अर्जुन को पाशुपत अस्‍त्र की प्राप्ति ! 

हम सभी को महाभारत का युद्ध पता है । इस युद्ध में बडे-बडे महारथी सम्‍मिलित हुए थे और उनके पास एकसे बढकर एक अस्‍त्र-शस्‍त्र थे । शस्‍त्र क्‍या होता है, जो शरीर के बल से चलाए जा सकते है, वे शस्‍त्र होते है; परंतु अस्‍त्र क्‍या होते है ? जिन शस्‍त्रों को चलाने के लिए शरीर का बल नहीं, तो मंत्रों की शक्‍ति आवश्‍यक होती है, वे अस्‍त्र होते है । महाभारत के युद्ध में अनेक अस्‍त्रों का उपयोग किया गया था, जिसका परिणाम अत्‍यंत भयंकर होता था । धनुर्धारी अर्जुन के पास ऐसा ही एक अस्‍त्र था, जिसका नाम पाशुपत अस्‍त्र था । यह अस्‍त्र अर्जुन ने भगवान शिवजी से प्राप्‍त किया था । आज हम यही कहानी सुनेंगे कि अर्जुन को इस अस्‍त्र की प्राप्‍ति कैसे हुई ।

पांडव और कौरवों में द्यूत खेला गया था । जिसमें पांडव अपना सबकुछ हार गए थे, जिस कारण उन्‍हे १२ वर्ष का वनवास और १ वर्ष के अज्ञातवास के लिए जाना पडा । कौरवों ने पांडवों का छल और द्रौपदी का अपमान किया था । अपना राज्‍य वापस पाने के लिए द्रौपदी धर्मराज युधिष्‍ठिर को कौरवों से युद्ध करने के लिए कहती । बलवान भीम भी द्रौपदी की बात का पक्ष लेते ।

इसके बारे में महर्षि व्‍यासजी ने पांडवों को सलाह दी । व्‍यासजी ने पांडवों से कहा, ‘‘भविष्‍य में यदि युद्ध हुआ, तो उसके लिए आपको अभी से शक्‍ति बढानी आवश्‍यक है ।’’

महर्षि व्‍यासजी के मार्गदर्शन के अनुसार अर्जुन शस्‍त्र और अस्‍त्र प्राप्‍त करने के लिए निकले । इन्‍द्रदेव को तप से प्रसन्‍न करने के लिए अर्जुन हिमालय के इन्‍द्रकील पर्वत पर गए । वहांपर उन्‍होंने अपना तप आरम्‍भ किया । इन्‍द्रदेव ने अर्जुन की परीक्षा लेनी चाही । उन्‍होंने अर्जुन के पास अप्‍सराओं को भेजा; परंतु अर्जुन की तपस्‍या भंग नहीं हुई ।

इसके बाद इंद्रदेव ने एक वृद्ध मुनि का वेष धारण किया । वे अर्जुन के पास गए और बोले, ‘‘तुम इतनी घोर तपस्‍या क्‍यों कर रहे हो ? तपस्‍या से मिलनेवाला फल नाशवान है । नाशवान वस्‍तु को पाने के लिए तपस्‍या करने की अपेक्षा तुम भगवान के प्राप्‍ति के लिए तपस्‍या करो।’’ उस समय अर्जुन ने ब्राह्मण वेशधारी इन्‍द्रदेव को कौरवों के द्वारा किए गए छल एवं अन्‍याय के बारे में बताया । अर्जुनने कहा, ‘‘मुनिवर, शत्रु से प्रतिशोध लेना अनिवार्य है । अन्‍याय का प्रतिकार करना यह सामाजिक कर्तव्‍य का पालन है । इसलिए मैं तपस्‍या कर रहा हूं ।’’ अर्जुन की बातें सुनकर इन्‍द्रदेव अपने मूल रूप में प्रकट हो गए और उन्‍होंने अर्जुन को शिवजी की तपस्‍या करने के लिए बताया ।

अर्जुन फिर से घोर तपस्‍या में लीन हो गए । जटा, वल्‍कल और मृगचर्म, साथ में गांडीव धनुष धारण किए तपस्‍वी जैसे अर्जुन का वेश हो गया था । इन्‍द्रनील पर रहनेवालों को अर्जुन अपरिचित थे । यह तपस्‍वी हमें हानि तो नही पहुंचाएगा, ऐसी वहां रहनेवाले गणों को आशंका हुई । सभी गण उस अज्ञात तपस्‍वी के बारे में शिवजी के पास निवेदन के लिये गए । उस समय भगवान शिवजी दुसरा वेश परिधान कर वहां गए । तभी भगवान शिवजी के आज्ञा से एक दानव ने शूकर का शरीर धारण किया और अर्जुन को मारने के लिए झपटने लगा । उस समय शूकर को मारने के लिए शिवजी और अर्जुन दोनों ने एक साथ बाण चलाए, जिससे सूअर मर गया । अर्जुन जब अपना बाण उसके शरीर से निकालने गए, उसी समय शिवजी ने भी अपने एक गण को शूकर को लाने के लिए भेजा । अर्जुन, गण दोनो शूकर पर अधिकार बताने लगे । जिस कारण विवाद खडा हो गया । अंत में अर्जुन और शिवजी के बीच युद्ध आरम्‍भ हो गया । अर्जुन गणों की सेना के ऊपर बाणों की वर्षा करने लगे; परंतु शिवजी के साथ हुए युद्ध में परास्‍त हो गए । अर्जुन ने सेनापति का रूप धारण किए शिवजी को समर्पण किया । उस समय शिवजी अर्जुनपर प्रसन्‍न होकर मूल रूप में प्रकट हुए और अर्जुन को वर मांगने के लिए कहा । तब अर्जुन ने उनसे पाशुपत अस्‍त्र की इच्‍छा प्रकट की । उस समय भगवान शिवजी ने अर्जुन को पाशुपत अस्‍त्र प्रदान किया और उसका प्रशिक्षण भी दिया ।

पाशुपत अस्‍त्र अत्‍यंत विध्‍वंसक होता है । यह अस्‍त्र केवल भगवान शिवजी, मां काली और आदिशक्ति के पास ही है । मन के केवल विचार से यह अस्‍त्र छोडा जाता है । इसी पाशुपत अस्‍त्र से अर्जुन ने जयद्रथ का वध किया था ।