श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

तिथि

         भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि, रोहिणी नक्षत्र के होते हुए जब चंद्र वृषभ राशि में स्थित था, तब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ ।

महत्त्व

         जन्माष्टमीपर श्रीकृष्णतत्त्व प्रतिदिन की तुलना में १००० गुना अधिक कार्यरत होता है । इस तिथिपर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।’ नामजप तथा श्रीकृष्णजी की अन्य उपासना भावपूर्ण करने से श्रीकृष्णतत्त्व का अधिक लाभ मिलता है ।

श्रीकृष्णजी का  का नामजप यहा सुने !

श्रीकृष्णजन्माष्टमी व्रत

          यह व्रत श्रावण कृष्ण अष्टमी को किया जाता है और दूसरे दिन अर्थात् श्रावण कृष्ण नवमी के दिन पारण कर व्रत की समाप्ति होती है । यह व्रत सर्वमान्य है । इस व्रत का फल है, पापनाश, सौख्यवृद्धि, संतति-संपत्ति और वैकुंठप्राप्ति ।

उत्सव मनाने की पद्धति

         इस दिन संपूर्ण दिन उपवास रखकर रातके बारह बजे, पालने में बालकृष्ण का जन्म मनाया जाता है एवं फिर प्रसाद लेकर उपवास छोडते हैं अथवा अगले दिन सवेरे दहीमिश्रण (कलेवा)का प्रसाद लेकर उपवास छोडते हैं ।

श्रीकृष्ण की पूजा कैसे करें ?

         भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ, इसलिए स्नान कर पूजा भी उसी समय अर्थात् निशिथकाल में की जाती है । पूजा करते समय श्रीकृष्ण को अनामिका से गंध (चंदन) लगाकर तुलसी और कृष्णकमल चढाएं । चंदन, केवडा, चमेली, चंपा, जाही अथवा खस, इनमें से एक सुगंध की २ उदबत्तियों से आरती उतारें । इसके पश्चात् तीन अथवा तीन की गुना में परिक्रमाएं लगाएं ।

भगवान श्रीकृष्णजी के पूजन में कृष्ण-कमल एवं तुलसी के उपयोग का कारण

तुलसी

कृष्ण-कमल

         कृष्णकमल एवं तुलसी में श्रीकृष्णजी के महालोक तक के पवित्रक आकृष्ट कर उन्हें प्रक्षेपित करने की क्षमता होती है । इसीलिए श्रीकृष्णजी को कृष्णकमल के फूल एवं तुलसी अर्पित करने से श्रीकृष्णजी की प्रतिमा में विद्यमान चैतन्य का लाभ पूजक को शीघ्र प्राप्त होता है । श्रीकृष्णजी को फूल तीन अथवा तीन गुना संख्या में तथा दीर्घवृत्ताकार अर्थात् एलिप्टिकल आकार में चढाने से उन फूलों की ओर कृष्णतत्त्व शीघ्र आकृष्ट होता है ।

श्रीकृष्ण तत्त्व आकृष्ट करनेवाली रंगोली

दहीकाला

         विविध खाद्यपदार्थ, दही, दूध, मक्खन इत्यादि के मिश्रण से कलेवा बनता है । श्रीकृष्णने व्रजमंडल में गौ चराते समय स्वयं अपना एवं साथियों का कलेवा एकत्रित कर, उन खाद्य पदार्थों का मिश्रण बनाया एवं सभी के साथ मिलकर खाया । इस कथा के अनुसार आगे गोकुलाष्टमी के अगले दिन कलेवा करने की एवं दही-हंडी फोडने की प्रथा आरंभ हुई ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘ त्योहार, धार्मिक उत्सव व व्रत ‘

‘मधुराष्टकम्’ सुनने के लिये यहा क्लिक करे !