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छत्रपति शिवाजी महाराज की शुद्धिकरण नीति और नेताजी पालकर

छत्रपति शिवाजी महाराज और शुद्धिकरण अभियान अर्थात ‘घरवापसी’

छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, शके 1596 अर्थात 6 जून 1674 को हुए शिवराज्याभिषेक के पश्चात स्वराज्य में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। स्वभाषा, स्वदेशी और स्वधर्म को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ छत्रपति शिवाजी महाराज ने उन हिंदुओं को पुनः सम्मानपूर्वक हिंदू धर्म में स्थान दिलाने का कार्य किया, जो बल, प्रलोभन अथवा दबाव के कारण अपना मूल धर्म छोड़ने के लिए विवश हुए थे। इसी प्रक्रिया को आज ‘शुद्धिकरण’ अथवा ‘घरवापसी’ कहा जाता है।

आज ‘घरवापसी’ शब्द देशभर में चर्चित है, किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि इस अभियान को संगठित स्वरूप देने का कार्य लगभग 350 वर्ष पूर्व छत्रपति शिवाजी महाराज ने किया था। उस काल में इस्लामी आक्रमणों और सत्ताओं के दबाव में अनेक हिंदुओं का धर्मांतरण हुआ था। ऐसे लोगों को पुनः स्वधर्म में सम्मानपूर्वक स्थान दिलाने का साहसिक कार्य शिवाजी महाराज ने किया।

1. छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा शुद्धिकरण अभियान को प्रोत्साहन

मध्यकाल में अनेक विदेशी इस्लामी आक्रमणकारियों ने तलवार और सत्ता के बल पर धर्मांतरण करवाए। विशेषतः औरंगजेब के शासनकाल में हिंदुओं पर अत्याचार, जज़िया कर और धर्मांतरण की घटनाएं बढ़ गई थीं। उस समय समाज में यह धारणा भी प्रचलित थी कि एक बार धर्मांतरित हो जाने के बाद किसी व्यक्ति को पुनः हिंदू समाज में स्थान नहीं दिया जा सकता।

ऐसी परिस्थिति में छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस सामाजिक बाधा को चुनौती दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति का धर्मांतरण बलपूर्वक या दबाव में हुआ है, तो उसे पुनः अपने मूल धर्म में लौटने का अधिकार है। इसके लिए उन्होंने धार्मिक विद्वानों की सहायता से शुद्धिकरण की व्यवस्था भी विकसित की। इस प्रकार शिवाजी महाराज ने समाज में व्याप्त कठोर और अन्यायपूर्ण मान्यताओं को बदलने का प्रयास किया।

2. बजाजी निंबाळकर का शुद्धिकरण

शुद्धिकरण अभियान का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण फलटण के प्रतिष्ठित सरदार बजाजी निंबाळकर हैं। आदिलशाही शासन ने उन्हें बलपूर्वक इस्लाम स्वीकार करने के लिए बाध्य किया था।

छत्रपति शिवाजी महाराज और राजमाता जिजाबाई ने यह माना कि बलपूर्वक धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति का कोई दोष नहीं है। इसलिए उन्होंने बजाजी निंबाळकर का विधिपूर्वक शुद्धिकरण करवाया और उन्हें पुनः हिंदू धर्म में स्थान दिलाया।

इतना ही नहीं, समाज में उन्हें सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जाए, इसके लिए शिवाजी महाराज ने अपनी पुत्री सखुबाई का विवाह बजाजी निंबाळकर के पुत्र महादजी निंबाळकर से करवाया। इससे यह संदेश गया कि शुद्धिकरण के पश्चात व्यक्ति पूर्ण सम्मान के साथ समाज का अंग है।

3. मोहम्मद कुली खान से पुनः नेताजी पालकर

शिवाजी महाराज द्वारा करवाए गए दूसरे महत्वपूर्ण शुद्धिकरण का संबंध स्वराज्य के पराक्रमी सेनानायक नेताजी पालकर से है।

नेताजी पालकर को ‘प्रति शिवाजी’ कहा जाता था। आगरा से शिवाजी महाराज के निकल जाने के बाद औरंगजेब ने नेताजी पालकर को बंदी बना लिया। बाद में उनका धर्मांतरण कर उन्हें ‘मोहम्मद कुली खान’ नाम दिया गया। वे लगभग दस वर्षों तक मुगल सेवा में रहे।

वर्ष 1676 में अवसर मिलते ही वे मुगल छावनी से निकलकर रायगढ़ पहुंचे और छत्रपति शिवाजी महाराज से भेंट कर पुनः हिंदू धर्म में लौटने की इच्छा व्यक्त की। शिवाजी महाराज के आदेश पर 19 जून 1676 को उनका विधिपूर्वक शुद्धिकरण किया गया।

उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने के लिए शिवाजी महाराज ने अपने परिवार से वैवाहिक संबंध भी स्थापित किए। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार महाराज की पुत्री कमलाबाई का विवाह नेताजी पालकर के पुत्र जानोजीराव पालकर से कराया गया था।

4. शुद्धिकरण अभियान का सामाजिक संदेश

बजाजी निंबाळकर और नेताजी पालकर के उदाहरण यह दर्शाते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज केवल एक महान योद्धा ही नहीं थे, बल्कि समाज सुधारक और दूरदर्शी शासक भी थे। उन्होंने उन लोगों को पुनः सम्मान दिलाया, जो परिस्थितियों के कारण अपने मूल धर्म और समाज से दूर हो गए थे।

इस अभियान के माध्यम से शिवाजी महाराज ने यह संदेश दिया कि किसी व्यक्ति को उसके अतीत के कारण हमेशा के लिए समाज से अलग नहीं किया जाना चाहिए। यदि वह अपनी इच्छा से वापस आना चाहता है, तो उसे सम्मान और स्वीकार्यता मिलनी चाहिए।

छत्रपति शिवाजी महाराज का शुद्धिकरण अभियान भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। बजाजी निंबाळकर और नेताजी पालकर जैसे उदाहरण इस बात के साक्षी हैं कि शिवाजी महाराज ने सामाजिक एकता और स्वधर्म रक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। उन्होंने केवल शुद्धिकरण नहीं कराया, बल्कि समाज में उन व्यक्तियों की प्रतिष्ठा भी पुनर्स्थापित की। यही कारण है कि उनका यह कार्य आज भी इतिहास में विशेष महत्व रखता है।