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श्री गणेश पूजाविधियां व उनका महत्त्व

पूर्वपूजाविधियां व उनका महत्त्व : आगे दी गई सर्व विधियों के दौरान प्रत्येक विधिके विशेष मंत्र का उच्चारण करते हैं ।

१. आचमन : इससे अंतर्शुद्धि होती है ।

२. देशकाल : देशकाल का उच्चारण करें ।

३. संकल्प : संकल्प बिना किसी भी विधि का फल मिलना कठिन होता है ।

४. आसनशुद्धि : इसके लिए अपने आसन को स्पर्श कर नमस्कार करें ।

५. पुरुषसूक्त न्यास : पुरुषसूक्त बोलते हुए शरीर में हृदय, मस्तक, चोटी, चेहरा, दोनों आंखें व भ्रूमध्य के स्थानपर देवता की स्थापना करें । इससे सात्त्विकता बढ़ने में सहायता मिलती है ।

६. श्री गणपतिपूजन : नारियलपर अथवा सुपारीपर श्री गणपति का आवाहन कर उनका पूजन करें ।

७. कलशपूजा : कलश में सर्व देवता, समुद्र व पवित्र नदियां इत्यादिका आवाहन कर कलश को गंध, अक्षत व फूल चढ़ाने चाहिए । इस सात्त्विक जल का पूजा में प्रयोग करते हैं ।

८. शंखपूजा : शंख धोकर उसमें जल भरें, फिर शंखपर गंध व सफेद फूल चढ़ाएं । शंखपर अक्षत व तुलसीपत्र नहीं चढ़ाने चाहिए ।

९. घंटापूजा : देवताओं के स्वागत हेतु व राक्षसों को निकालने के लिए घंटानाद करें । घंटा धोकर, बाएं हाथ में रखकर, उसपर गंध, अक्षत व फूल चढ़ाएं ।

१०. दीपपूजा : दीपपर गंध व फूल चढ़ाएं ।

११. श्री गणपति के ऊपर बनाए गए विशिष्ट तोरण (कच्चे फल, कंदमूल इत्यादि के एकत्रित बंधन)पर गंध, पुष्प व अक्षत चढाकर पूजा करें ।

१२. पवित्रिकरण : शंख में भरे पानी को अपने दाहिने हाथ में उंडेलकर अपने ऊपर व पूजासाहित्यपर छिड़के ।

१३. द्वारपूजा : हाथ में फूल व अक्षत लेकर चारों दिशाओं में बिखेरें । यह द्विपाल पूजा ही है ।

१४. प्राणप्रतिष्ठा : देवता की मूर्ति के हृदयपर दाहिना हाथ रख मंत्रोच्चारण करें । गणेश चतुर्थीपर या नई मूर्ति स्थापित करने के लिए प्राणप्रतिष्ठा करते हैं । यह सामान्य पूजा में नहीं किया जाता; क्योंकि प्रतिदिन पूजित मूर्ति में ईश्वरीय तत्त्व आ चुका होता है ।

१५. ध्यान : ‘वक्रतुंड महाकाय’ इस मंत्र का उच्चारण करें ।

१६. आवाहन : आमंत्रण के समय ‘ॐ सहस्रशीर्षा पुरुष:०’ इस मंत्र का उच्चारण करते हुए अक्षत चढ़ाएं । देवता का तत्त्व मूर्ति में तुरंत आने हेतु अक्षता सहायक है ।

१७. आसन : आसनप्रीत्यर्थ अक्षत चढ़ाएं ।

१८. पाद्य (पादप्रक्षालन) : पैर धोने के लिए फूलों से / दूर्वा से मूर्ति के चरणोंपर जल छिडके ।

१९. अघ्र्य : चम्मच में जल लेकर व उसमें चंदन-शहद घोलकर, उस जल को फूल से गणपति के अंगपर छिडके । यह गुलाबजल छिड़ककर स्वागत करने के समान है ।

२०. आचमन : देवता आचमन कर रहे हैं, ऐसा मानकर आचमनी में जल लेकर देवता को चढ़ाएं ।

२१. मलापकर्षस्नान : देवतापर आचमनी से जल डालकर स्नान कराना चाहिए ।

२२. पंचामृतस्नान : प्रथम पंचामृत से (दूध, दही, घी, शहद व शक्कर इस क्रम से) स्नान कराएं । प्रत्येक बार आचमनी में जल लेकर स्नान कराएं । तदुपरांत आचमन हेतु तीन बार आचमनी से जल डालकर अंत में चंदन, अक्षत तथा फूल चढ़ाएं ।

