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नवरात्रि के समय देवी ‘देणगी दर्शन पास’ शुल्क में वृद्धि : सुविधाओं के नाम पर श्रद्धालुओं की लूट !

मंदिर के सरकारीकरण के दुष्परिणामों को जानिए !

तुलजापुर– श्री तुलजाभवानी देवी के दर्शन हेतु नवरात्रि के समय राज्यभर से भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं । इस काल में श्रद्धालुओं को सरलतापूर्वक दर्शन कैसे प्राप्त हों, इस पर विचार किए बिना श्री तुलजाभवानी मंदिर संस्थान ने ‘देणगी दर्शन पास’ के शुल्क में अत्यधिक वृद्धि कर दी है । ₹२०० का देणगी पास अब ₹३००, ₹५०० का पास सीधे ₹१००० तथा ‘विशेष अतिथि दर्शन पास’ ₹२०० से बढाकर ₹५०० कर दिया गया है । ये नवीन शुल्क २० सितम्बर से ८ अक्तूबर की कालावधि में लागू किए गए हैं । मंदिर संस्थान ने इसका कारण ‘नवरात्रि के समय श्रद्धालुओं की भीड बढ जाती है’ ऐसा बताया है । ‘श्रद्धालुओं को शीघ्र दर्शन प्राप्त हो’ इस नाम पर की गई यह वृद्धि, वास्तव में मंदिर संस्थान द्वारा सुविधा के नाम पर श्रद्धालुओं से की गई लूट है – ऐसी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं ।

“पैसे लेकर ‘विशेष अतिथि दर्शन पास’ देना ही अनुचित है” – सुनील घनवट, राष्ट्रीय संयोजक, मंदिर महासंघ

मंदिर-न्यास अधिवेशनात बोलतांना श्री. सुनील घनवट

वास्तव में सशुल्क दर्शन सेवा यह संपूर्ण रूप से अनुचित है । इससे श्रद्धालुओं में भेदभाव उत्पन्न होता है । दूर-दूर से आने वाले ऐसे भक्त जिनके पास ₹३०० से ₹५०० नहीं हैं, वे क्या करें ? ईश्वर की दृष्टि में ‘निर्धन एवं धनी’ सभी समान हैं, अतः सभी के लिए दर्शन की प्रक्रिया एकसमान होनी चाहिए । केवल आयवृद्धि के उद्देश्य से क्या मंदिर को एक व्यवसाय मान लिया गया है ? इस पर मंदिर संस्थान को विचार करना चाहिए । ‘देवी को भावभक्ति युक्त अंतःकरण से किया गया दर्शन प्रिय होगा या पैसे देकर दर्शन करने आया हुआ भक्त ?’ इस पर देवस्थान समिति को मंथन करना चाहिए । प्रत्येक बार हिन्दू पर्व आते ही शुल्क में वृद्धि करना यह अत्यंत अनुचित एवं अन्यायकारी है । अतः यह शुल्क तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए तथा ‘सशुल्क दर्शन सेवा’ यह पद्धति स्थायी रूप से समाप्त की जाए – ऐसी मंदिर महासंघ की मांग है ।

“शुल्क दर्शन का अर्थ है – देवीभक्तों की श्रद्धा व भावना को पैरों तले रौंदना तथा ईश्वर को सामान्यजन से छीन लेना” – अमरराजे कदम-परमेश्वर, अध्यक्ष, श्री तुलजाभवानी भोपे पुजारी मंडल

इस शारदीय नवरात्रि उत्सव में ‘वी.आई.पी. दर्शन’ की आड में मंदिर संस्थान ने पूर्व के शुल्क में अत्यधिक वृद्धि कर के देवीभक्तों की श्रद्धा व भावना को पैरों तले रौंदते हुए ईश्वर को ही सामान्य लोगों से दूर कर दिया है । मूलतः मंदिर संस्थान को सामान्य श्रद्धालुओं को ध्यान में रखकर उन्हें सरलतापूर्वक देवी के दर्शन कैसे प्राप्त हों, इस पर विचार करना चाहिए था, परंतु इसके विपरीत केवल आर्थिक आय के स्रोत के रूप में ‘शुल्क दर्शन’ की परंपरा आरंभ की गई है – इसका ‘भोपे पुजारी मंडल’ की ओर से इसका तीव्र विरोध किया जाता है ।

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