क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर

क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर

क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर

         क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर ! (१८७९ – १९४५) : ‘क्रांतिवीर गणेश दामोदर उपाख्य बाबाराव सावरकर, स्वतंत्रतावीर विनायक दामोदर सावरकरके जेष्ठ बंधू थे । उन्होंने ही स्व. सावरकरको पितृतुल्य स्नेह देकर, अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितिमें विपत्तियोंका सामना करते हुए उनका लालन-पालन किया एवं उनके साथ ही साथ क्रांतिकार्यमें योगदान दिया ।’

सारणी

 


 

१. क्रांतिके लिए देहकी सिद्धता करना

         ‘बाबारावका जन्म महाराष्ट्र राज्यके नाशिक जनपदके भगूर ग्राममें १३ जून १८७९ को हुआ । बचपनमें उनकी शारिरीक स्थिति दुर्बल थी । ६ वर्षकी आयुसे लेकर १४ वर्षकी आयुतक लगभग २०० बार उन्हें वृश्चिकदंशका सामना करना पडा । कदाचित भविष्यके क्रांतिकारी जीवनमें यातनाएं सहनेकी शक्ति उनमें आए, ऐसा ही यह ईश्वरीय संकेत होगा । जान-बूझकर ही उन्होंने अपनी युवावस्थामें अपने देहको अत्यधिक कष्ट दिएं । कडी ठंडमें भी वे नंगे शरीर,  बिना कुछ ओढे घरके बाहर खुले आंगनमें सोते थे ।’

 

२. ‘मित्रमेळा’ इस संगठनकी स्थापना करना

         उनके मनमें सदैव क्रांतिके ही विचार चलते रहते थे । सामथ्र्यशाली ब्रिटिश साम्राज्यके विरुद्ध क्रांति करना  अकेलेका काम नहीं है,  अपितु उसके लिए प्रबल एवं कट्टर संगठन आवश्यक है, इस बातको उन्होंने बचपनमें ही पहचाना था । इसलिए ‘मित्रमेळा’ इस संगठनकी स्थापना की गई । ‘राष्ट्रगुरु’ समर्थ रामदासस्वामी, छत्रपति शिवाजी महाराज, नाना फडणवीस आदी महापुरुषोंके जयंती समारोह उन्होंने प्रकटरूपमें मनाना आरंभ किया । इसके फलस्वरूप युवकों तथा जनतामें देशभक्ति जागृत होनेमें सहायता मिली  । इन समारोहके माध्यमसे लोकमान्य तिलक तथा ‘काल’ इस समाचारपत्रके संपादक श्री. शिवराम महादेव परांजपे जैसे समकालीन महापुरुषोंके देशभक्तिपूर्ण  भाषण सुननेका स्वर्णिम अवसर नाशिककी प्रजाको मिला ।’

 

३. ‘वंदे मातरम्’का जयघोष करनेसे अंग्रेज शासनद्वारा अभियोग चलाया जाना

         ‘बाबारावका (‘साहब’ यह शब्द फारसी होनेके कारण उसके स्थानपर सावरकर बंधुओंने मराठीमें ‘राव’  शब्द प्रचलित किया, यथा बाबाराव, तात्याराव आदी) ब्रिटिश शासनसे पहला संघर्ष वर्ष १९०६ में हुआ  । नाशिकमें प्रकटरूपसे सभा लेनेपर लगाए गए प्रतिबंधके आदेशका पालन न करनेसे  उन्हें इस अपराधके लिए बंदी बनाया गया एवं १० रूपयोंका दंड हुआ । बाबारावने इसके विरुद्ध वरिष्ठ न्यायालयमें न्यायकी मांग की, जिससे उनका दंड निरस्त किया गया । २७ सितंबर १९०६ को विजयादशमीके उपलक्ष्यमें नाशिकके कालिका मंदिरकी  ओरसे सीमोल्लंघन कर लौटनेवाले युवकोंने ‘वंदे मातरम्’का जयघोष किया । यह सुनकर एक आरक्षकने (पुलिस) ‘चीखना बंद करो’, ऐसा कहते हुए बाबारावपर हाथ उठाया, मात्र अंतमें उस आरक्षकको ही पश्चात्ताप करना पडा; क्योंकि बाबाके साथ सभी युवकोंने उस आरक्षककी पीटाई की ।
        इस घटनासे संतप्त ब्रिटिश शासनने ११ युवकोंपर अभियोग लगाया । ‘वंदे मातरम् अभियोग’ इस नामसे वह विख्यात हुआ । इसमें बाबाराव मुख्य अभियुक्त थे । नाशिक जनपदमें यह अभियोग भिन्न-भिन्न स्थानोंपर ६ मासतक चला; क्योंकि न्यायाधीश कार्यकाजके लिए भ्रमणपर रहते थे एवं वे जहां होंगे वहां यह अभियोग चलता था । अभियोगमें बाबारावको २० रूपयोंके  दंडके साथ बडी राशिकी प्रतिभू भी मांगी गई । अन्य युवक भी इसी प्रकारसे दंडित हुएं  । बाबाराव जबतक नाशिकमें थे तबतक उन्होंने राष्ट्रहितकी दृष्टिसे  मूलभूत स्वरूपके अनेक अभियान आरंभ किए । उनमें स्वदेशी अभियान, विदेशी सामग्रीका बहिष्कार,  राष्ट्रीय शिक्षाका आरंभ इत्यादी महत्त्वपूर्ण अभियानोंका सूत्रसंचालन बाबारावके नेतृत्वमें ही हुआ था ।’

