नागा सम्राज्ञी रणरागिणी गाइदिन्ल्यू !

पूर्वांचल भारतकी क्रांतिदेवता नागा सम्राज्ञी गाइदिन्ल्यू

सारिणी

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१. आदिवासियोंके परंपरागत अस्त्रशस्त्रोंकी

सहायतासे बलशाली अंग्रेज सेनाके साथ संघर्ष करना

        सांकेतिक चिह्रोंका एक विशेष शास्त्र है । इस शास्त्रका अध्ययन करते समय तीक्ष्ण बुद्धिमानोंको भी इस शास्त्रने उलझाया है ।  ऐसे चित्र-विचित्र चिह्रोंका उपयोग कर कोई सांकेतिक भाषा-लिपि सिद्ध करना, किसी साधारण व्यक्तिका कार्य नहीं है । आसामके मणिपुरके घने जंगलमें रहनेवाली एवं निरक्षर १५-१६ वर्षकी एक आदिवासी युवतिने सांकेतिक भाषा केवल निर्माण ही नहीं की, तो अपने ही समान निरक्षर एवं स्वतंत्रताके ध्येयसे पे्ररित आदिवासी सहकारीयोंको भी यह सांकेतिक भाषा सिखाई । इस आदिवासी युवतिने सांकेतिक भाषाके माध्यमसे अपने सहकारीयोंसे लगातार संपर्कमें रहकर उन्हें अंग्रेज शासनके विरोधमें संगठित किया । आदिवासियोंके परंपरागत अस्त्रशस्त्रोंकी सहायतासे बलवान अंग्रेज सेनाके साथ संघर्ष कर उनकी ‘नाकमें दम किया’ । इस असाधारण स्वतंत्रता प्रेमी युवतिका जन्म किसी राजघरानेमें नहीं हुआ अथवा किसी राजाके साथ विवाह भी नहीं हुआ था । तो भी इस युवतिको पूर्वांचलकी सभी जनता प्रेमादरसे ‘नागारानी’ कहकर संबोधती थी । इस युवतिका नाम था ‘गाइदिन्ल्यू’ ! १७ फरवरी १९९३ को उसने देहत्याग किया । ऐसी ‘नागारानी गाइदिन्ल्यू’की कथा आगे दे रहे हैं ।

 

२. १८७५से अंग्रेजोंका ‘नागालैंड’पर

स्वामित्व एवं आदिवासियोंको धर्मांतरित करनेका प्रयास

मणिपुरका कुछ भाग एवं आसामके उत्तर काचारका पहाडी भाग मिलाकर निर्मित एक राज्य अर्थात वर्तमान ‘नागालैंड’ !  सैंकडो वर्ष पहले इस भागपर आदिवासियोंका ही अधिपत्य था । किंतु १८७५में अंग्रेजोंने यह भाग अपने अधिकारमें कर लिया । उसके पहले अधिक समयतक मुक्त स्वतंत्रताका आनंद लेकर आदिवासी अपना जीवन बिता रहे थे । इन अनपढ आदिवासियोंको अंग्रेज धर्मोपदेशक धर्मांतरित करनेका प्रयास कर रहे थे । उसके लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेदका उपयोग करना आरंभ किया । यद्यपि वहांके मूलनिवासी झेमई-लियांगमई-राँगमई जैसे प्रमुख एवं अन्य उपजातियोंके कुछ आदिवासियोंने अंग्रेजोंके दबावके कारण ईसाई धर्मका स्वीकार किया था, तब भी अधिकांश आदिवासी इस धर्मांतरको तीव्र विरोध करते थे । ऐसे अनाचारयुक्त वातावरणमें २६ जनवरी १९१५ को काबुई गांवमें एक बालिकाका जन्म हुआ । उसके माता-पिताने उसका नाम ‘गाइदिन्ल्यू’ रखा ।

 

