संपत्ति से भक्‍ति श्रेष्‍ठ

चोलराज और विष्‍णुदास नाम के दो मित्र थे । दोनो भगवान श्रीविष्‍णुजी के भक्‍त थे । चोलराज यह चक्रवर्ती सम्राट था । वह धनवान और दानवीर था । इसके विपरीत विष्‍णुदास एक गरीब परंतु विद्वान ब्राह्मण था । दोनो प्रतिदिन भगवान श्रीविष्‍णुजी के एक मंदिर मे पूजा करने के लिए जाते थे । Read more »

भक्‍त कूर्मदास

पैठण गाव मे कूर्मदास नाम का एक व्‍यक्‍ति था । वह जन्‍म से ही विकलांग था । उसके हाथ और पांव नही थे । एक दिन उसके गाव के मंदिर में कीर्तन था । कीर्तन में विठ्ठल के पंढरपूर क्षेत्र का अलौकिक महीमा बताई । वह सुनकर कूर्मदास ने ‘पंढरपूर जाना ही है’, यह निश्‍चित ही कर लिया । Read more »

पितृभक्‍त सोमशर्मा

शिवशर्माजी ने अपने छोटे पुत्र सोमशर्मा को अमृत के घडे की रक्षा करने के लिए कहा । अमृत का घडा अपने पुत्र के पास देकर वह स्‍वयं पत्नी के साथ तीर्थयात्रा करने चले गए । दस वर्ष बाद शिवशर्माजी अपने पुत्र के पास लौटे । पुत्र की परीक्षा लेने का विचार उनके मन में आया । Read more »

भक्‍त कृष्‍णाबाई !

एक गांव में कृष्‍णा बाई नाम की बूढी माताजी रहती थी.. वह भगवान श्रीकृष्‍ण की परमभक्‍त थी । वह घर-घर जाकर झाडू, पोछा, बर्तन मांजना और खाना बनाना ऐसे काम करती थी और अपना भरण-पोषण करती थी । एक रात श्रीकृष्‍ण जी ने अपनी भक्‍त कृष्‍णाबाई से कहा कि कल बहुत बडा प्रलय आनेवाला है.. पूरा गांव पानी में डूबनेवाला है । तुम यह गांव छोडकर दूसरे गांव चली जाओ । Read more »

सकारात्‍मक सोच !

एक गांव में दो किसान रहते थे । दोनों ही बहुत गरीब थे, दोनों के पास थोडी थोडी खेती की जमीन थी, दोनों उसमें ही मेहनत से खेती कर के अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे । कुछ समय पश्‍चात दोनों की एक ही दिन एक ही समय पर मृत्‍यु हो गई । यमराज दोनों को एक साथ भगवान के पास ले गए । भगवान ने उन्‍हें देखा और उनसे पूछा.. Read more »

शरणागत की पुकार !

जब रामलगनजी आठ वर्ष के थे, उनकी माता उन्‍हें हनुमानजी के द्वारा लंका दहन की कथा सुना रही थी । उसी समय लगभग पंद्रह – सोलह डाकू घर में घुस आए । तब रामलगनजी ने हनुमानजी का स्‍मरण किया और शरणागति से पुकारा, ‘हनुमान जी ! मेरे हनुमान जी ! हमारी रक्षा करें ! Read more »

उचित दान का महत्त्व !

एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती भ्रमण पर निकले । रास्‍ते में उन्‍होंने देखा कि एक तालाब में कई बच्‍चे तैर रहे थे । सभी तालाब के किनारे से छलांग लगाकर तैरने का आनंद ले रहे थे । उसी तालाब के किनारे एक पेड के नीचे एक बच्‍चा अत्‍यंत उदास मुद्रा में बैठा था । Read more »

कन्‍हैया की मुरली !

भगवान श्रीकृष्‍णजी की पूजा करनेवाले पुजारी अपने पुत्र के साथ वहीं रहते थे । पुजारी प्रतिदिन श्रीकृष्‍णजी की सेवा मंदिर में बडी श्रद्धा भाव से करते थे । उनका पुत्र भी धोती कुर्ता पहनकर सिर पर छोटी सी चोटी करके पुजारीजी के साथ आता था और उनको सेवा करते हुए देखता था । Read more »

भक्‍त की पीडा स्‍वयंपर लेनेवाले भगवान श्रीकृष्‍ण !

गुजरात राज्‍य में श्री द्वारकापुरी के समीप डाकोर नाम का एक गांव है, वहां श्री रामदासजी नाम के भगवान श्रीकृष्‍ण के एक भक्‍त रहते थे । वह प्रत्‍येक एकादशी को द्वारका जाकर भगवान श्रीकृष्‍णजी के मंदिर में जागरण और कीर्तन करते थे । Read more »

नाम का आश्रय !

गोपी दूध दही बेचने चली । बीच में यमुना जी थी । गोपी को संत की बात का स्‍मरण हुआ, संत ने कहा था भगवान का नाम तो भवसागर से पार लगाने वाला है । गोपी ने मन ही मन सोचा कि जिस भगवान का नाम भवसागर से पार लगा सकता है तो क्‍या उन्‍ही भगवान का नाम मुझे इस साधारण सी नदी से पार नहीं लगा सकता ? Read more »