों का किराया देकर इन्हें मंदिर में लाते हैं !
यहां का तापमान एवं शारीरिक थकान के कारण हाथी थक जाते हैं एवं माहुत के सूचनाओं को योग्य प्रतिसाद नहीं देते ! तब ये लोग उन पर अत्याचार करते हैं । उससे हाथी आक्रामक बनकर विध्वंस कर तोडफोड करते हैं । इसमें माहुत भी मारे जाते हैं; परंतु इतना होकर भी हिन्दू नहीं जागृत नही होते !
५. धर्मशिक्षा के अभाव के कारण निद्रिस्त हिन्दू !

धर्मशिक्षा के अभाव के कारण यहां के हिन्दुओं के मन में ‘सभी धर्म एक हैं’, यही प्रबल विचार रहता है ! व्यक्तिगत, जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर भी हिन्दुओं की स्थिति दयनीय है । ‘लव जिहाद’ घर-घरतक पहुंच गया है; परंतु ऐसा होते हुए भी यहां के हिन्दू निद्रिस्त हैं । यहां के हिन्दुओं को लव जिहाद के संदर्भ में कुछ बताया, तो वे ‘लव जिहाद का संकट हमारे यहां नहीं है’, ‘मेरी लडकियों का विवाह हो चुका है’, ‘हम हमारे धर्म को ही महत्त्व देते हैं; इसलिए आप हमें यह न बताएं’, ऐसा कहते हैं ! तो ऐसे हिन्दू जागृत कब होंगे ?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अथवा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट दल में कार्यरत इनका अपना बेटा जब इन दलों के नाम पर बलि चढेगा, उनकी लडकी जब लव जिहाद में फंसेगी एवं आईएसआईएस के आतंकी जब केरल में उधम मचाएंगे, तब ये हिन्दू जाग जाएंगे !
६. अन्य पंथियों के प्रभाव के कारण हिन्दुओं ने अपने ही स्वधर्म को भूल जाना
अन्य पंथियों ने हिन्दुओं के मन पर अपने पंथ को इतना प्रभावित किया है कि आज अनेक हिन्दू चर्च जाते हैं ! उन्हें उनका लडका अथवा लडकी ने यदि अन्य पंथियों की लडकी अथवा लडके से विवाह कर लिया, तो भी चलता है ! सौदी अरेबिया जैसे देश में धन अर्जित करने के लिए जानेपर विवाहित महिला ने बुरखा भी पहन लिया, तो भी उन्हें चलता है ! अन्य पंथियों के त्योहारों के समय उस पंथ के लोगोंद्वारा चलाए जानेवाले विद्यालयों में दोपहर का भोजनावकाश नहीं दिया जाता । उस समय हिन्दुओं के बच्चे भूखे रहते हैं; हिन्दू इसे भी चूपचाप सहन कर लेते हैं !
हिन्दुओं, अब तो जाग जाए ! जाति और संगठनों को छोडकर केवल और केवल हिन्दू धर्म के नाम से संगठित हों, तभी और तभी ईश्वर हमारी रक्षा करेंगे !’
– कु. प्रणिता सुखटणकर, केरल (२.३.२०१८)
स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात








