Menu Close

शिष्यत्व का महत्त्व एवं शिष्य बनने हेतु आवश्यक गुण

5_characteristic_guru

१. गुरु-शिष्य परंपरा : भारत को विश्वगुरु बनानेवाली सर्वश्रेष्ठ परंपरा !

        गुरु-शिष्य परंपरा हिन्दू धर्म की सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक परंपरा है । यह परंपरा श्रीविष्णु तथा नारदमुनि से प्रारंभ हुई । इस परंपरा को श्रीरामकृष्णादि अवतारों ने भी निभाया । हिन्दू धर्म के उत्कर्ष हेतु प्रयत्नरत अनेक गुरु-शिष्य परंपराओं के कारण वह समृद्ध हुई । भारतवर्ष द्वारा अनेक युगों से संजोई गई यह परंपरा ही देश का सर्वोत्कृष्ट वैभव है तथा इसी वैभव के कारण भारतभूमि आध्यात्मिक दृष्टि से सामर्थ्यवान एवं ‘विश्वगुरु’ के पद पर विराजमान है ।

        प.पू. गुलाबराव महाराजजी से एक विदेशी ने पूछा, भारत की ऐसी कौन-सी विशेषता है, जो न्यूनतम शब्दों में बताई जा सके ? इस पर उन्होंने उत्तर दिया, ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ ! यह उत्तर कितना अर्थपूर्ण है !

२. शिष्य होने का महत्त्व

        साधना के अनेक मार्गों में से शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति की दृष्टि से श्रेष्ठतम मार्ग है ‘गुरुकृपायोग’; परंतु अधिकांश लोगों को जानकारी नहीं होती कि गुरुप्राप्ति हेतु निश्चितरूप से क्या करना चाहिए; इस कारण अपने मन से गुरु करना, किसी गुरु का सांप्रदायिक जप करना इत्यादि गलतियां उनसे होती हैं । इससे साधकों का केवल वर्तमान जन्म ही नहीं, कई जन्म व्यर्थ जाते हैं । यदि हम ‘शिष्य’ पद के लायक होंगे, तभी कोई गुरु अथवा संत हमें शिष्यरूप में स्वीकार करेंगे ।

        गुरुप्राप्ति हेतु एवं गुरुकृपा का प्रवाह सतत होने हेतु शिष्य होने की दृष्टि से साधक में कौन-से गुणों का होना आवश्यक है,  इस संदर्भ में कुछ सूत्र हम इस लेख में देखेंगे ।

 ३. शिष्य : व्याख्या एवं अर्थ

        आध्यात्मिक उन्नति हेतु जो गुरु द्वारा बताई साधना करता है, उसे शिष्य कहते हैं । कुलार्णव तंत्र में शिष्य की व्याख्या कुछ इस प्रकार की गई है, ‘जो तन, धन एवं प्राण (अर्थात सर्वस्व) गुरुको समर्पित कर उनसे योग सीखता है (अर्थात गुरु द्वारा बताई साधना करता है), वह शिष्य कहलाता है । (इसी कारण पत्नी एवं संतान का त्याग कर यदि शिष्य गुरु के पास जाए, तब भी उसे पाप नहीं लगता ।)’

४. शिष्यत्व का महत्त्व

अ. देव, ऋषि, पितर एवं समाज, ये चार ऋण शिष्य को चुकाने नहीं पडते

आ. श्री गुरुगीता में कहा गया है –

        ‘गुरुपुत्र कहलाने योग्य कोई गुरुसेवक शिष्य यदि व्यवहार में नासमझ हो, तब भी उसकी दीक्षा, व्रत, तप इत्यादि साधना सिद्ध होती है । जो गुरुसेवक नहीं हैं, उन्हें ऐसा फल नहीं प्राप्त होता ।। १५१ ।।’

        गुरुपुत्र अर्थात शिष्य । नासमझ अथवा मूर्ख अर्थात बाह्यतः मूर्ख प्रतीत होनेवाला । वेदों का सिद्धांत है कि शिष्य बाह्यतः भले ही मूर्ख हो, तब भी उसके पास जानेवाले की सर्व इच्छाएं पूर्ण होती हैं । – श्री रंगनाथस्वामीकृत

इ. इस संसार में केवल गुरु-शिष्य का नाता ही पवित्र माना गया है । यही एक नाता खरा है । गुरु-शिष्य के संबंध केवल आध्यात्मिक स्वरूप के होते हैं । शिष्य को एक ही भान होना चाहिए – ‘मेरा उद्धार हो’; गुरु को भी एक ही भान रहता है कि, ‘इसका उद्धार होना चाहिए ।’ गुरु-शिष्य का नाता आयु पर नहीं, अपितु ज्ञानवृद्धि एवं साधनावृद्धि पर आधारित होता है । जीवसृष्टि के सर्व प्राणी ज्ञान और साधना के माध्यम से अभिवृद्धि साध्य करते हैं । शेष समस्त नाते भय अथवा सामाजिक बंधनों के कारण उत्पन्न होते हैं; इसलिए उनके व्यवहार भी सीमित होते हैं और उन नातों में अहं (मैं पन) रहता ही है । उन नातों में ज्ञान और साधना का मूल्य शून्य होता है । ‘मैं’ पन के कारण ही ऐसे नाते टिके रहते हैं । अहंभाव कायम रखनेवाले सर्व नाते असत्य (अर्थात मायाजनित) होते हैं ।