२३. पूर्वपूजा : गंध, अक्षत, फूल (लाल फूल), धूप, दीप आदि से पूजा कर बचे हुए पंचामृत का भोग लगाएं । इसके लिए मूर्ति के सामने जल का मंडल बनाकर उसपर पंचामृत रखें । (मंडल बनानेपर देवताओं के अतिरिक्त अन्य शक्तियां भोग ग्रहण करने हेतु नहीं आतीं ।) हाथ में फूल अथवा तुलसीपत्र लेकर बाएं ओर से आरंभ कर पात्र के चारों ओर हाथ से जल छिडके । तदुपरांत आंखें मूंदकर नैवेद्य की सुगंधको हाथ से देवता की ओर प्रक्षेपित करते हुए पंचप्राणों से संबंधित मंत्र का – ‘ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा । ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा । ॐ ब्रह्मणे स्वाहा ।।’, दो बार उच्चारण करें । दोनों बार पात्र के चारों ओर जल घुमाएं । तदुपरांत ‘नैवेद्यमध्येपानीयं समर्पयामि’ कहकर नैवेद्यपर थोड़ासा जल छिडके, इससे नैवेद्य की सात्त्विकता में वृद्धि होती है । पूजा के अंत में हाथ तथा मुंह धोने की क्रिया के संदर्भ में तीन बार ताम्रपात्र में जल अर्पित करें । गंध में फूल डूबोकर गणपति को चढ़ाएं । देवता के समक्ष बीड़ा (बंधा हुआ पान) रखकर उसपर जल अर्पित करें । फूल चढ़ाकर प्रणाम कर ताम्रपात्र में जल अर्पित करें ।

२४. अभिषेक : पूर्वपूजा के उपरांत अभिषेक किया जाता है । अथर्वशीर्ष अथवा ब्रह्मणस्पतिसूक्त से अभिषेक करें । उस समय दूब अथवा लाल फूल से मूर्तिपर जल छिडके ।

२५. वस्त्रार्पण : दो लाल वस्त्र अर्पण करें ।

२६. यज्ञोपवीत : जनेऊ अर्पण करें ।

२७. विलेपन : छोटी उंगली के पासवाली उंगली (अनामिका)से चंदन लगाएं ।

२८. अक्षतार्पण : अक्षत चढ़ाएं ।

२९. सिंदूरार्पण : सिंदूर चढ़ाएं ।

३०. अन्य परिमलद्रव्य : हल्दी, कुमकुम, गुलाल, बुक्का (काला चूर्ण), अष्टगंध आदि चढ़ाएं ।

३१. पुष्प : लाल फूल चढ़ाएं ।

३२. अंगपूजा : इस पूजा में चरणों से मस्तकतक प्रत्येक अवयवपर अक्षत अथवा फूल चढ़ाते हैं ।

३३. नामपूजा : दूबको लाल चंदन में डुबोकर एक नामजप के साथ एक चढ़ाएं ।

३४. पत्रपूजा : एकेक प्रकारके पत्तेके साथ एक-एक विशिष्ट नाम लेकर चरणोंपर पत्र चढ़ाएं । ‘गणेशजीको आगे दी गई इक्कीस प्रकारके पत्र चढ़ाकर पूजा करते हैं – मधुमालती (मालती), माका (भृंगराज), बेल, श्वेत दूर्वा, बेर, धतूरा, तुलसी, शमी, चिचिड़ा, बृहती (डोरली), करवीर (कनेर), मदार, अर्जुनसादडा, विष्णुकांत, अनार, देवदार, मरुबक (मरवा), पीपल, जाही (चमेली), केवड़ा (केतकी) व अगस्त्य । वास्तवमें गणेश चतुर्थीके अतिरिक्त अन्य दिन तुलसीके पत्ते गणपतिको कभी नहीं चढ़ाते ।’

३५. पुष्पपूजा : एकेक प्रकारके पुष्पके साथ एकेक विशिष्ट नाम लेते हुए देवताकी ओर डंठल कर फूल चढ़ाएं ।

३६. धूपदर्शन : धूप तथा उदबत्ती (अगरबत्ती) घुमाएं ।

३७. दीपदर्शन : नीरांजन (सकर्ण व पंचबाती दीप)से आरती करें ।

३८. नैवेद्य (भोग) : पूर्वपूजामें बताए अनुसार भोग लगाएं ।

३९. तांबूल : देवताके समक्ष तांबूल (बीड़ा) रखकर उसपर जल अर्पित करें ।

४०. दक्षिणा : पानपर दक्षिणा रखकर उसपर जल अर्पित करें ।

४१. फलसमर्पण : देवता की ओर चोटी कर देवताके समक्ष नारियल रखें । उसपर जल अर्पित करें । नारियल न मिले तो उस ऋतु में उपलब्ध फलो का प्रयोग करें । (नारियल की शिखा देवता की ओर करने से नारियल में देवता की शक्ति आती है । तदुपरांत भक्त नारियल में विद्यमान शक्ति प्राप्त करने हेतु प्रसाद के रूप में उसका सेवन करते हैं ।)

४२. आरती : आरतियां करें ।

४३. प्रार्थना : ‘जो सुमिरत होइ गन नायक करिवर बदन । करहु अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन ।। – रामचरित मानस बालकांड -१

४४. मंत्रपुष्पांजलि : ‘ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत०’ मंत्ररूपी पुष्पांजलि अर्पित करें ।

४५. परिक्रमा व नमस्कार : अपने चारों ओर तीन परिक्रमाएं लगाकर, पूजक साष्टांग नमस्कार करे ।

