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भगिनी निवेदिता – भारत के उत्थान कार्य हेतु सर्वस्व का त्याग करनेवाली विवेकानंद शिष्या !


भगिनी निवेदिताभगिनी निवेदिता वर्ष १८९८ में भारत में आई तथा आयु के ४४ वे वर्ष में उन्होंने इस जगत्का त्याग किया । पारतंत्र के राजनेताओंद्वारा उन्हें कोई भी राजसम्मान प्राप्त नहीं हुआ; किंतु जनसामान्योंद्वारा उनका ‘विवेकानंद कन्या’ इस विशेषण से सम्मान किया गया । भारत की संस्कृति सूक्ष्मरूप से ज्ञात करने के लिए समर्पित हुए एक विदेशी महिला का इससे बडा सम्मान क्या होगा ? निवेदिता का यह समर्पण दधिची ऋषि के वङ्का के समान एवं नवविधा भक्ति के समर्पण भक्ति के समान था । निवेदिता के त्याग में भारत के उत्थान का जो स्फुल्लिंग था, वहीं आज नए रुप से प्रज्वलित करने की आवश्यकता है ।

 १. ईसाई तथा बुद्ध पंथ एवं विज्ञान का अभ्यास करने के पश्चात् भी संदेहावस्था का रहना !

भगिनी निवेदिता (१८६७-१९११) का मूल नाम था मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल । लेखक तथा अध्यापक होनेवाली मार्गारेट ने लंडन में सामाजिक कार्य करने के साथ-साथ ईसाई पंथ का भी अभ्यास आरंभ किया था; किंतु उन्हें इस पंथ के विचारों में विरोधाभास एवं त्रुटियां सामने आई । विज्ञान के अभ्यास से उसके मन के सभी संदेह दूर होंगे, ऐसे प्रतीत होने के कारण उन्होंने विज्ञान का अभ्यास किया; किंतु उसमें भी उसका पूरी तरह से समाधान नहीं हुआ । उसने बुद्ध पंथ का भी अभ्यास किया; किंतु समाधान नहीं हुआ ।

२. मन के सभी संदेहों का समाधान करनेवाले स्वामी विवेकानंद से भेंट !

वर्ष १८९५ में स्वामी विवेकानंद लंडन में व्याख्यान हेतु आए थे । वहां लेडी इझाबेल मार्गेसन के घर में मार्गरेट की स्वामीजी से प्रथम भेंट हुई । तत्पश्चात् उसने स्वामीजी के अनेक व्याख्यान सुनें । प्रत्यक्ष भेंट में उनके साथ अनेक विषयोंपर विचार विमर्श किया । स्वामीजी का उदात्त दृष्टिकोण, वीरोचित आचरण तथा स्नेहाकर्षण का उसपर प्रभाव हुआ । मार्गरेट के मन में यह विश्वास उत्पन्न हुआ कि, जिस सत्य की खोज में वह थी, उस सत्य के निकट जाने का मार्ग स्वामीजीद्वारा ही प्राप्त होगा तथा तीन वर्ष के पश्चात् उसने भारत में प्रस्थान किया । – (स्व-रूपवर्धिनी का वार्षिक विशेषांक २०१०)

 ३. मार्गरेट से निवेदिता !

मार्गरेट की मां मेरी नोबेल ने लडकी का नाम रखा था, मार्गरेट अर्थात् ईश्वरी कार्य को समर्पित हुई । स्वामी विवेकानंद के मार्गदर्शन से प्रभावित हुई मार्गरेट भारत में आई । तदुपरांत उसने स्वामी विवेकानंद से ब्रह्मचारिणी की दीक्षा प्राप्त की । उस समय उसका संजोग से नया नामकरण हुआ, निवेदिता अर्थात् समर्पिता ! इस दीक्षा के पश्चात् स्वामीजीने उन्हें शिवभक्ति का पहला पाठ पढाया ! तदनंतर आशीर्वाद देकर स्वामीजीने बताया, जिन्होंने बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए ५०० बार जनकल्याणार्थ स्वयं का समर्पण किया था, उनके पास जाओ एवं उनका अनुसरण करें ।

४. भारतीय संस्कृति आत्मसात कर स्वामी विवेकानंद की कसौटी को पात्र हुई निवेदिता !