३. गाइदिन्ल्यूमें गूढ दैवी शक्ति है, ऐसी नागालोगोंकी श्रद्धा

जंगलके निकट कुटीमें रहनेवाले गाइदिन्ल्यूके माता-पिता निरक्षर होनेके कारण शिक्षासे उसका कोई संबंध नहीं था; अपितु उसकी बुद्धि अत्यंत तीक्ष्ण थी । बचपनसे ही जंगलके वातावरणमें पली गाइदिन्ल्यू समवयस्क बच्चोंके साथ घने जंगलमें निर्भयतासे संचार करती थी । उंचे वृक्षोंपर चढना, नदीमें तैरना, घने जंगलमें लताओके आधारसे बंदरसमान एक स्थानसे दूसरे स्थानपर झूलकर जाना, ऐसे साहसी प्रयोग वह सहजतासे एवं सदैव करती थी । तीरकमान चलाना, बरछाद्वारा आखेट करना इनमें वह निपुण थी । लडकी होकर भी किसी युवकसमान उसकी दिनचर्या थी । वहांके विभिन्न जमातियोंमेंसे १०-१२ जमातियोंकी क्षेत्रीय भाषाएं उसे अवगत थी । समस्त नागालोगोंमें श्रद्धा थी कि, गाइदिन्ल्यूमें गूढ दैवी शक्ति है । गाइदिन्ल्यू अत्यंत स्वाभिमानी एवं कृतनिश्चयी होनेके कारण किसी भी वस्तुके लिए याचना करना, उसकी प्रकृतिमें नहीं था । जो वस्तु चाहिए, उसके लिए समय आनेपर किसीके साथ दो हाथ करनेका साहस भी उसमें था ।

 

४. ‘जदोनांग’ नामक बालक नागा लोगोंका सरदार

१९१४ को अंग्रेज अधिकारीयोंने सत्ताबलके आधारपर पुनः बलपूर्वक धर्मांतरण करना आरंभ किया । निर्धन आदिवासियोंपर नए महसूल लगाए गए । उनसे विनामूल्य परिश्रम करवाए गए । इस कारण संतप्त आदिवासियोने तलवार, तीरकमान, बरछा, कुल्हाडी जैसे अपने परंपरागत अस्त्रशस्त्रोद्वारा अंग्रेजोंका प्रतिकार किया; परंतु अंग्रेज सेनाके बंदुकके सामने आदिवासी टिक न सकें । आदिवासी नागा निराश हो गए; किंतु उनका यह नैराश्य अधिक समयतक न रहा; क्योंकि उन आदिवासी नागाओंको यह विश्वास था, ‘अपने धर्मकी रक्षा करने हेतु ईश्वरका अवतार निश्चित होगा ।’ संयोगवश अनपढ एवं श्रद्धालु आदिवासियोंको इसकी प्रचिती शीघ्र ही आई । १९०५ में जन्मा ‘जदोनांग’ नामक बालक नेतृत्त्वगुणोंके कारण नागा लोगोंका सरदार बन गया ।

 

५. जदोनांगद्वारा अंग्रेजोके विरोधमें

जनमत जागृति एवं छोटीसी गाइदिन्ल्यूका कार्यमें सहभाग

गाइदिन्ल्यू जदोनांगकी आप्त होनेके कारण जदोनांगका गाइदिन्ल्यूके घरमें आना-जाना था । गाइदिन्ल्यू भी जदोनांगको अपना सरदार मानती थी । जदोनांगने अंग्रेज शासनके विरोधमें जनमत जागृतिका अभियान आरंभ किया । उसके इस कार्यमें छोटीसी गाइदिन्ल्यू भी आनंदपूर्वक एवं निर्भयतासे सहभागी होती थी । कुछ ही दिनोंमें गाइदिन्ल्यू अपने कर्तृत्वके कारण जदोनांगका दाहिना हाथ ही बन गई । गाइदिन्ल्यूकी  विलक्षण बुद्धिमानता एवं साहसी नेतृत्त्वगुणोंकी परख करनेवाले जदोनांगको गाइदिन्ल्यूकी कार्यक्षमताके प्रति प्रचंड विश्वास था ।

 