४६. प्रार्थना : ‘आवाहनं न जानामि०’ इस मंत्र से प्रार्थना कर हथेलीपर जल लेकर उसे ताम्रपात्र में छोडें ।

४७. दर्शनार्थियों का नमस्कार : आरती एवं मंत्रपुष्पांजलि के लिए उपस्थित तथा दिनभर में कभी भी दर्शन के लिए आनेवाले श्रद्धालु, श्रीगणेश को फूल तथा दूर्वा चढ़ाकर साष्टांग नमस्कार करें । घर के व्यक्ति उन्हें प्रसाद दें ।

४८. तीर्थप्राशन : ‘अकालमृत्युहरणं०’ मंत्र का उच्चारण कर तीर्र्थ प्राशन करें ।

मध्यपूजाविधि : जबतक गणपति घरपर हैं, तबतक प्रतिदिन सुबह-शाम प्राणप्रतिष्ठा के अतिरिक्त गणपति की नित्य पूजा करें तथा अंत में आरतियां व मंत्रपुष्प बोलें ।

उत्तरपूजा (उत्तर आवाहन)

विधि : यह पूजा गणपति के विसर्जनपूर्व होती है । आगे दिए विशिष्ट मंत्रों के उच्चारणद्वारा पूजा करें – १. आचमन, २. संकल्प, ३. चंदनार्पण, ४. अक्षतार्पण, ५. पुष्पार्पण, ६. हरिद्रा (हल्दी) – कुमकुमार्पण, ७. दूर्वार्पण, ८. धूप-दीप-दर्शन तथा ९. भोग. (पाठभेद : चंदन, हलदी तथा कुमकुम एक साथ चढ़ाएं ।)

तदुपरांत आरती कर मंत्रपुष्पांजलि समर्पित करें । उपस्थित भक्त गणपति के हाथों में अक्षत रखकर, मूर्ति को दाहिने हाथ से हिलाएं ।

महत्त्व : पूजा का उद्देश्य यह है कि, पूजक गणेश तरंगों से संपुष्ट हो जाए । संपृक्तता बढ़ाने हेतु अंतिम चरण है उत्तरपूजा । उत्तरपूजा के समय मूर्ति में विद्यमान सर्व पवित्रक एक साथ ही बाहर की ओर प्रक्षेपित होते हैं । उत्तरपूजा संपन्न होनेपर मूर्ति को अपने स्थान से हलकासा हिलाते हैं । इससे शेष पवित्रक मूर्ति से निकल जानेपर भी पूजा करनेवाले को उसका लाभ मिल सकता है ।

‘गणेशमंदिर में एक भक्त की महापूजा संपन्न होनेपर उत्तरपूजा करते हैं । तदुपरांत अगले भक्तकी महापूजा करते हैं । इससे उत्तरपूजा का विशेष महत्त्व ध्या नमें आता है । ‘गणपतिका पुन: आवाहन किया है, वैसे ही उन्हें सम्मान से (विसर्जित) विदा करना महत्त्वपूर्ण है ।’

विसर्जन : उत्तरपूजा उपरांत जलाशय में मूर्तिविसर्जन करते हैं । विसर्जन के लिए जाते समय गणपति के साथ दही, पोहे, नारियल, मोदक इत्यादि व्यंजन दें । जलाशय के पास पुनः आरती करें व मूर्ति को व्यंजनसहित जल में विसर्जित करें ।

संदर्भ : श्री गणेशपूजाविधान. संकलनकर्ता : स.कृ. देवधर. प्रकाशक : प्रसाद प्रकाशन, १८९२ सदाशिव पेठ, पुणे ३०.

मूर्ति को बहते जल में विसर्जित (प्रवाहित) करने का कारण : उपासना-विधियों के फलस्वरूप गणपति के पवित्रकों से समृद्ध मूर्ति के विसर्जन से जलस्रोत पवित्र बनता है । बहते जल के साथ सर्व पवित्रक दूरतक पहुंचते हैं और अनेकों को उनका लाभ मिलता है । ऐसे जल का बाष्पीभवन होने के कारण भी समस्त वातावरण के सात्त्विक बनने में सहायता मिलती है । विसर्जन के समय विसर्जन-स्थल की मिट्टी घर लाकर सर्वत्र छिड़कने की प्रथा है ।

‘गणेशविसर्जन के संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण बात :मृत्तिका की मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठाद्वारा लाया गया देवत्व एक दिन से अधिक रह ही नहीं सकता । इसका अर्थ गणेशविसर्जन कभी भी किया जाए, फिर भी गणेशमूर्ति में विद्यमान देवत्व अगले दिन ही नष्ट हो चुका होता है । इसलिए किसी भी देवता की उत्तरपूजा करनेपर उसी दिन अथवा अगले दिन उस मूर्ति का विसर्जन होना सर्वथा इष्ट है । सोयर या सूतक हो, तो पुरोहितद्वारा ही गणेशव्रत आचरण में लाना इष्ट है । शास्त्र बताता है कि, घर में प्रसूति आदि की राह न देखते हुए नियोजित समयपर विसर्जन करें ।’