एकलव्य की गुरुदक्षिणा

एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य से पूछा, गुरुदेव, क्या आप मुझे धनुर्विद्या सिखाने की कृपा करेंगे ?’’ गुरु द्रोणाचार्य के समक्ष समस्या उत्पन्न हो गई; क्योंकि उन्होंने पितामह भीष्म को वचन दिया था कि केवल राजकुमारों को ही विद्या सिखाएंगे । Read more »

गुरुकृपा प्राप्त करने के लिए स्वभावदोष-निर्मूलन का अनिवार्य होना !

‘स्वभावदोष-निर्मूलन’ अष्टांगसाधना का महत्त्वपूर्ण अंग है । इन स्वभाव दोषों के त्याग के बिना साधक के लिए गुरुकृपा तक पहुंचना असंभव है । साधना में स्वभावदोष-निर्मूलन का महत्त्व निम्नलिखित कथा से ध्यान में आता है । Read more »

गुरु द्रोणाचार्य एवं शिष्य अर्जुन !

शिष्य इतना जिज्ञासू हो कि गुरु का अंतःकरण अभिमान से भर जाए ! इसका उत्तम उदाहरण है अर्जुन ! प्रस्तुत कथा पढकर यह हमे ध्यान में आएगा । Read more »

छत्रपति शिवाजी महाराज की गुरुभक्ति !

छत्रपति शिवाजी महाराज अपने गुरुदेव समर्थ रामदास स्वामी के एकनिष्ठ भक्त थे । यह देख अन्य शिष्यों को लगा, ‘‘शिवाजी के राजा होने से ही समर्थ उनसे अधिक प्रेम करते हैं !’’ समर्थ रामदासस्वामी ने यह भ्रम त्वरित दूर करने का संकल्प लिया । Read more »

स्वामी विवेकानंदजी की अपने गुरु के प्रति नि:स्वार्थ भक्ति दर्शानेवाली प्रेरक कथा !

स्वामी विवेकानंदजी ने देवी जगदंबामाता के पास केवल ‘ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य’ की मांग की थी । यह क्यूं किया, इसका स्पष्टीकरण देते हुए स्वामी विवेकानंदजी कहते हैं, Read more »

शिष्य की परीक्षा

रामानुजाचार्य शठकोपस्वामीजीके शिष्य थे । स्वामीजीने रामानुजजीको ईश्वरप्राप्तिका रहस्य बताया था । परंतु उसे किसीको न बतानेका निर्देश दिया था; किंतु रामानुजजीने अपने गुरुकी इस आज्ञाको नहीं माना.. Read more »

श्रीगुरु की आज्ञापालन हेतु स्वयं को झोंक देनेवाला शिष्य आरुणी !

प्राचीन समय में धौम्य नामक मुनि का एक आश्रम था । उस आश्रम में उनके अनेक शिष्य विद्याभ्यास के लिए रहते थे । उनमें आरुणी नामक एक शिष्य था । एक समय धुंआधार वर्षा होने लगी । Read more »

शिवाजी महाराज की गुरुभेंट

समर्थ रामदास स्वामीजी की ख्याति सुननेपर छ.शिवाजी महाराज को उनके दर्शन की लालसा निर्माण हुई । उनसे मिलने के लिए वे कोंढवळ को गए । वहां भेट होगी इस आशा से सायंकालतक रुके, तब भी महाराज की स्वामीजी से भेंट नहीं हुई । Read more »