६. जदोनांगद्वारा अनाचारी अंग्रेज शासनके विरोधमें युद्ध पुकारना

जदोनांगपर सर्वप्रथम गांधीजीके अहिंसा तत्त्वका प्रभाव था । इसलिए गांधीजीके अहिंसात्मक अभियानके माध्यमसे जदोनांगने अपनी आदिवासी जनताके साथ अंग्रेज अधिकारीयोंकी अनाचारी सत्ताके विरोधमें युद्ध घोषित किया । अतः संतप्त अंग्रेज अधिकारी आदिवासियोंपर बढती मात्रामें अनाचार करने लगे । इससे निरपराध तथा निरक्षर आदिवासियोंका जीवन ध्वस्त होने लगा । अंग्रेजोंके इस निर्दयी व्यवहारके कारण निष्पाप आदिवासियोंके प्राण संकटमें आएं । अंतमें जदोनांगका अहिंसा तत्त्वके प्रति विश्वास पूर्णरूपसे नष्ट हो गया । जदोनांगने अपने सहकारीयोंके साथ विचार-विमर्श किया एवं अनाचारी अंग्रेज शासनके विरोधमें युद्ध घोषित करनेका निश्चय किया । तत्कालीन ईशान्य भारतमें बिखरे नागा आदिवासियोंको जदोनांगने एकत्रित कर अस्त्रशस्त्र भी इकठ्ठे किए । जदोनांगने पूरे पूर्वांचलमें घोषणा की, ‘‘हमारी संस्कृतिकी, स्वधर्मकी रक्षा करने हेतु सभी एकत्रित आकर पूरे बलके साथ अंग्रेजोंका प्रतिकार करें । हमारी आदिवासी नागा जमाति स्वतंत्र है एवं इस प्रदेशपर नागा जमातिका सार्वभौमत्व है । अतः यहां सत्ता चलेगी तो केवल नागा लोगोंकी ही !  किसी भी प्रकारसे अंग्रेजोंको यहांसे भगाना है ।’’

७. २९ अगस्त १९३१ को अंग्रेज शासनद्वारा मिथ्या आरोपके कारण जदोनांगको फांसी

जदोनांगने अनाचारी अंग्रेज सत्ताके विरोधमें संघर्ष प्रारंभ किया, उस समय वहां जे.सी. हिगिन्स नामक राजनैतिक नेता था । उसने अंग्रेज सेनाके ‘आसाम रायफल्स’की सहायतासे मणिपुर एवं जंगलके चारो ओरका परिसर छान डाला । बहुत छानबीन करनेके उपरांत अंतमें जदोनांगको बंदी बनानेमें जे.सी. हिगिन्सको सफलता प्राप्त हुई । किसी व्यापारीकी हत्या कर उसकी संपत्ति छिननेका मिथ्या आरोप अंग्रेज शासनने जदोनांग एवं उसके सहकारीयोंपर लगाया । मिथ्या आरोपके समान मिथ्या न्याय भी दिया गया एवं २९ अगस्त १९३१ के दिन जदोनांगको अंग्रेज शासनद्वारा फांसीपर चढाया गया ।

 

८. गाइदिन्ल्यूद्वारा अंग्रेज शासनके अनाचारी कृत्योंका प्रतिशोध लेनेका निश्चय

नागा जमातिके आराध्य एवं देवतासमान जदोनांगको मृत्युदंड देनेवाले अंग्रेज शासनके विरूद्ध पूरे नागा जमातिके मनमें क्रोध एवं नैराश्यकी भावना निर्माण हुई थी । गाइदिन्ल्यू केवल मन-ही-मन क्रोधित नहीं हुई थी, तो अंग्रेज शासनके इस अनाचारका प्रतिशोध लेनेका निश्चय भी उसने किया । नागा लोगोंका गाइदिन्ल्यूपर विश्वास था । जदोनांगके पश्चात् नेतृत्व करनेके लिए गाइदिन्ल्यूको सभीद्वारा चुना गया । जदोनांगके वीरगतिको स्मरण कर १६ वर्षके गाइदिन्ल्यूने नागा लोगोंका नेतृत्त्व स्वीकार किया । गाइदिन्ल्यूके पीछे अंग्रेज सेनाका झंझट लगा । गाइदिन्ल्यू भूमिगत हुई । गाइदिन्ल्यूने पूरे पूर्वांचलमें आवाहन किया, ‘‘अंग्रेज शासनको कोई भी किसी भी प्रकारका महसूल न दें । कुछ ही दिनोंमें हमारी विजय निश्चित है । अतः लगान, गृहकर नागा सरकारको ही जमा करें, अभीके अंग्रेज शासनको न दें । खेतमें केवल अपने लिए ही अनाज बोएं । अंग्रेज शासनको किसी भी प्रकारकी सहायता ना करें । इसके विपरित अंग्रेजोंपर यथासंभव कहीं भी आक्रमण करें । जदोनांग जैसे हमारे सर्वोच्च सरदारके मृत्युका प्रतिशोध लें ।’’ गाइदिन्ल्यूके इस प्रभावशाली तथा आंधीसमान प्रचारसे प्रभावित होकर लोगोंने अंग्रेज शासनको गृहकर, लगान इत्यादि देना बंद किया । उसने अंग्रेज शासनके विरोधमें सशस्त्र क्रांति करनेवाले कुछ बंगाली क्रांतिकारीयोंसे संबंध प्रस्थापित किए ।

