घर आए हुए अतिथीओं का स्वागत एवं आवभगत करें !

घर पे मेहमान या अतिथी आनेपर कैसा वर्तन करना टालना चाहीए ?

अनेक बार मां – पिताजी के पेहेचानवाले व्यक्ती घर में मिलने के लिए आते है । हाली में घर में कोई मिलने के लिए आए, तो भी बच्चे सुखासनपर (सोफेपर) अथवा आसंदीपर (कुर्सीपर) बैठकर दूरदर्शन देखते रहते हैं । उनका अधिक ध्यान दूरदर्शन पे होने से अतिथियों की ओर नहीं होता । अतिथि खडे ही होते तब भी बच्चे बैठे रहते है, अपनी जगह से उठते नहीं । दूरदर्शन के बडे आवाज के कारण अतिथी एवंम् माता-पिताजी को बोलने में अडचणे आती है । इसलिए माता-पिता जब दूरदर्शन बंद कर भीतर जाने के लिए कहते हैं अथवा दूरदर्शन की ध्वनि धीमी करने के लिए कहते हैं, उस समय कुछ बच्चे अतिथियों के सामने ही चिढकर कहते हैं, ‘क्याऽऽ है’ । (बच्चो, ऐसा आचरण करना उचित है क्या ?)

घर आए अतिथीयों के विषय में भाव कैसा होना चाहीए ?

हिंदु संस्कृति में कहा गया है, ‘अतिथिदेवो भव ।’ इसका अर्थ है कि अतिथि देवतासमान होते हैं । ‘अतिथिके रूप में देवता ही घर आते हैं’, यह हमारी हिंदु संस्कृति की शिक्षा है । अतः बच्चो, केवल माता-धर्म के शिक्षा अनुसार अतिथियों का आदर हमें करना चाहीए । उनका स्वागत एवंम् आदरातिथ्य उचित पद्धति से करना चाहीए ।

घर अतिथि एवं मेहमान आने से उनका स्वागत एवंम् आवभगत करने की उचित पद्धति

१. स्मित हास्यसहित हाथ जोडकर नमस्कार कर अतिथियों का स्वागत करें ।

२. उनके हाथ में कोई झोला, अटैची इ. हो, तो उसे विनम्रतापूर्वक उठाकर उचित स्थानपर रखें ।

३. उन्हें आसंदी (कुर्सी) अथवा सुखासन (सोफा) दिखाकर बैठने की विनती करें ।

४. तत्पश्चात, पीने के लिए पानी दें ।

५. उनके बैठनेपर ही बच्चों को बैठना चाहिए । ऐसा करने से उनके प्रति आदरभाव व्यक्त होता है ।

६. स्मितहास्य करते हुए प्रेम एवं अपनत्व के भाव से उनका कुशल-मंगल पूछें ।

७. माता-पिता यदि उनके लिए चाय, कॉफी अथवा कोई शीत पेय बनाने के लिए कहें, तो वह तुरंत बनाएं । यह आदर-सत्कार का ही अंग है ।

८. माता-पिता अतिथियों से बात कर रहे हों, तो बीच में न बोलें ।

९. अतिथि जाने के लिए खडे हों, तो बच्चे भी खडे हो जाएं ।

१०. उन्हें विदा करते समय उनके साथ कुछ दूरतक जाएं ।

इस प्रकार अतिथी में देवता का रूप देखकर उनका आवभगत / अदरातिथ्य करें । अतिथीयों का अदरातिथ्य करते समय उनके अंदर होनेवाले भगवान के लिएही सब करते है, ऐसा भाव रखकर सभ कृतीयां करें । इससे हमें उनके अंदर होनेवाले भगवान के अशीर्वाद मिलते हैं । हिंदु संस्कृति में बताया गया ‘अतिथी देवो भव ।’ इस शिक्षा का आचरण करे आनंद प्राप्त करना ।

संदर्भ : सनातन निर्मित ग्रंथ ‘ सुसंस्कार एवं उत्तम व्यवहार’