बच्चो, भगवान के प्रति भाव जागृत करें !

‘भाव’ अर्थात भगवान को मनःपूर्वक ध्यान में रखना अथवा उनके प्रति प्रेम रखना !

अ. भाव का महत्त्व

 ‘जहां भाव वहां भगवान’, अर्थात भाव होनेपर वहां भगवान का अस्तित्व होता है । भाव जागृत रखनेवाले लोगों पर ईश्वर सदैव प्रसन्न रहते है । ईश्वर संकट एवं कठिन स्थिति में उनकी सहायता कर उनकी देखभाल करते है । भाव जागृत होनेपर सदैव आनंद की अनुभूति होती है । मन स्थिर एवं शांत बन जाता है ।

आ. भाव जागृत होने के लिए क्या करें ?

आ १. प्रार्थना : भगवान को शरण जाकर इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति के लिए लगन से याचना करने को ‘प्रार्थना’ कहते है ।

आ १ अ. भगवान को बार बार प्रार्थना करना आवश्यक :  किसी वस्तु की आवश्यकता होनेपर जिस प्रकार हम सर्वप्रथम मां को पुकारते है; उसी प्रकार भगवान भी हमारी मां हैं । उन्हें प्रार्थना करने पर हमारी पुकार उनतक पहुंचती हैं तथा वे हमारी सहायता के लिए आते हैं ।

आ. १ आ. प्रार्थना करने से होनेवाले लाभ :

१. प्रार्थना करने से चिंता अल्प होकर ईश्वर के प्रति श्रद्धा बढती है एवं मन एकाग्र होता है ।

२. प्रार्थना करने से ईश्वर का आशीर्वाद मिलता है ।

आ. १ इ. प्रतिदिन करने योग्य कुछ प्रार्थनाएं

१. स्नान के पूर्व : हे जलदेवता, आपके पवित्र जलद्वारा मेरा शरीर शुद्ध एवं मन निर्मल हो । आपका चैतन्य मुझसे ग्रहण हो ।

२. पढाई के पूर्व : हे विघ्नहर्ता एवं बुदि्धदाता श्री गणेश, मेरी  पढाई में आनेवाली बाधाएं नष्ट करें । मेरी पढाई सुयोग्य होने हेतु आप मुझे सुबुद्धी एवं शक्ति प्रदान करें ।

३. अन्न ग्रहण करने पूर्व : हे अन्नपूणा मां, यह अन्न आपके चरणो में अर्पित कर आपका ‘प्रसाद’ है, इस भाव से मुझसे ग्रहण हो । इस प्रसादद्वारा मुझे शक्ति एवं चैतन्य दे ।

आ २. कृतज्ञता

आ २ अ. कृतज्ञता का अर्थ क्या है ? : ‘विशिष्ट वस्तु मुझे ईश्वर की कृपासे प्राप्त हुई’ अथवा ‘ईश्वर मेरे लिए कितना कुछ करते है’, ऐसा प्रतीत होकर उनके प्रति मन में प्रेम एवं आदर की निर्मिती होना, कृतज्ञता है !

आ २ आ. कृतज्ञता का महत्त्व

१. बच्चो, यदि आप अपनी कलम घर भूल गए हो, ऐसी स्थिती में यदि आपको मित्रद्वारा कलम दी गई; तो उसे लौटाते समय आप उसे ‘धन्यवाद’ कहते है । यदि ऐसा है, तो ईश्वर ने हमें जन्म देकर वायु, जल, अन्न, जीवनयापन के लिए आवश्यक वस्तुए, सशक्त शरीर तथा बुद्धी प्रदान की है; इसीलिए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए ।

२. ‘ईश्वर ही हमारे लिए सबकुछ करते है’, ऐसा प्रतीत होकर ईश्वर के चरणो में कृतज्ञता व्यक्त करने से मन में किसी भी प्रकार के अहंकार निर्माण नहीं होगा  ।  भगवान से वार्तालाप (आत्मनिवेदन)

आ. ३ अ. आत्मनिवेदन का अर्थ क्या है ?

बच्चो, भाव वृद्धी करने के लिए मनही मन ईश्वर से बातचीत करते रहें । मन के इष्ट-अनिष्ट विचार, जीवन की इष्ट-अनिष्ट घटनाएं एवं कठिनाइयां ऐसे विषयों पर भगवानजी से मन खोलकर वार्तालाप करें । इस प्रकारे ईश्वर से वार्तालाप करने के कृत्य को ‘आत्मनिवेदन’ कहते है ।

आ ३ आ. ईश्वर से मित्रवत बातें करें ।

यदि प्रारंभ में मनद्वारा ईश्वर से वार्तालाप करना संभव न लगे तो, आपके मनपसंद देवता अथवा उपास्यदेवता का छायाचित्र सामने रखकर अपने मन की सभी बातें बताएं । जिस प्रकार हम अपने मित्रों से निकटता से एवं सहजभाव से बोलते है, उसी प्रकार भगवानजी को मित्र मानकर उनसे वार्तालाप करें । हरएक कृत्य के पूर्व ‘भगवानजी, मैं यह कृत्य किस प्रकार करूं ? आपको कैसा प्रिय है ?’ ऐसा पूछें ।

आ ३ इ. भगवान से वार्तालाप करने से होनेवाले लाभ

१. मनद्वारा भगवानजी से बोलने से उनसे निकटता संभव होकर, उनके प्रति प्रेम उत्पन्न होता है एवं मन हलका होता है ।

२. भगवानजी सदैव उपस्थित है, इसकी प्रतीती आती है ।

३. हम जो भी कुछ बात करते है, वह सर्व भगवान सुनते हैं एवं हमे कठिनाईयों में मार्गदर्शन भी करते हैं।

बच्चो, इस प्रकार प्रार्थना, कृतज्ञता एवं भगवान से सदैव वार्तालाप करने से आपका भाव बढेगा । भगवान आपकी पुकार सुनकर तुरंत आपकी रक्षा करेंगे ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित लघुग्रंथ, ‘प्रार्थना’