भक्त प्रल्हाद

बच्चो, प्रल्हाद की नामसाधना से भगवान नारायण ने प्रत्येक समय प्रल्हाद की सुरक्षा की । यदि हम भी नामस्मरण करें तो आपातकाल में प्रभु हमारी रक्षा करेंगे ! यह इस कथा से हम देखेंगे । Read more »

गणपति काे ‘चिंतामणि’ नाम कैसे मिला ?

बच्चो, गणपति ज्ञान के देवता हैं । ये हमारे बुदि्धदाता हैं । इन्हें सारे विघ्न दूर करनेवाले भगवान अर्थात `विघ्नहर्ता ‘ भी कहते हैं । आज देखते हैं, उनके दूसरे अनेक नामों में ‘चिंतामणि’ नाम उन्हें कैसे मिला । Read more »

सत्सेवा का महत्त्व !

सेवा का अर्थ है, भगवान को जो अच्छा लगे वह काम करना; भगवान के कार्य में सम्मिलित होना, यही भगवान की सेवा है । यदि हम काम में मां का हाथ बटाएं, तो मां को अच्छा लगेगा या नहीं ? तब मां हमें मिठाई देगी तथा हमें प्यार करेगी । उसी प्रकार हमने भगवान की सेवा की, तो भगवान भी हमें प्यार करेंगे । Read more »

श्रीगणेश एकदंत कैसे हुए ?

कार्तवीर्य का वध कर कृतार्थ हुए भगवान परशुरामजी कैलासपर गए । वहां उनकी भेंट सभी गणों से तथा गणाधीश गणपति से भी हुई । शंकरजी के दर्शन की इच्छा श्रीपरशुराम के मन में थी; परंतु उस समय शिव-पार्वतीजी विश्राम कर रहे थे ।
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गणपति का मारक रूप

बच्चों, आज हम अपने प्यारे गणपति बाप्पा की कथा से परिचित होंगे । हम सब गणपतिजी के तारक रूप से परिचित हैं, जिसमें गणपति का एक हाथ आर्शीवाद देनेवाला एवं करूणामय दृष्टि है । Read more »

पंढरपुरमें पांडुरंगकी मूर्तिकी स्थापना

`‘हे पांडुरंग, आपके चरण समचरण हैं । उनमें द्वैत नहीं है । ऐसे स्वरूपमें आप इन दो इंटोंपर (द्वैतपर) अद्वैत स्वरूपमें खडे हैं ।’’ Read more »