देवालय के प्रांगण से कलश के दर्शन क्यों करें ?

१. देवालय के प्रांगण में प्रवेश करते ही कलश के दर्शन क्यों करने चाहिए ?

        हममें से अनेक लोग देवालय में देवतादर्शन करने जाते हैं और वहां की ईश्वरीय शक्ति एवं चैतन्य का लाभ लेते हैं । क्या आप जानते हैं कि देवालय परिसर में प्रवेश करते ही कलश के दर्शन करना सर्वाधिक लाभदायक है ? इस लेख से अधिक जानकारी लेते है ।

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देवालय के कलश की विशेषताएं

. ‘देवालय के शिखर से ब्रह्मांड की निर्गुण तरंगें ग्रहण की जाती हैं ।

. जिस देवता का देवालय है, उसकी तरंगें शिखर से प्रक्षेपित होती हैं ।’

देवालय के परिसर से कलश दर्शन करने से जीव की स्थूलदेह के सर्व ओर सात्त्विक तरंगों के कवच का निर्माण होना

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        देवालय में प्रवेश करने से पहले परिसर से देवालय के कलश के दर्शन करने चाहिए एवं कलश को नमन करना चाहिए । ऐसा करने से कलश के अग्रभाग से दूरतक प्रसारित सात्त्विक तरंगें कार्यरत होती हैं तथा दर्शनार्थी को उस का लाभ होता है । जीव की स्थूलदेह के सर्व ओर सात्त्विक तरंगों का कवच बन जाने से देवालय में प्रवेश करने पर जीव में सात्त्विक तरंगों को अधिकाधिक ग्रहण करने की क्षमता का निर्माण होता है तथा कलश को देखने से जीव में ईश्वर के प्रति भाववृद्धि होने में सहायता मिलती है ।

२. अनुभूति – दत्तमंदिर के कलश के सिरे की ओर देखने पर एकाग्रता बढना, नामजप अच्छा होना एवं कलश से प्रक्षेपित दत्ततत्त्व की तरंगें सूक्ष्म-देहों द्वारा ग्रहण होते हुए प्रतीत होना

        ‘२३.१२.२००७ के दिन अर्थात दत्तजयंती पर सवेरे मैं सनातन के रामनाथी आश्रम की छत पर धूप में बैठकर बीच-बीच में आकाश की ओर देखते हुए नामजप कर रही थी । तब मेरा ध्यान आश्रम के निकट स्थित दत्तमंदिर के कलश की ओर आकर्षित हो गया । दत्तमंदिर के कलश के सिरे की ओर देखकर मेरे मन की एकाग्रता बढी एवं मेरा नामजप अच्छा होने लगा । मुझे प्रतीत हुआ मानो मंदिर के कलश से प्रक्षेपित दत्ततत्त्व की तरंगें मेरे सूक्ष्म-देहों द्वारा ग्रहण हो रही हैं । तदुपरांत मंदिर के कलश पर भगवा ध्वज चढाया गया । उस ध्वज की ओर देखकर लगा जैसे मुझे शक्ति मिल रही है एवं मेरे शरीर पर रोमांच खडे हो गए । भगवान की कृपा से मैं उस दिन मंदिर के कलश के दर्शन के महत्त्व को अनुभव कर पाई ।’

– कु. मधुरा भोसले, गोवा.

संदर्भ – सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘देवालयमें दर्शन कैसे करें ? (भाग १)‘ एवं ‘देवालयमें दर्शन कैसे करें ? (भाग २)