 

४. ‘जोसेफ मॅझीनी’का चरित्र धैर्यतापूर्वक हिंदुस्थानमें प्रसिद्ध करना

अ. इसी कालावधिमें बाबारावके अनुज स्व. वि. दा. सावरकर लंदनमें  पढ रहे थे । वर्ष १९०६ में स्व. सावरकर द्वारा लिखी हुई प्रसिद्ध इटालियन क्रांतिकारक जोसेफ मॅझिनीकी जीवन गाथाका हस्तलिखित बाबारावके पास आया ।  ब्रिटिशोंकी दृष्टिमें यह जीवनगाथा अत्यंत विस्फोटक थी । जून १९०७ में बाबारावने यह पुस्तक प्रसिद्ध किया । दो मासोंमें ही २ सहस्र प्रतियोंका पहला संस्करण लगभग समाप्त हो गया; क्योंकि पुस्तकके विषयके साथ-साथ उनके परिश्रम एवं साहसका यह मिलाजुला परिणाम था । इस पुस्तकमें स्व. सावरकरने लिखी हुई २६ पृष्ठोंकी भूमिका उस समय अनेक लोगोंको मुखोद्गत थी । उसके ज्वलंत विचारोंसे प्रभावित होकर क्रांतिकारी अनंत कान्हेरेने नाशिकके जनपदाधिकारी जॅक्सनका वध किया ।  शीघ्र ही स्व. सावरकर द्वारा लिखित  एवं हालंडमें मुद्रित  ‘१८५७ चे स्वातंत्र्यसमर’ इस मराठी ग्रंथकी प्रतियां  बाबारावके पास आई । बाबारावने ये प्रतियां अत्याधिक गुप्ततासे क्रांतिकारियोंतक पहुंचाई । इस अद्वितीय ग्रंथसे ब्रिटिशोंके विरुद्ध बंगाल, पंजाब एवं महाराष्ट्रमें ‘गदर’ दलकी स्थापना हो सकी ।
आ. युवकोंको भावनामें बहकर नहीं, अपितु भली-भांति समझ-बूझकर अपने-आपको क्रांतिकार्यमें  झोंक देना चाहिए, इस उद्देश्यसे उन्होंने ‘अभिनव भारत संगठन’के युवकोंको हम किस आगसे खेल रहे हैं, तथा अपने इन कृत्योंको भारतीय दंडविधानमें (इंडियन पिनल कोड) कौनसे दंड बताए गए हैं, यह ज्ञात होनेके लिए भारतीय दंडविधानका एक छोटा संस्करण भी  छपवा लिया था ।
इ. लंदनसे स्व. सावरकरने हस्तध्वम (बॉम्ब) बनानेका तंत्र सिखानेवाले दस्तावेज सेनापती बापटद्वारा बाबारावके पास भेजें  । उन्होंने वह सारी जानकारी क्रांतिकारियोंतक पहुंचाई । इसीके आधारपर हिंदुस्थानमें बना पहला हस्तध्वम क्रांतिकारी खुदिराम बोसने न्यायाधीश किंग्जफोर्डकी गाडीपर पेंका था ।

 

