२३ मार्च -भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का बलिदानदिन है । उस निमित्त से विनम्र अभिवादन !
‘फांसी के दिन शाम को भगतसिंह का मन और चित्त शांत था । मृत्यु सामने थी, फिर भी वे अपनी कोठरी में बैठे बेडियों की ताल पर अपना मनपसंद गीत गा रहे थे । ‘मेरा रंग दे बसंती चोला । इसी रंग में रंग कर शिवाने माँ का बंधन खोला । मेरा रंग दे ॥ यही रंग हल्दीघाटी में खुल करके था खेला । नव बसंती में भारत के हित वीरों का यह मेला । मेरा रंग दे ।’ (अर्थ : मेरी काया वसंती रंग में अंतर्बाह्य रंग दें । इसी रंग में रंगकर छत्रपति शिवाजी महाराज ने माता को दास्यता से मुक्त किया और (राणा प्रताप के समय) हलदी घाटी में नव वसंतऋतु में इसी रंग में रंगकर वीर पुरुषों का मेला भारत के हित के लिए खेला (लडा) था ।)

१. कक्षपाल के सुखदेव को फांसी हेतु ले जाने के लिए आते ही उनके साथ संपूर्ण कारागृह का परिसर नारों से गूंज उठा
शाम को ७ बजे के कुछ पहले कारागृह में चतुरसिंह नामक सेनानिवृत्त एक वृद्ध हवलदार कक्षपाल भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के परिसर का ताला खोलकर तीनों को हथकडियां पहनाकर फांसी के तख्ते की ओर ले जाने अंदर आया । वह पहले सुखदेव की कोठरी में घुसा और उन्हें हथकडियां पहनाने लगा । तब सुखदेव ने अपनी हमेशा की शूर, लडाकू वृत्ति के कारण उससे वाद-विवाद शुरू कर दिया । उनका यह वाद-विवाद सुनते ही पास ही के कक्ष में रह रहे राजगुरू समझ गए कि वहां क्या हो रहा है और उन्होंने जोर-जोर से नारे लगाने शुरू कर दिए । ‘इन्किलाब जिंदाबाद’, ‘लाँग लिव रिवल्यूशन’ (क्रांति चिरंजीव), ‘डाऊन विद इंपीरिएलिजम’, ‘वन्दे मातरम् !’ ये नारे देने का उद्देश्य यह था कि कारागृह के सभी बंदीवानों को यह पता चले कि उन्हें फांसी दी जा रही है । ये नारे सुनते ही सुखदेव भी नारे देने लगे । फिर तो पूरे कारागृह में एक बैरक से दूसरे बैरक में नारे दिए जाने लगे !
इस कोलाहल में चतुरसिंह सुखदेव की झटापटी दिखाते हुए भगतसिंह से बोला, ‘मुझ पर दया करें ! हथकडियां लगाने का मुझे आदेश है !’ यहां सुखदेव मृत्यु से घबराकर यह विरोध नहीं कर रहे थे, अपितु उनका उद्देश्य था कि जाते-जाते भी एक ‘दमदार सामना’ करते हुए जाएं । फिर भगतसिंह ने उन्हें समझाया और सुखदेव ने हथकडियां लगवा लीं । तदुपरांत राजगुरु-भगतसिंह को भी हथकडियां लगाईं । अब सभी बंदीवानों की समझ में आ गया था कि उन्हें आज शीघ्र ही कोठरी में बंद क्यों कर दिया गया था ।
२. तीनों क्रांतिकारियों का निडरता से फांसी घर तक जाना
