भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव बलिदान दिवस निमित्त

हुतात्मा भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की फांसी से पूर्व उनके सहयोगियों के साथ हुई अंतिम भेंट !

‘भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव इन महान क्रांतिकारियों को फांसी का दंड सुनाया गया था । उस समय उनके साथ इस षड्यंत्र में सहभागी शिवकर्मा, जयदेव कपूर एवं अन्य सहयोगियों को आजन्म कारावास का दंड सुनाया गया था । जिन सहयोगियों को आजन्म कारावास मिला था उन्हें अगले दिन बंदीगृह ले जानेवाले थे । तब बंदीगृह के वरिष्ठ अधिकारियोंने भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव से अंतिम भेंट करने की उन्हें अनुमति दी ।

इस भेंट में जयदेव कपूरने भगतसिंह  से पूछा, ‘आपको फांसी दी जा रही है । युवावस्था में मृत्यु का सामना करते हुए क्या आपको दु:ख नहीं हो रहा ? तब भगतसिंहने हंसकर कहा, ‘अरे ! मेरे प्राणों के बदले में ‘इंकलाब जिंदाबाद’ की घोषणा हिंदुस्थान के गली-कूचोंमें पहुंचाने में मैं सफल हुआ हूं और इसे ही मैं अपने प्राणों का मूल्य समझता हूं । आज इस बंदीगृह के बाहर मेरे लाखों बंधुओं के मुख से मैं यही घोषणा सुन रहा हूं । इतनी छोटी आयु में इससे अधिक मूल्य कौन-सा हो सकता है ?’ उनकी तेजस्वी वाणी से सभी की आंखें भर आर्इं । सभीने बडी कठिनाई से अपनी सिसकियां रोकीं । तब उनकी अवस्था देखकर भगतसिंह बोले, ‘मित्रों, यह समय भावनाओं में बहने का नहीं है । मेरी यात्रा तो समाप्त हो ही गई है; परंतु आपको तो अभी अत्यंत दूर के लक्ष्यतक जाना है । मुझे विश्वास है कि आप न हार मानेंगे और न ही थककर बैठ जाएंगे ।’

उन शब्दोंसे उनके सहयोगियों में अधिक जोश उत्पन्न हुआ । उन्होंने भगतसिंह को आश्वासन दिया कि ‘देश की स्वतंत्रता के लिए हम अंतिम सांसतक लढेंगे’, और इस प्रकार यह भेंट पूर्ण हुई । इसके पश्चात् भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव के बलिदान से हिंदुस्थान वासियों के मन में देशभक्ति की ज्योत अधिक तीव्रता से जलने लगी ।’

(‘साप्ताहिक जय हनुमान’, १३.२.२०१०)