ब्रह्मचारिणी दीक्षा से पूर्व स्वामीजीने निवेदिता से बताया कि, तुम्हें अंतर्बाह्य हिन्दू होना चाहिए ! ऐहिक आवश्यकता, विचारधारा तथा स्वभाव का भी हिन्दूकरण करना ही चाहिए । उसके लिए तुम्हें अपना भूतकाल, उसकी प्रत्येक घटना का विस्मरण होना चाहिए । अर्थांत् पूरी तरह से विस्मृति ! कितना भी कठीन हो, अपितु भारतीय विचार पद्धती से ही साधना एवं आदर्शों का आकलन करना चाहिए, यह स्वामीजी का आग्रह था; किंतु उनके इस कसौटी में भी वह पूरी तरह से सफल हुई ।

५. समाज, राष्ट्र एवं धर्म के लिए अत्यल्प कालावधी में आकाश के समान महान कार्य करनेवाली निवेदिता !

भगिनी निवेदिता को साधारण बातों को भी सकारात्मक दृष्टि से देखने की अद्वितीय कला अवगत थी । केवल १२-१३ वर्ष के अत्यल्प कालावधी में उन्होंने आकाश के समान महान कार्य किया । निवेदिता के कार्य की ओर पृथक दृष्टि से देखने के पश्चात् यह प्रतीत होता है कि, प्रत्येक दृष्टि में उन्होंने हर बार नए रूप से समर्पण किया था ।

५ अ. समाजकार्य : प्लेग की साथी में रुग्णों की सेवा करना, नई पाठशाला आरंभ करना तथा उसके लिए परदेश से व्याख्यानद्वारा धन इकट्ठा करना, जगदीशचंद्र बसुं के समान शास्त्रज्ञ के संशोधनपर टिपण्णीद्वारा हस्तलिखित सिद्ध करना, विज्ञान मंदिर की स्थापना हेतु परिश्रम करना, इनके समान पृथक उपक्रमोंद्वारा निवेदिता ने समाजसेवा के साथ-साथ सभी को दिशा दर्शाने का भी कार्य किया ।

५ आ. राष्ट्र एवं धर्म कार्य : दीक्षा प्राप्त होने के पश्चात् भगिनी निवेदिता भारत की जीवनपद्धति, भाषा एवं हिन्दू धर्म के साथ पूरी तरह से समरस हुई । इन सारी बातों का गर्व से उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं का वाहनद्वारा विक्रय किया । स्वामीजी के महानिर्वाण के पश्चात् उन्होंने उत्तिष्ठत जाग्रत… यह संदेश स्मरण कर उनका ही कार्य पूरे करने के लिए पूरी तरह से स्वयं को इस राष्ट्रकार्य में समर्पित किया । हिन्दुस्थान में स्वामीजी का संदेश बताने के लिए उन्होंने यात्रा भी की । साहित्य एवं कला क्षेत्र में भी निवेदिताने अपना प्रभुत्व सिद्ध किया ।

५ इ. क्रांतिकार्य : क्रांतिकार्य के समय भी भगिनी निवेदिता एक कदम भी पीछे नहीं हटी । निवेदिता कहती थी कि, स्वतंत्रता यह भारत की प्रथम आवश्यकता है । क्रांतिकारकों को प्रेरित करना, स्वतंत्रता के आंदोलन में प्रत्यक्ष सम्मिलित होने के लिए रामकृष्ण मठ से दूर जाना, लॉर्ड कर्जन को पराभूत करने का साहस एवं बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करना, स्वामीजी के छोटे बंधु क्रांतिकारक भूपेंद्रनाथ के कडवे लेख के कारण उनपर प्रविष्ट किए गए राजद्रोह के परिवाद से उनकी जमानतपर मुक्तता करने हेतु स्वयं के कुछ सहस्त्र रुपएं न्यायालय में इकट्ठा करना, इस प्रकार अनेक कृतियोंद्वारा उनका क्रांतिकार्य स्पष्ट होता है ।

– स्मिता गुरव । (मासिक विवेक, १६.१०.२०११)