कोठरी के बाहर निकलते ही भगतसिंह गाने लगे, ‘दिलसे निकलेगी न मर कर भी वतन की उलफत, मेरी मिट्टी से भी खूशबू-ए-वतन आएगी।’ (अर्थ : मरने के पश्चात भी देशप्रेम मेरे हृदय से नहीं जाएगा ! मेरी पार्थिव शरीर से भी देश की मिट्टी की सुगंध आती रहेगी !’) भगतसिंह के दाईं ओर राजगुरु थे और बाएं हाथ पर सुखदेव ! वे भी भगतसिंह के सुर में सुर मिलाकर वही गीत ऊंचे स्वर में गाने लगे । उनके आगे और पीछे कारागृह के कक्षपाल, बंदीपाल (जेलर), अधीक्षक और अन्य अधिकारी थे । इन लोगों ने अपने जीवन में कभी किसी को फांसी के तख्ते की ओर इसप्रकार निडरता से जाते हुए नहीं देखा होगा ! तीनों के मुख पर मृत्यु का तनिक भी भय नहीं था । एक महान् राष्ट्र के वे महान सुपुत्र थे ।
३. भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई वह क्षण
वहां फांसी के तख्ते के पास उन्हें अंग्रेज अधिकारी दिखाई दिए । उनमें से एक से भगतसिंह अंग्रेजी में बोले, ‘‘Well Mr. Magistrate, you are fortunate to be able to see today how Indian revolutionaries can embrace death with pleasure for the sake of their supreme ideal!’ !’ (अर्थ : अच्छा है मैजिस्ट्रेट साहब, आप इतने भाग्यवान हैं जो आज देख रहे हैं कि हिंदी क्रांतिकारी अपने सर्वोच्च ध्येय के लिए मृत्यु को आनंद से कैसे गले लगाते हैं !’) उनके ये तेजस्वी उद़्गार सुनकर दंडाधिकारी स्तब्ध रह गए । भगतसिंह ने फिर अधिकारियों से विनती की । ‘फांसी से पहले आप हमें २ मिनट अपने नारे देने दें !’ वे आगे बोले, ‘आशा है कि आप हमारी यह अंतिम विनती मान्य करेंगे ।’ कारागृह के अधीक्षक ने मौन रखते हुए उन्हें स्वीकृति दी । फिर तीनों क्रांतिकारियों ने जोर-जाेर से हमेशा की भांति नारे दिए और फांसी के तख्तेपर चढ गए । उनके पैर बांध दिए गए । उन्होंने फांसी के फंदे का चुंबन लिया । फांसी की काली टोपी उनके मुख तक खींच ली गई और गले में फंदा डाल दिया गया । उसे ठीक से सरकाकर उसकी गांठ कस दी गई । अब उनके नारे रुक गए ।
४. संपूर्ण कारागृह का वातावरण
उनके नारे रुकते ही सर्वत्र स्मशानशांति फैल गई । संपूर्ण कारागृह के बंदीवान आतुरता से कान लगाकर बैठे थे कि अब आगे क्या सुनाई देगा ! कारागृह के पूरे वातावरण में इस समय इतना सन्नाटा था कि दूर तक फांसी के तख्ते की वजनदार (लकडी की) फली के नीचे गिरने पर होनेवाली आवाज पूरे कारागृह में सुनाई दे जाए । तब तख्त की कडी खींचते ही फांसी के तख्ते की चाक घूमी और भगतसिंह के पैर के नीचे की फली नीचे गिरने की आवाज आई । भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की देह फांसी पर लटकी थी । उस समय शाम के ७ बजकर ३३ मिनट हुए थे । थोडी ही देर में उनके प्राण निकल गए । मातृभूमि के लिए ऐसी दीर्घकाल तक संघर्ष कर और इतने धैर्य से फांसी पर चढकर उन्होंने अपना नाम जगभर में रोशन कर दिया । ऐसी निर्णायक लडाई, क्षणभर के लिए भी भयभीत हुए बिना, इतने दीर्घकाल तक इससे पहले शायद ही किसी ने लडी होगी ! ऐसे एक-एक लोकोत्तर पुरुषों के कारण ही उनके राष्ट्र का नाम ‘तेजस्वी राष्ट्र’के रूप में इतिहास में अमर हो जाता है !’
(साभार : ‘वडवानल’ इस पुस्तक से, लेखक : वि.श्री. जोशी)
