सुसंस्कारों का महत्त्व !

’सुसंस्कारित मन जीव को कहीं भी भटकने नहीं देता । इसीलिए बच्चों का मन सुसंस्कारित करना, यह बडों का, हिंदु धर्माचरण करनेवालों का, समाज का कर्तव्य है । Read more »

बच्चों को समयपर संस्कारित करना आवश्यक !

रेलगाडी से यात्रा करते समय एक प्रसंग देखा । उससे ‘आजकल के बच्चों को समयपर ही संस्कारित करने का कितना महत्त्व है’ यह ध्यान मे आया । यह प्रसंग प्रस्तुत लेख मे दिया है । Read more »

बच्चो, भगवानजी का पूजन-अर्चन उपासना आदि करें !

यदि भगवानजी का पूजन हो गया हो, तो स्नान के (नहाने के) उपरांत सर्वप्रथम भगवानजी के सामने खडे होकर हलदी-कुमकुम एवं पुष्प अर्पण करें । अगरबत्तीद्वारा भगवानजी की आरती उतारें (अगरबत्ती दिखाएं) । Read more »

माता-पिता को नमस्कार करने में लज्जा नहीं आनी चाहिए !

`मातृदेवोभव । पितृदेवो भव । (अर्थात माता-पिता देवता समान हैं ।)’, ऐसी हमारी महान हिंदू संस्कृति की सीख है । `माता-पिता तथा गुरू की सेवा करना, सबसे उत्तम तपस्या है’, ऐसा `मनुस्मृति’ ग्रंथमें कहा गया है । Read more »

बच्चों पर अल्पायु में ही संस्कार कैसे करें ?

संस्कार की नींव अर्थात अनुशासन । प्रत्येक कृति के लिए यदि अनुशासन, नियम नहीं बनाए, तो वह कृति अपूर्ण होती है । प्रात: उठने से लेकर रात्री सोनेतक अनुशासन का अचूकता से पालन करें, तो अध्यात्म में शीघ्र प्रगति होती है । उसके लिए बाल्यावस्था में ही अनुशासन का संस्कार बालमनपर अंकित करना चाहिए । Read more »

माता-पिता एवं घर के बडे व्यक्तियों को झुककर नमस्कार करें !

भारतीय परंपरानुसार संध्या के समय दिया-बाती के उपरांत घर से बाहर निकलते समय, यात्रा से घर लौटनेपर, नए कपडे परिधान करनेपर, ऐसे विविध प्रसंगों में घर के बडों के पैर छूने की रीति है । Read more »

माता-पिता से कैसा व्यवहार करें ?

माता-पिता एवं घर के सभी बडे व्यक्तियों को झुककर अर्थात उनके चरण छूकर प्रणाम करना चाहिए ।‘मातृदेवो भव । पितृदेवो भव ।’ अर्थात् ‘माता-पिता ईश्वर के समान हैं ।’ यह हमारी महान हिंदू संस्कृति की शिक्षा है । Read more »

बच्चों को अच्छी आदतें लगने हेतु उनपर करने योग्य घरेलू मानसोपचार

‘विश्व ही एक रंगभूमि है’, एक मानसशास्त्री कहता है, ‘‘घर ही प्राथमिक रंगभूमि है । वहां कौन से पात्र को कैसे निभाना है, यह बच्चे सीखते हैं ।’’ Read more »