कुबेर का अहंकार ! 

क्‍या आप जानते हैं कि, कुबेर कौन थे ? कुबेर रावण के भाई थे । कुबेर तीनों लोकों में सबसे धनवान हैं । अभी भी किसी धनवान व्‍यक्‍ति को समाज के लोग कहते हैं कि, उसके पास तो कुबेर का खजाना है ।

एक दिन कुबेर के मन में विचार आया कि उनके पास इतनी सारी संपत्ति है, परन्‍तु बहुत ही कम लोगों को इसकी जानकारी है । इसलिए उन्‍होंने अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करने के लिए एक भव्‍य भोज का आयोजन किया । अर्थात उन्‍हें अपनी संपत्ति का अहंकार हो गया था ।

उन्‍होंने इस भोज में तीनों लोकों के सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया ! भगवान शिव उनके इष्ट देवता थे । इसलिए उनका आशीर्वाद लेने वह कैलाश पहुंचे और नम्रता से भगवान शिव से बोले, ‘प्रभु, आज मैं तीनों लोकों में सबसे धनवान हूं । यह सब आप ही की कृपा है, मैं अपने निवास पर एक भोज का आयोजन करने जा रहा हूं । कृपया आप परिवार सहित भोज में पधारने की कृपा करें ! भगवान शिव तो अंर्तयामी हैं, वह यह जानते थे कि कुबेर को अपनी संपत्ति का अहंकार हो गया है और वह कुबेर के अंहकार को नष्‍ट करना चाहते थे, वह कुबेर से बोले कि, ‘वत्‍स ! मैं तो नहीं परंतु मेरा छोटा पुत्र गणेश तुम्‍हारे भोज में अवश्‍य आएगा । नियत समय पर कुबेर ने भव्‍य भोज का आयोजन किया, तीनों लोकों के देवी-देवता वहां पहुंच चुके थे ।

अंत मे वहांपर श्री गणेशजी आए और आते ही कुबेर से बोले कि, मुझे बहुत जोरों की भूख लगी है। भोजन कहां है ! कुबेर उन्‍हें लेकर भोजन से सजे कक्ष में पहुंचे । वहां कुबेर ने भगवान श्री गणेशजी को सम्‍मान सहित बिठाया । सोने की थाली में भोजन परोसा गया, क्षण भर में ही गणेशजी ने थाली में परोसा हुआ भोजन ग्रहण कर लिया । दोबारा भोजन परोसा गया, उसे भी श्री गणेशजी ने क्षणभर में ही समाप्‍त कर दिया । तब भी श्री गणेशजी की भूख नहीं मिटी थी । बार-बार खाना परोसा जाता और क्षण भर में गणेश जी उसे समाप्‍त कर देते । थोडी ही देर में कुबेर द्वारा भोज में बनाये गए सभी भोजन श्री गणेश जी ने देखते ही देखते समाप्‍त कर दिया । परंतु तब भी श्री गणेशजी की भूंख शांत नहीं हुई ! वह रसोईघर में पहुंचे और वहां भोजन बनाने के लिए रखा सारा कच्‍चा सामान भी खा गए, तब भी उनकी भूख नहीं मिटी । जब सब कुछ समाप्‍त हो गया तो श्री गणेशजी ने कुबेर से कहा, जब तुम्‍हारे पास मुझे खिलाने के लिए कुछ था ही नहीं तो तुमने मुझे न्‍योता ही क्‍यों दिया था ? श्री गणेशजी का यह प्रश्‍न सुनकर कुबेर का अहंकार चूर-चूर हो गया ।

इससे आपके ध्‍यान में आया होगा कि आपके पास कितना भी ज्ञान क्‍यों ना हो यदि आप सामने वाले को संतुष्ट नहीं कर सकते, उसकी ज्ञान रुपी भूख को शांत नहीं कर सकते तो आप के विद्वान होने का कोई अर्थ नहीं है ।