 

९. आधुनिक अस्त्रशस्त्रोंसे युक्त अंग्रेज सेनाका गाइदिन्ल्यूद्वारा तितर-बितर होना

गाइदिन्ल्यूने अंग्रेजोके साथ संघर्ष करते समय छत्रपति शिवाजी महाराजके अनुसार कूटनितिका भी उपयोग किया । गाइदिन्ल्यू घने जंगलसे अपने सहकारीयोंके साथ अंग्रेज सेनापर अचानक टूट पडती थी । छापा मारकर अस्त्रशस्त्रोंकी, साधनसामग्रीकी लुटमार, आगजनी कर भाग निकल जाती थी । ब्रिटिश शासनके विरोधमें निरक्षर नागालोगोंमें जनजागृति करनेके लिए नागाओंके परंपरागत नृत्यका उपयोग कर उसके गीतोंके शब्दोंके माध्यमसे अपना संदेश नागा जनतातक पहुंचाती थी । गाइदिन्ल्यू स्वयं निरक्षर थी, अपितु उसने अपने अलौकिक बुद्धिमत्ताके आधारपर एक विशेष ‘लिपि’की निर्मिती की । यह लिपि उसने सहकारीयोंको भी सिखाई । दूर-दूरतक बिखरे हुए अपने सहकारीयोंके साथ इस विशेष लिपिके माध्यमसे वह संपर्क करती थी । संदेशोंका आदान-प्रदान करती थी । जिस प्रकार संताजी एवं धनाजी नामक मराठा सरदारोंने औरंगजेबकी नाकमें दम कर रखा था, उसी प्रकार अपने विश्वासू सहकारीयोंकी सहायतासे गाइदिन्ल्यूने अंग्रेजोंके बलवान एवं तत्कालीन आधुनिक अस्त्रशस्त्रोंसे सज्ज सेनाकी नाकमें दम कर रखा था । अंग्रेज शासन गाइदिन्ल्यूकी कूटनितिके सामने हतबल हो गया था । इसलिए क्रोधित अंग्रेज अधिकारीयोंने जंगलके नागा बस्तीयोंपर आक्रमण कर निरपराध नागा महिलाओं तथा लडकियोंपर बलात्कार करना, बच्चों तथा पुरूषोंके हाथ-पांव तोडना, ऐसे अनाचार आरंभ किए । नागा लोगोंके मंदिरोंकी तोडफोड की । इतना ही नहीं, तो स्थानस्थानकी बस्तीयों तथा गांवोंमें जाकर ‘गाइदिन्ल्यू’ नामकी सभी महिलाओंको बलपूर्वक कारागृहमें बंदी बनाया । गाइदिन्ल्यूका पता बतानेवालेको ५०० रुपयोंका पुरस्कार अंग्रेज शासनद्वारा घोषित होनेपर भी गाइदिन्ल्यूके बारेमें जानकारी देनेके लिए कोई भी आगे नहीं आ रहा था । अंतमें शासनने घोषित किया कि, ‘गाइदिन्ल्यूका पता बतानेवालेको पुरस्कारके साथ उस पूरे गांवके १० वर्षके महसूलपर क्षमा की जाएगी’ । परंतु अंग्रेज शासनका यह प्रलोभन भी निरर्थक हुआ ।