५. शिष्य के गुण

१. मुमुक्षुत्व
२. आज्ञापालन
३. विश्वास, श्रद्धा, भाव एवं भक्ति
४. सर्वस्व का त्याग करनेवाला
५. अर्पण की गई वस्तु का विचार न करनेवाला
६. नम्रता
७. गुरुसेवा
८. संपूर्ण शरणागति
९. गुरुसान्निध्य में रहनेवाला
१०. गुरु को मान देनेवाला
११. साधकत्व के गुणोंवाला
१२. गुरुकार्य से संबंधित प्रत्येक बात सीखने की तीव्र लगनवाला व जिज्ञासु
१३. गुरु का मन जीत पानेवाला
१४. गुरु का अनुकरण न करें !
१५. ‘अहं’ विरहित
१६. कृतज्ञता
१७. गुरु के प्रति अनन्यभाव
१८. जिसके लिए सद्गुरु ही सर्वस्व हैं
१९. दूसरों को कष्ट न होने देनेवाला
२०. औरों का शिष्य के प्रति विश्वास होना
२१. नेतृत्वगुण संपन्न
२२. गुरुबंधुओं की उन्नति की ओर जिसका ध्यान है
२३. पूर्णत्व प्राप्ति के पश्चात भी पूर्णत्व के संरक्षण हेतु गुरुचरण के प्रति अनन्यता रखनेवाला

६. गुरु ‘करना’

        वास्तव में गुरु कोई ‘करने’ की वस्तु नहीं है । गुरु को ही हमें शिष्य के रूप में स्वीकारना चाहिए । हम नहीं जान सकते कि अमुक व्यक्ति सचमुच संत अथवा गुरुपद के अधिकारी हैं या नहीं । डॉक्टर, वकील के पास तो पदवी का प्रमाणपत्र होता है; परंतु अध्यात्मका विषय तो शब्दों के परे है, वहां प्रमाण के रूप में क्या पहचान है ? आज के समय में लगभग ९८% लोग जो साधु-संत दिखते हैं वे ढोंगी होते हैं ।

        फिर ऐसे में हमें क्या करना चाहिए – अपने में शिष्यत्वका स्तर निर्माण करनेकी दृष्टिसे प्रयत्न । वे गुण जब हम आत्मसात कर लेंगे, तो गुरु हमारे जीवन में स्वयं ही आ जाएंगे । उसके लिए कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है ।

७. शिष्यावस्था के चरण

१. जिसे खेद होता है कि गुरु द्वारा बताई गई उन्हें अपेक्षित ‘एकाध छोटी-सी कृति भी मुझसे नहीं हुई’, वही सच्चा शिष्य है ।

२. अगले चरण में उपर्युक्त भावना तीव्र होती है और वह उस पर उपाय ढूंढता है ।

३. ये उपाय वह तुरंत कृति में लाता है ।

४. सतत उसे ध्यान रहता है कि, ‘मैं कहीं गलत तो नहीं, गुरुसेवा में कहीं कम तो नहीं पड रहा ?’

५. निरंतर अन्यों की सुनने की वृत्ति, अपनी एवं अन्यों की गलतियों से सतत सीखने की वृत्ति, तत्परता, उत्कंठा, गुरु के प्रति कृतज्ञता एवं शरणागति का भाव रखनेवाला ही गुरु को जो कृति अपेक्षित है, वह पहचानकर कर सकता है ।

६. सर्व गुण एक-दूसरे के लिए पूरक होते हैं एवं एक गुण वृद्धिंगत करने के लिए दूसरे गुण सहायता करते हैं । श्रृंखला की एक कडी जिस प्रकार दूसरी को पकडकर रखती है एवं प्रत्येक कडी का अपना महत्त्व होता है, उसी प्रकार सर्व गुण महत्त्वपूर्ण होते हैं ।

८. शिष्य के किस आचरण से कितनी मात्रा में गुरुकृपा संभव है ?

शिष्य की कृति गुरुकृपा
१. केवल दर्शन देना
२. केवल आध्यात्मिक प्रश्न पूछना १०
३. आश्रम के काम करना ४०
४. आधे समय अध्यात्म का परिणामकारक प्रसार करना ७०
५. पूर्ण समय अध्यात्म का परिणामकारक प्रसार करना १००

९. शिष्य का गुरु के प्रति त्याग का महत्त्व

        किसी विषयवस्तु का त्याग करने से व्यक्ति की उसके प्रति आसक्ति घट जाती है । तन के त्याग से देहभान भी क्षीण होता है और देह ईश्वरीय चैतन्य ग्रहण कर पाता है । मन के त्याग से मनोलय होता है तथा विश्वमन से एकरूपता साध्य होती है । बुद्धि के त्याग से व्यक्ति की बुद्धि, विश्वबुद्धि से एकरूप होती है और वह ईश्वरीय विचार ग्रहण कर पाता है । त्याग के माध्यम से गुरु व्यक्ति के लेन-देन को घटाते हैं ।

        तन, मन एवं बुद्धि की तुलना में धन का त्याग करना, साधक और शिष्य के लिए सहज सुलभ होता है । त्याग के संबंध में कहा जाए, तो गुरु को कितना धन अर्पण किया है, इसकी अपेक्षा अपने पास कितना धन शेष रखा है यही महत्वपूर्ण होता है । जैसे कोई व्यक्ति एक लाख रुपयों में से दस हजार रुपए अर्पण करें और दूसरा व्यक्ति पचास रुपयों में से सारे पचास रुपए गुरु को अर्पण करें, तो इसमें पूरे पचास रुपए अर्पण करने का महत्त्व अधिक है । अंत में गुरु के चरणों में शिष्य को अपना सर्वस्व अर्पण करना होता है । ऐसा करने की तैयारी होनी चाहिए ।

        सत्सेवा करने से तन का त्याग होता है, नामजप करने से मन का त्याग होता है, तथा बुद्धि का उपयोग कर गुरुकार्य, भावपूर्ण और परिपूर्ण करने से बुद्धि का त्याग होता है ।

संदर्भ : सनातन निर्मित ग्रंथ ‘शिष्य’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *