दूरचित्रवाणी के दुष्परिणाम

बच्चो, आपको दूरचित्रवाणी देखना निश्चितरूप से अच्छा लगता होगा; परंतु इस के लाभ अल्प एवं दुष्परिणाम ही अधिक हैं । यह आपको ज्ञात है क्या ? नहीं न ? फिर ये दुष्परिणाम कौनसे हैं, यह देखेंगे !

आंखों की हानि होना

बच्चो, दूरचित्रवाणी अर्थात ‘टी.वी.’ आजकल सभी का अत्यंत प्रिय शब्द है ।इस शब्द ने सभीपर क्या जादू कर रखा है, कौन जाने ? कुछ बच्चे दूरचित्रवाणी के सामने एकाग्रता से डटे बैठे रहते हैं । उन्हें खेलने के लिए बुलानेपर भी वे दूरचित्रवाणी देखना ही पसंद करते हैं । अनेक बार ऐसे बच्चों के बडे नंबर का चश्मा भी चढा होता है । बीच-बीच में इन बच्चों को आंखों में वेदना होने की शिकायत भी रहती है ।

दूरचित्रवाणीपर कार्यक्रम देखते हुए भोजन ग्रहण करने का बुरा परिणाम होना

कुछ बच्चे दूरचित्रवाणीपर के कार्यक्रमों को देखते हुए भोजन ग्रहण करते हैं । उस कार्यक्रम के झगडे, दुःखद प्रसंग, हत्या आदि का दुष्परिणाम भोजनपर होता है । उनका शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य बिगड सकता है ।

अयोग्य कार्यक्रम देखने के कारण कुसंस्कार होना

अनेक बच्चे पारिवारिक धारावाहिक देखते हैं । उन धारावाहिकों में अधिकांशत: राग-द्वेष के कारण झगडे रोना-पीटना होता है । दूरचित्रवाणीपर सिनेमा, सिनेकलाकारों की मुलाकात, अश्लील गीत तथा नृत्य देखकर बच्चों में ऐसी भावना उत्पन्न होती है कि‘स्वयं भी उन कलाकारों का अनुकरण करें ।’

गलत आदतें डालकर भावी पीढीपर विपरीत परिणाम होना

दूरचित्रवाणीपर मालिका तथा सिनेमाद्वारा उलटा बोलना, चोरी करना, मारपीट करना, हत्या करना, ऐसी अनेक कुसंस्कारजन्य बातों के कारण बच्चों के गलत मार्गपर जाने की संभावना बढ जाती है ।

भूतों विषयी मालिका देखकर बच्चे भयभीत होते हैं तथा नींद में हडबडाकर,चीखकर अथवा रोते हुए उठ जाते हैं ।

परीक्षा समीप आ गई, तब भी बच्चों को दूरचित्रवाणीपर के कार्यक्रम देखने का मोह नहीं छूटता है । इसका परिणाम यह होता है कि बच्चोंद्वारा ठीक से अभ्यास नहीं होता है और उसका परिणाम उनके भावी जीवनपर होता है ।

जीवन का अमूल्य समय व्यर्थ जाना

बच्चे भूख, नींद, अभ्यास, खेल तथा अन्य काम छोडकर दूरचित्रवाणीपर के कार्यक्रम देखने में मग्न दिखाई देते हैं । दूरचित्रवाणी देखने में बचपन का उनका अधिकांश समय व्यर्थ जाता है ।

मनोरंजन में डूबे होने से राष्ट्र तथा धर्म के विषय में कर्तव्य भूलना तथा साधना न करना

आजकल दूरचित्रवाणीपर ३ से १५ वर्षतक की आयु के बच्चों को भी नृत्य, गायन,अभिनय, विनोद समान मनोरंजनात्मक कार्यक्रमों में सहभागी किया जाता है । उनके सामने अभिनेता-अभिनेत्रियों का आदर्श रखा जाता है । इन सर्व मनोरंजन में बच्चों सहितबडे लोग भी स्वयं को इतना सम्मिलित कर लेते हैं कि, ‘राष्ट्र तथा धर्म के विषय में नागरिकों का कुछ कर्तव्य है’ यही सर्व जन भूल जाते हैं ।

भगवान का नामजप, स्तोत्रपाठ इत्यादि साधना प्रत्येक को ही प्रतिदिन करना आवश्यक है; परंतु वर्तमान में सभीपर दूरचित्रवाणी का इतना प्रभाव पडा है कि उन्हें प्रतिदिन यह सर्व करना चाहिए इसका भी विस्मरण हो जाता है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘सुसंस्कार तथा उत्तम व्यवहार’