कुछ वेदसूक्त स्त्रियों के नाम से हैं, तो वेदमंत्र पठन का विरोध किसलिए ?

आलोचना : कुछ वेदसूक्त स्त्रियों के नाम से हैं, तो वेदमंत्र पठन का विरोध किसलिए ? पूरे जगत की आर्यसमाजी स्त्रियां वेदपठन करती हैं । इतना ही नहीं, सनातनी हिन्दू लोग भी लडकियों से वेदपाठ करवाते हैं । उन्हें पंडिता एवं पुरोहित बनाते हैं ।’ – आर्यसमाजी

खंडन : वेद में लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, वागाम्भृणी इन स्त्रियों के सूक्त हैं, यह सत्य है । वे ऋषिकन्या एवं ब्रह्मवादिनी थीं । उन्हें वेदमंत्र स्फूरित हुए । उनके मुख से एकाएक ये मंत्र निकले । वेद अपौरुषेय हैं । जो ऋषि हैं, वे त्रिकालदर्शी हैं । इन ब्रह्मवादिनी स्त्रियों के मुख से वे सूक्त प्रकट हुए । वे भी त्रिकालदर्शी हैं ।

इसका अर्थ यह नहीं है कि वे वेदपठण करती थीं । वैसा कहीं निर्देश नहीं । किसी भी प्राचीन, पारंपारिक आचार्यों ने स्त्रियों को वेद नहीं सिखाए । उसका आध्यात्मिक कारण यह है कि पुरुषों के जननेंद्रिय शरीर के बाहर होने से वेदमंत्रों से उत्पन्न ऊर्जा का उनपर दुष्प्रभाव नहीं होता । इसके विपरीत स्त्री का गर्भाशय शरीर के भीतर होने से उस ऊर्जा के प्रभाव से स्त्री को गर्भाशय से संबंधित विकार होने की संभावना है; इसलिए ‘स्त्रियों को वेदपठन नहीं करने चाहिए’, ऐसा नियम है ।

– गुरुदेव डॉ. काटेस्वामी (साप्ताहिक सनातन चिंतन, १० मई २००७ एवं घनगर्जित, नवंबर २००८)

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