 

१०. गाइदिन्ल्यूको बंदी करनेमें अंग्रेज अधिकारीको सफलता

गाइदिन्ल्यू एवं उसके सहकारीयोंके पास परंपरागत अस्त्रशस्त्र प्रचुर मात्रामें थे; परंतु शस्त्र चलानेमें निपुण लोग अल्प थे । पिस्तौल, रायफल जैसे शस्त्र तो उसके पास थे ही नहीं । अतः असमान शस्त्रबलपर एवं अपर्याप्त संख्याबलपर ब्रिटीश शासनके साथ गाइदिन्ल्यूका संघर्ष अधिक दिनोंतक नहीं चल पाएगा, इसका भान उन दोनोंको भी था । गाइदिन्ल्यू टिकी रही, वह केवल कूटनितिके आधारपर ! अंग्रेज सेनाका अधिकारी मॅकडोनाल्डने जंगलकी सभी ओरसे नाकाबंदी आरंभ की थी । सेनाबलमें वृद्धी की एवं जंगलके सभी ओरसे गांवोंको घेरा डालनेके कारण नागा लोगोंकी गतिविधियोंपर अपनेआप ही नियंत्रण आ गया । गाइदिन्ल्यूका गांववालोंके साथ संपर्क टूट गया । अंतमें नागा पहाडीके पुलोमी गांवमें १७ अक्तूबर १९३२ को गाइदिन्ल्यूको बंदी बनानेमें मॅकडोनाल्डको सफलता प्राप्त हुई ।

 

११. ऑक्सफर्डके म्युझियम’में गाइदिन्ल्यूकी

सांकेतिक लिपि,  उसके वस्त्र, अलंकार संजोकर रखा जाना

केवल १७ वर्षकी रणरागिणि गाइदिन्ल्यू पकडी जानेके कारण हर्षविभोर हुए कॅप्टन मॅकडोनाल्डने गाइदिन्ल्यूके हाथ-पांवमें बडीr शृंखलाएं एवं बेडियां डाली । पहले उसे कोहिमामें ले गए एवं तत्पश्चात् इंफालमें रखा गया । १७ अक्तूबरके दिन गाइदिन्ल्यूको जब जेरबंद किया गया, तो उसके पास सांकेतिक चिह्र एवं उसका अर्थ स्पष्ट करनेवाली  १०-१२ बहियां एक लकडीके बक्सेमें रखी हुई मिली । कॅप्टन मॅकडोनाल्डने वह बक्सा अधिकारमें कर लिया; परंतु बहियोंका महत्त्व क्या है, इस विषयमें वह अनभिज्ञ था । इस लकडीके बक्सेके अतिरिक्त गाइदिन्ल्यूके नित्य उपयोगमें आनेवाली वस्तुएं, अर्थात् आदिवासियोंके परंपरागत अलंकार तथा जदोनांग एवं उसके छायाचित्र इत्यादि सभी अधिकारमें कर लिया गया । ये सभी वस्तुएं एवं उसकी महत्त्वपूर्ण बहियां मणिपुरके तत्कालीन उपायुक्त जे.पी. मिल्सने अपने पास रखी । उस बहियोंमे सांकेतिक लिपिका इंग्लैंडमें संशोधन करनेपर यह ध्यानमें आया कि, अपने सहकारीयोंके साथ संपर्क करने हेतु , संदेशका आदान-प्रदान करने हेतु इस भाषा-लिपिका उपयोग किया जाता था । निरक्षर होकर भी इस प्रकारसे स्वतंत्र एवं नई भाषा-लिपि तैयार करनेका अंग्रेजोंको ही नहीं, तो किसीको भी आश्चर्य होता था । आज भी इंग्लैंडमें ऑक्सफर्डके ‘पिट रिव्हर्स म्युझियम’में गाइदिन्ल्यूकी बहियोंके साथ ही उसके अलंकार, वस्त्र तथा जदोनांग एवं उसके छायाचित्र भी संजोकर रखे गए हैं ।

 