५. रशियन क्रांतिसे संबंधित एक

पत्रक पास रखनेके कारण १ मास सश्रम कारावास भुगतना

         इन सब कार्यकलापोंके कारण ब्रिटिश शासन बाबारावको बंदी बनानेकी टोहमें रहने लगा । ११ जून १९०८ को शिवरामपंत परांजपेको पुणेमें बंदी बनाया गया एवं दुसरे ही दिन उनको मुंबई लाकर उनपर अभियोग चलाया । स्वतंत्रता आंदोलनसे संबंधित परांजपेके तरल  एवं प्रभावी वक्तृत्वसे अनेक युवक गदगद हो गए थे । परिणामस्वरूप परांजपेको बंदी बनानेके कारण बाबारावके साथ अनेक युवक प्रक्षुब्ध हुएं । उनकी कुछ सहायता करने हेतु, बाबाराव भी मुंबईमें आए । वहांके न्यायालयके समक्ष एक आरक्षक अधिकारीको खोजा जातिके व्यापारीको बहुत कष्ट देते हुए बाबारावने देखा । बाबारावका युवा रक्त खौलने लगा । उस व्यापारीका समर्थन करते हुए बाबाराव उस अधिकारीसे विवाद करने लगे । इससे क्रोधित होकर आरक्षकोंने बाबारावको ही बंदी बनाया ।  क्या हो रहा है यह देखनेके लिए, वरिष्ठ आरक्षक अधिकारी गायडर बाबारावकी ओर आया एवं उसने उनका नाम पूछा । ‘बाबा सावरकर’ यह नाम सुनते ही गायडर  हर्षित हुआ । उसने तत्काल बाबारावकी जांच-पडताल की । उस समय उनके पास रशियन क्रांतिसे संबंधित एक पत्रक मिला । उस पत्रकके आधारपर बाबारावको एक मास सश्रम कारावासका दंड हुआ । जिसे उन्होंने ठाणे एवं नाशिकके कारागृहमें बडे आनंदसे भुगता ।’

 

६. केवल चार क्रांतिकारी कविताएं

प्रसिद्ध करनेसे आजीवन कारावासका दंड होना

         ‘क्रांतिकारियोंके अनेक गुप्त कार्योंमें बाबाराव  सावरकरका योगदान है एवं उन्हें उनके मार्गदर्शनका लाभ भी मिला है, यह बात ब्रिटिश गुप्तचर विभाग जानता था । १९०९ में बाबारावने कवि गोविंद रचित चार क्रांतिकारी कविताएं प्रसिद्ध की । उनमेंसे ‘रणावीण स्वातंत्र्य कोणा मिळाले ?’ अर्थात रणके बिना स्वतंत्रता किसे मिली है ? इस कवितामें प्रतिपादित किया था कि, ‘दास्यत्वमें जकडे हुए विश्वके किसी भी देशको सशस्त्र क्रांतिके बिना स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हुई, तो हिंदुस्थान उसे कैसे अपवाद हो सकता है ?’ ये कविताएं प्रसिद्ध करनेके कारण ही सरकारने बाबारावको बंदी बनाकर आजीवन कारावासका अत्यंत कठोर दंड दिया । ८ जून १९०९ को बाबारावको दंडित कर अंदमान  भेजा गया । उस समय उनकी आयु मात्र ३० वर्षकी थी ।’

 

७. ११ वर्ष अंदमानमें रहना

         ‘अंदमानके ‘सेल्युलर जेल’में रहते हुए उनके शारीरिक यातनाओंकी कोई सीमा न रही । धोखादायक क्रांतिकारी समझकर वहांके कारागृह अधिकारीने उनसे अत्याधिक कठोर परिश्रम करवा लिए; परंतु उनके मनमें धधक रही क्रांतिकी भावना किंचित भी नहीं घटी, अपितु  वह अधिक धारदार हुई । संगठनचातुर्य  तथा अन्यायके प्रतिकारका आवेश तो उनके नस-नसमें बहता था । इसलिए उन्होंने अंदमानमें ही कारावासका दंड भुगत रहे स्वतंत्रतावीर सावरकरकी सहायतासे वहांके राजकीय बंदियोंको संगठित किया ।  बंदियोंके साथ अच्छा व्यवहार एवं खानेयोग्य अन्न मिले इस हेतु अनशन, असहकार, बंद आदी मार्गोंसे संघर्ष किया । फलस्वरूप  उन्हें अधिकाधिक कठोर शारीरिक दंड भुगतने पडें ; परंतु  उसकी चिंता किए बिना बाबारावने अपना कार्य अखंडितरूपसे जारी रखा । अंदमानके उन ११ वर्षोंके प्रदीर्घ कालखंडमें उनका स्वास्थ पूर्णतः बिगड गया एवं उन्हें ‘क्षय’ (टी.बी.) जैसे दुर्धर व्याधीने जकड लिया । उनके अंदमानमें रहते हुए ही उनकी पत्नी  येसूभाभीने  इस संसारको अंतिम प्रणाम किया । निर्दयी ब्रिटिशोंने उनकी अंतिम भेंट भी नहीं होने दी । १९२१ में बाबारावजींको हिंदुस्थानमें पुनः लाया गया एवं साबरमतीके कारागृहमें रखा गया ।
        उस समय उनका शारिरीक स्वास्थ्य बहुत बिगड चुका था । ‘वे अब कुछ ही घंटोंके साथी हैं’, ऐसा सरकारी डॉक्टरद्वारा  बताया जानेपर ही  अर्थात सितंबर १९२२ में सरकारने उनको कारागृहसे मुक्त  किया ।’

