हुतात्‍मा भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव

आज हम भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव इन क्रांतिकारियों के जीवन के प्रेरक प्रसंग सुनेंगे । क्रांतिकारीयों के मन में भारतमाता के प्रति कितनी भक्‍ति थी, यह हम सभी जानते है । हमें उनसे यही देशभक्‍ति सिखना चाहिए ।

सरदार भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्‍वर दत्त एवं भगवती चरणवोरा यह स्‍वतंत्रता सेनानी ‘हिंदुस्‍थान सोशलिस्‍ट रिपब्‍लिकन असोसिएशन’ इस संघटना के सभासद थे । उस समय ‘साइमन कमिशन’ के विरोध में आंदोलन चल रहा था । आंदोलन करनेवाले भारतीयों पर लाहौर के दो पुलीस अधिकारी स्‍काट और सांडर्स इन्‍होंने लाठीमार की थी। जिसमें लाला लाजपतरायजी का देहांत हुआ था । इस निर्दयी अत्‍याचार का प्रतिशोध लेने के लिए भगतसिंह एवं अन्‍य स्‍वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की गोली मारकर हत्‍या कर दी । उसके बाद वे सभी भूमिगत हो गए । भूमिगत अर्थात अंग्रेज सरकार के सामने आए बिना अर्थात छूपकर क्रांतिकार्य करने लगे । जब वे भूमिगत थे, तभी भगतसिंह और बटुकेश्‍वर दत्त इन्‍होंने देहली विधानसभा में बम फेंका । इससे ब्रिटिश साम्राज्‍य दूसरी बार हिल गया । इस योजना के सूत्रधार स्‍वतंत्रता सेनानी भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु थे । जिन्‍हें अंग्रेज सरकारने फांसी का दंड दिया था ।

हुतात्मा भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की फांसी से पूर्व उनके सहयोगियों के साथ हुई अंतिम भेंट !

‘भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव इन महान क्रांतिकारियों को फांसी का दंड सुनाया गया था । उस समय उनके साथ इस षड्यंत्र में सहभागी शिवकर्मा, जयदेव कपूर एवं अन्य सहयोगियों को आजन्म कारावास का दंड सुनाया गया था । जिन सहयोगियों को आजन्म कारावास मिला था उन्हें अगले दिन बंदीगृह ले जानेवाले थे । तब बंदीगृह के वरिष्ठ अधिकारियोंने भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव से अंतिम भेंट करने की उन्हें अनुमति दी ।

इस भेंट में जयदेव कपूरने भगतसिंह  से पूछा, ‘आपको फांसी दी जा रही है । युवावस्था में मृत्यु का सामना करते हुए क्या आपको दु:ख नहीं हो रहा ? तब भगतसिंहने हंसकर कहा, ‘अरे ! मेरे प्राणों के बदले में ‘इंकलाब जिंदाबाद’ की घोषणा हिंदुस्थान के गली-कूचोंमें पहुंचाने में मैं सफल हुआ हूं और इसे ही मैं अपने प्राणों का मूल्य समझता हूं । आज इस बंदीगृह के बाहर मेरे लाखों बंधुओं के मुख से मैं यही घोषणा सुन रहा हूं । इतनी छोटी आयु में इससे अधिक मूल्य कौन-सा हो सकता है ?’ उनकी तेजस्वी वाणी से सभी की आंखें भर आर्इं । सभीने बडी कठिनाई से अपनी सिसकियां रोकीं । तब उनकी अवस्था देखकर भगतसिंह बोले, ‘मित्रों, यह समय भावनाओं में बहने का नहीं है । मेरी यात्रा तो समाप्त हो ही गई है; परंतु आपको तो अभी अत्यंत दूर के लक्ष्यतक जाना है । मुझे विश्वास है कि आप न हार मानेंगे और न ही थककर बैठ जाएंगे ।’

उन शब्दोंसे उनके सहयोगियों में अधिक जोश उत्पन्न हुआ । उन्होंने भगतसिंह को आश्वासन दिया कि ‘देश की स्वतंत्रता के लिए हम अंतिम सांसतक लढेंगे’, और इस प्रकार यह भेंट पूर्ण हुई । इसके पश्चात् भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव के बलिदान से हिंदुस्थान वासियों के मन में देशभक्ति की ज्योत अधिक तीव्रता से जलने लगी ।’

(‘साप्ताहिक जय हनुमान’, १३.२.२०१०)

क्रांतिकारी अपने परिजनों को कैसे दिलासा देते थे । इसका एक प्रसंग सुनते है ।

भगतसिंह कारावास में थे । एक दिन भगतसिंह के परिजन उनसे मिलने लाहौर गए । भगतसिंह को बरैक से बाहर लाया गया । उनके साथ पुलिस अफसर सहित कई जवान थे । भगतसिंह सदैव की तरह अपने घरवालों से मिले । उनके चेहरेपर परेशानी के लेशमात्र भी चिन्‍ह नहीं थे । उन्‍हें पूर्ण विश्‍वास था कि परिजनों से यह उनकी आखिरी मुलाकात है । उन्‍होंने मां से कहा, ‘‘बेबेजी, (पंजाबी भाषा में मां को बेबेजी कहते है) दादाजी अब ज्‍यादा दिन तक नहीं जिएंगे । आप बंगा जाकर उनके पास ही रहना ।’’ उन्‍होंने सबका धैर्य बंधाया, सबको सांत्‍वना दी । अंत में मां को पास बुलाकर हंसते-हंसते मस्‍ती भरे स्‍वर में कहा, ‘‘लाश लेने आप मत आना । कुलबीर को भेज देना । कहीं आप रो पडीं, तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की मां रो रही है ।’’ इतना कहकर वे इतनी जोर से हंसे कि जेल अधिकारी उन्‍हें फटी आंखों से देखते रह गए ।

क्रांतिकारीयों को मृत्‍यु का कोई भय नही था । अपनी भारतमाता के लिए प्राणों का बलिदान देने में उन्‍हे गर्व अनुभव हो रहा था । उनकी देशभक्‍ति कितनी थी, यह हमें सिखने मिलता है । हमारे मन में देश के प्रति उनके जैसा प्रेम/ भक्‍ति है क्‍या, यह हमें देखना चाहिए । देश के प्रति हर कर्तव्‍य निभाना चाहिए ।