१२. मणिपुरके अंग्रेज शासनद्वारा

गाइदिन्ल्यूको कठोर कारावासके साथ आजीवन कारावासका दंड

गाइदिन्ल्यूपर अंग्रेज शासनने राजद्रोह करनेका अभियोग चलाया । निर्णय क्या होगा, इसका भान गाइदिन्ल्यूको था । उसे दुःख था तो इस बातका कि, वह जदोनांगके मृत्युका प्रतिशोध न ले पानेका एवं अपने देशको अंग्रेजोके दास्यत्वसे मुक्त न कर पानेका ! मणिपुरके अंग्रेज शासनद्वारा उसे कठोर कारावासके साथ आजीवन कारावासका दंड सुनाया गया । इस दंडका प्रारंभ १९३२ से हुआ । वह मणिपुर संस्थानके मध्यवर्ती करागृहमें थी । अंग्रेज शासनको नित्य यह भय था कि, उसके अन्य सहकारी गाइदिन्ल्यूको कारागृहसे छुडानेका प्रयास निश्चित रूपसे करेंगे । इसलिए गाइदिन्ल्यूको लगातार एक कारागृहसे दूसरे कारागृहमें रखा जाता था । गाइदिन्ल्यूको अंग्रेजोंने बंदी बनानेके पश्चात् उसके स्थानपर नागाओंका नेतृत्व करनेवाला सरदार ‘हायदुआ’को अंग्रेजोंके साथ लडते लडते १९३४ के मई माहमें वीरगती प्राप्त हुई ।  उसके पश्चात् नागाओंका नेतृत्व किया सरदार ‘दिकेऊ’ ने । उसने भी लगभग ६ वर्षतक अंग्रेजोंसे टक्कर दी । अंतमें १९४० में उसे अंग्रेजोंने विश्वासघातसे बंदी बनाया एवं फांसी दी ।

 

१३. पंडित नेहरूद्वारा गाइदिन्ल्यूको ‘नागारानी’ यह

उपाधि प्राप्त होना; अपितु कारावासकी मुक्ततासे उसका वंचित रहना

१९३७ में पंडित जवाहरलाल नेहरू पूर्वांचलकी यात्रा करने गए थे । उस समय जनताने उन्हें निवेदन किया कि, सिलांगके कारागृहमें बंदी बने गाइदिन्ल्यूको मुक्त करने हेतु वे विशेष प्रयास करें । उस समय नेहरूने कारागृहमें जाकर गाइदिन्ल्यूकी भेंट की । उसके कार्यके प्रति सम्मान प्रकट कर उसे ‘नागारानी’ यह उपाधि प्रदान की । अतः नागा जनताको यह आशा प्रतीत हुई कि, नेहरू कांग्रेस शीघ्रही गाइदिन्ल्यूको कारावाससे मुक्त करेगी; क्योंकि उसी समय हिंदुस्थानके ७ प्रदेशोंमें कांग्रेसका ही मंत्रिमंडल सत्तामें था ।

 

१४. स्वतंत्रता प्राप्तिके पश्चात मुक्तता होनेपर भी कांग्रेस

सरकारद्वारा उसे नागालैंड छोडकर कहीं भी जानेसे अवरोध होना

हिंदुस्थानकी स्वतंत्रताके लिए अहिंसात्मक मार्गसे संघर्ष करनेवालोंको अंग्रेज शासनने कारागृहमें बंदी बनाया था । उन सभीकी मुक्तता करनेका सत्तारूढ कांग्रेसने निश्चित किया एवं उसके अनुसार सभीकी मुक्तता हुई; परंतु जिनका सशस्त्र क्रांतिपर विश्वास था एवं जिन्होंने अपनी मातृभूमिकी परतंत्रताके विरोधमें अंग्रेजोंके साथ सशस्त्र संघर्ष किया, केवल उन्हें ही कांग्रेस शासनने कारावाससे मुक्त नहीं किया । अतः नागारानी गाइदिन्ल्यूकी उस समय मुक्तता नहीं हुई । उसकी मुक्तता हुई भारतके स्वतंत्रता दिनको अर्थात १५ अगस्त १९४७ को ! नागारानी गाइदिन्ल्यू १५ वर्ष अनाचारी अंग्रेजोंके कारागृहमें बुरी तरहसे फंसी थी । यद्यपि नागारानी गाइदिन्ल्यूकी कारागृहसे मुक्तता हुई, उसे नागालैंड छोडकर अन्यत्र कहीं भी जानेकी अनुमति नहीं थी, भारत शासनद्वारा ही यह प्रतिबंध किया गया था । एक प्रकारसे यह स्थानबद्धता ही थी । एक ओर ‘नागारानी’ कहकर सन्मान करना एवं उसी समय बंधनमें डालकर परतंत्रतामें रखनेका कृत्य करना !

