आत्मस्वरूपका प्रकटीकरण करनेवाली शिक्षा ही सत्य !

‘जो केवल अपना ही सुख-दुःख समझता है, उस मनुष्यको ‘पशु’की संज्ञा भारतीय संस्कृति देती है और जो दूसरेका सुख-दुःख समझता है और भारतीय संस्कृति मनुष्यकी ऐसी व्याख्या करती है कि जो दूसरेके दुःखसे दुःखी होता है एवं दूसरेके सुखसे सुखी होता है, वही ‘मनुष्य’ है । इसलिए श्री आद्य शंकराचार्य कहते हैं, ईश्वरका साक्षात्कार करवानेके लिए जिन तीन बातोंकी पूंजी मनुष्यके पास होना आवश्यक है, उसमें सबसे प्रथम महत्त्व मनुष्यत्वका है ।

‘मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः ।’ (अर्थात मनुष्यके रूपमें जन्म लेना, मुमुक्षुत्व और उन्नतोंका सहवास) ऐसी ये तीन बाते हैं । मनसे मनुष्य होना, ऐसी शिक्षाकी व्याख्या भारतीय संस्कृति करती है ।

कर्म, उपासना और ज्ञानकाण्डके आप कितने भी अनुष्ठान करें; परन्तु जबतक आपको दूसरेपर प्रेम करनेकी कला प्राप्त नहीं हुई, तबतक आप मनुष्यजीवनकी सार्थकता जिस ईश्वरप्राप्तिमें है, वहांतक पहुंच नहीं सकते है । सत्य तो इतना ही है कि केवल उस त्रिकाण्डके अनुष्ठानसे वेदविद्याकी रक्षा और परम्परा टिकी रही । धीरे-धीरे इसमें अन्तर्भूत आचारविचारसंपन्नता नष्ट होनेके कारण उनका मूलभूत उद्देश्य साध्य नहीं होता । जबतक आपको दूसरेपर प्रेम करनेकी कला प्राप्त नहीं होती, तबतक राष्ट्र सुखी होना असम्भव । प्रेम करनेकी इस कलाको ही भक्ति कहते है । ऐसा करनेसे कर्मयोग और ज्ञानयोगकी परिणती भक्तिमें होती जाती है और वही इन तीनों काण्डोंके अनुष्ठानका उद्देश्य है । इसके अतिरिक्त आप धर्मके अंगोंके बाह्य आभूषणोंसे कितने भी अलंकृत होंगे, उसका कोई उपयोग नहीं ।

इसीको वास्तविक शिक्षा कहते है । हम ऐसा कह सकते है कि आपकी शिक्षाका अन्तिम ध्येय आत्मलाभ है । हममें विद्यमान मूलभूत, सूक्ष्म ऐसे आत्मस्वरूपका आविष्कार (प्रकटीकरण) जिससे होता है, उसे शिक्षा कहते है ।’

– पू. काणेमहाराज, नारायणगाव, महाराष्ट्र.

सन्दर्भ : सनातनका ग्रन्थ ‘ईश्वरीय राज्यकी स्थापना’