 

८. रा. स्व. संघको अखिल भारतीय समर्थन मिलनेके लिए परिश्रम करना

         ‘संघका भगवा ध्वज डॉ. हेडगेवारने बाबारावसे ही बनवाया  । संघकी प्रतिज्ञा भी बाबारावने ही सिद्ध की । उसमें कुछ शाब्दिक परिवर्तन कर डॉ. हेडगेवारने उसे मान्यता  दी । बाबारावद्वारा स्थापित तथा वृद्धिंगत ‘तरुण हिंदु महासभा’ इस संगठनको १९३१ में उन्होंने ही संघमें विलीन किया । संघकी सेनामें  स्वयंसेवीयों तथा मार्गदर्शकोंकी भरती करते समय संघको अखिल भारतीय स्तरपर समर्थन मिलने हेतु बाबारावने अविश्रांत परिश्रम किए ।’

 

९. बाबारावकी ग्रंथसंपदा

अ. वीर बैरागी

         ‘इस पुस्तकमें औरंगजेबकी इस्लामी सत्तासे वीर बंदा बैरागीने किए हुए संघर्षकी कहानी है । बंदा वीरकी जीवनगाथा द्वारा हिंदुओंको स्फूर्ति  मिले, प्रतिशोध कैसे लेना चाहिए ? यह सिखनेको मिले, तथा पंजाबके सिक्ख एवं मराठोंका स्नेह भी वृद्धिंगत
हो, इस उद्देश्यको ध्यानमें रखते हुए बाबारावने भाई परमानंद लिखित इस पुस्तकका मराठीमें अनुवाद किया ।

आ. राष्ट्रमीमांसा

         ‘इस पुस्तकमें उन्होंने ‘भारत एक हिंदुराष्ट्र है’ इस बातको सिद्ध कर दिखाया है । ‘छत्रपती शिवरायांची आग्र्‍यावरील गरुडझेप’ इस मराठी पुस्तकमें ‘ आगरा जानेमें छत्रपति शिवाजी महाराजका हेतु औरंगजेबका वध करना  यही था’, ऐसा उन्होंने प्रतिपादित किया है ।’

इ. वीरा-रत्न-मंजुषा

         ‘इस पुस्तकमें महारानी पुष्पवती, राजा दाहिरकी दो वीरकन्याएं, रानी पद्मिनी, पन्नादायी आदी राजपूत विरांगनाओंकी जीवन गाथाएं वर्णित हैं ।’

ई. अन्य

         हिंदुराष्ट्र : ‘पूर्वी, आता नि पुढे’, ‘धर्म हवा कशाला ?’ ‘खिस्त परिचय, अर्थात खिस्ताचे हिंदुत्व’ ये उनकी अन्य मराठी पुस्तकें हैं ।’

 

१०. निधन

         ‘बाबाराव जीवनके अंततक हिंदुराष्ट्रकी ही चिंता करते रहें । बाबारावके अंतिम दिनोंमें चित्रमहर्षि  भालजी पेंढारकर उनसे मिलने गए थे, तब उन्होंने भालजीसे पूछा, ‘क्या मेरे इस हिंदुराष्ट्रका कभी पुनरुत्थान होगा ?’ भालजीने कहा, ‘बाबा, यह महाराष्ट्र एवं हिंदु धर्म पुरातन, सनातन है । इसके पश्चात अनेक धर्म तथा राष्ट्र उदित हुए एवं नष्ट भी हुए । इसीलिएअतः हिंदुराष्ट्रका पुनरुत्थान भी निश्चित है, इसमें मुझे तो कोई शंका संदेह नहीं है !’
        जीवनभर देशहितके लिए प्राणपनसे अविश्रांत परिश्रम करनेवाले यह वीरात्मा १६ मार्च १९४५ को महाराष्ट्रके सांगलीमें कालवश हो गया । बाबारावकी जीवनगाथा अर्थात राष्ट्रके लिए चंदन समान अपना जीवन त्यागनेवाले एक महान देशभक्तकी स्फूर्तिदायी कथा है !’

– श्री. संजय मुळ्ये, रत्नागिरी