वाह रे कांग्रेस तेरा खेल ।
‘नागारानी’ को दिया नागालैंड जेल ।।

 

१५. गाइदिन्ल्यूने राष्ट्रकी स्वतंत्रताप्राप्तिके

पश्चात भी आत्मसम्मान हेतु स्वकियोंके विरोधमें संघर्ष करना

नागारानी गाइदिन्ल्यूने कारागृहसे मुक्त होते ही अपनेआपको समाजसेवामें मग्न रखा । ईसाई धर्मोपदेशकोंद्वारा आरंभ किए धर्मांतरणके अभियानका सामना करने हेतु उसने ‘हराका’ नामक एक पंथ स्थापित किया । इस पंथके माध्यमसे अपनी पुरातन संस्कृतिका महत्त्व सभीको बतानेका उसका उद्देश था । सहस्त्रों नागा इस पंथसे दीक्षित हुए; किंतु कुछ स्वार्थी एवं धर्मांतरित लोगोंने उसके इस कृत्यका प्रतिरोध किया । उन्होंने उसपर प्राणघातक आक्रमण किए । स्वयंकी सुरक्षा हेतु उसने व्यक्तिगत रूपसे १००० सैनिकोका एक संगठन स्थापित किया । तदुपरांत वह निरंतर भूमिगत रहकर ही अपने संगठन एवं पंथका कार्य करती रही ।  अंतमें १९५६ को भारत शासनने उसकी स्थानबद्धताका (?) आदेश निरस्त किया । विदेशी एवं अनाचारी अंग्रेज शासनके विरोधमें पराकाष्टासे संघर्ष करनेवाली नागारानी गाइदिन्ल्यूको राष्ट्रकी स्वतंत्रता प्राप्तिके पश्चात आत्मसम्मान हेतु स्वकियोंके विरोधमें संघर्ष करना पडा । इस बातका उसे अत्यंत क्लेश हुआ   ।

 

१६. पंतप्रधान श्रीमती इंदिरा गांधीद्वारा नागारानी

गाइदिन्ल्यूको ताम्रपत्र प्रदान कर सम्मानित किया जाना

१९७२ में भारतीय स्वतंत्रताका रजत महोत्सव मनाया गया । इस विशेष अवसरपर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधीद्वारा रानी गाइदिन्ल्यूको इस विशेष समारोह हेतु उपस्थित रहनेका प्रेमपूर्वक आमंत्रण दिया गया एवं इस कार्यक्रममें नागारानी गाइदिन्ल्यूको ताम्रपत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया । अबतक शासनद्वारा हुई चुकका इस प्रकारसे परिमार्जन किया गया । (यह भी कुछ अल्प नहीं !)

 

१७. १७ फरवरी १९९३ को प्रातः पूर्वांचलकी सम्राज्ञी रणरागिणी गाइदिन्ल्यूका देहत्याग

नागारानी  गाइदिन्ल्यूने जीवनभर अखंड हिंदुस्थानका स्वप्न देखा था; परंतु दुर्भाग्यवश वह पूरा नहीं हो पाया । स्वतंत्रताके पश्चात सत्तापर आए सत्ताधीशोंने अपनी स्वार्थपूर्तिके लिए तत्त्वोंको त्याग दिया था । इसलिए इस सत्ताप्राप्तिकी गंदी राजनितिमें नागारानी गाइदिन्ल्यू कभी भी सहभागी नहीं हुई । नागारानी गाइदिन्ल्यू अपने जीवनके ७७ वर्ष पूर्ण किए । अपनी मातृभूमिको विदेशियोंके, परतंत्रकी शृंखलासे मुक्त करनेका व्रत उसने केवल १४ वर्षकी आयुमें ही अंगीकार किया था एवं वह ध्येय साध्य होनेतक उसने तीव्र यातना एवं कष्ट सहें । उस नागारानी गाइदिन्ल्यूका वास्तव्य था स्वतंत्र भारतके पूर्व दिशाकी ओर विद्यमान ‘पूर्वांचलमें’ ! जहां सूर्यकी तेजस्वी किरने सर्वप्रथम आती हैं एवं तत्पश्चात ही उर्वरित भारतमें वह प्रकृतिके नियमानुसार फैलती हैं । १७ फरवरी १९९३ को प्रात: सूर्योदय हुआ; किंतु उस दिन समस्त भारतियोंके हृदयमें केवल अंध:कार ही भरा था; क्योंकि उस दिन  पूर्वांचलकी सम्राज्ञीने, रणरागिणी गाइदिन्ल्यूने मृत्युरूपी अंधःकारको अपनाया था । एक धधकती ज्वाला अंतमें शांत हुई ! आज भी पूर्वांचलमें २६ जनवरीको नागारानी गाइदिन्ल्यूका जन्मदिन उत्साहसे मनाया जाता है । साथ ही १७ फरवरीको समस्त जनता कृतज्ञतापूर्वक नागारानी गाइदिन्ल्यूका स्मरण कर श्रद्धांजली अर्पण करती है ।


जेलियांगरांग संप्रदाय का हेराका धर्म

ईशान्य भारत में जनजातियां मानव जीवन का उद्देश्य को सही प्रकार से समझे, अंधविस्वास से रहित होकर धर्म के प्रति प्रेरित हो इसलिए सन् १९२७ को रानी मां गाईदिन्ल्यु ने हेराका धर्म की स्थापना की । तब से हेराका धर्म के पूजा पद्धति, रहन सहन के नियम, मंदिर निर्माण के तरीके आदि धर्म प्रचारकों के द्वारा गांव- गांव जाकर सिखाया जाता था । रानी मां का यह कहना था कि हेराका धर्म में ६०० गाने (भजन) हैं जो साक्षात ईश्‍वर का देन हैं ! हेराका का सही अर्थ है ईश्‍वर एक है ।

सन् १९७४ में जेलियांगरांग हेराका एसोसिएसन गठित किया गया । प्रतिवर्ष एसोसिएसन का सम्मेलन किया जाने लगा, जो अभी भी जारी है । तब रानी मां एसोसिएसन का प्रेसीडेंट तथा श्री रामकुईवांग बे नेउमे जी जेनरल सेकरेटरी थे । सन् १९९३ के १७ फरवरी को रानी मां का देहान्त हो गया । वर्तमान में धर्म सुधारक श्री नामतेउदुईंग नियामे ने हेराका धर्म का प्रचार-प्रसार करतें हैं । उन्होंने २००३ को जेलियाङरोंग हेराका रानी गाईदिन्ल्यु पेलेस कमिति का गठन किया । जो रानी मां के निवास स्थान हेजाईचाक गांव और हांगरुम गावके नाम से लिया गया है ।

वर्तमान में असम के उत्तर कछाड के हेजाईचाक गांव में, सुबह के सुर्य नमस्कार से हेराका धर्मांवलंबीयों का दिन प्रारंभ होता है ! हेराका धर्मांवलंवी इसमें सहभाग लेते है ! शहर के सुख-सुविधाआें से दुर, सहज सरल जीवन-यापन करनेवाले इनलोंगो का प्रेम प्राकृतिक है ! कहीं कोई दिखावा नही है ! इनके सहजता ही, इसके प्रति आकर्षित करता है !

रानी मां गाईदिन्ल्यु जी को उनके धर्म-राष्ट्र एवं सामाजिक प्रयासों के लिए, २६ जनवरी १९८२ को पद्म भूषण पुरस्कार, २ फरवरी १९९६ को बिरसा मूंडा पुरस्कार एवं स्वतन्त्रता सेनानी पुरस्कार प्राप्त हुआ है ! हम उनके चरणों में नमन करते है !

॥ जेलियाङ रोंग रिङते लौ ॥
॥ हेराका ई लाङ लेई ॥