१८५७ के स्वतंत्रता संग्रामका प्रथम क्रांतिकारी वीर मंगल पांडे

सत्यव्रती ब्राह्मण सैनिक

मंगल पांडे ३४ वीं पलटन के युवा ब्राह्मण सैनिक थे । वे क्रांतिदल के सदस्य थे ।कोलकाता के निकट बैरकपुर की १९ वीं पलटन को उस समय अंग्रेज अधिकारियोंने गाय और सूअर की चरबी लगे नए कारतूस देने का निर्णय लिया । इन कारतूसों को बंदूक में भरने से पूर्व उसपर लगा चरबी का आवरण दांतों से तोडना पडता था । जिससे इन आवरणोंपर लगाई गई गाय अथवा सूअर की चर्बी मुख में जाती थी । इस कारण पलटन के सैनिकोंने वैसे कारतूस लेने से मना कर दिया । इतना ही नहीं, प्रतिकार स्वरूप प्रतिशोध में उन्होंने शस्त्र भी उठा लिए । उस दिन ब्रिटिश अधिकारियों की संख्या अल्प होने के कारण ब्रिटिशोंने अपमान का घूंट पी लिया । तथा ब्रह्मदेश (म्यानमार)से गोरे सैनिकों की टुकडी मंगाकर इस पलटन को शस्त्रविहीन एवं अपमानित कर निकालने की ठान ली । इसका पालन करना बैरकपुर में निश्चित किया गया । अपने बांधवों के इस अपमान से मंगल पांडे का रक्त खौल उठा । स्वधर्मपर प्राणार्पण करनेवाला, निष्ठावान,आचरण से सत्यव्रती, दिखने में तेजस्वी युवा मंगल पांडे के पवित्र रक्त में देश की स्वतंत्रता के लिए `विद्युत्सी लहर’ दौड गई । उनकी तलवार का धैर्य टूटने लगा । सामने अन्याय होते देख क्षात्रवीर की तलवार म्यान में कैसे रहती ?

संचलन (कवायत) सैनिक शिक्षा देने के मैदान में छलांग !

३१ मई को संपूर्ण सर्वत्र क्रांति संग्राम प्रारंभ करने की श्रीमंत नानासाहेब पेशवे आदि की योजना थी । १९ वीं पलटन के स्वदेशी बंधुओं का अपने सामने ही अपमान हो,इससे मंगल पांडे के अंत:करण में असह्य वेदना होने लगी । अपनी पलटन को आजही कूच करना चाहिए, यह कहते हुए मंगल पांडेने अपनी बंदूक भर ली । दिन था रविवार,२९ मार्च १८५७ । सैनिक शिक्षा देने के मैदान में कूदकर मंगल पांडे ब्रिटिशों के अन्याय के विरुद्ध देशी सैनिकों को उत्साहित करने लगे । `उठो, मर्दों !’ ऐसी गर्जना करते हुए वे सैनिकों से बोले, “अब पीछे न हटो । बंधुओ, चलो टूट पडो ! तुम्हें अपने धर्म की शपथ है !! चलो, अपनी स्वतंत्रता के लिए शत्रु को धूल में मिला दो !!!”यह देखते ही सार्जंट मेजर ह्यूसनने उन्हें पकडने का आदेश दिया; परंतु एक भी सैनिक अपने स्थान से नहीं हिला । इसके विपरीत मंगल पांडे की गोली से ह्यूसन घायल हो गया । यह देखते ही लेफ्टीनेंट बॉ घोडा दौडाते हुए मंगलपर टूट पडा । इतने में ही मंगल की बंदूक से छूटी गोली घोडे के पेट में जा घुसी । घोडा लेफ्टीनेंट सहित भूमिपर गिर पडा । मंगल पांडे के पुनः बंदूक में गोली भरने से पूर्व ही लेफ्टीनेंट बॉ पिस्तौल निकालकर खडा हो गया । मंगल पांडेने क्षणभर भी देर न करते हुए अपनी तलवार खींच ली । बॉने पिस्तौल दागी; परंतु निशाना चूक गया । मंगल पांडेने अपनी तलवार से लेफ्टीनेंट बॉको लुढका दिया । ह्यूसन एवं बॉ अपने निवास स्थान की ओर भाग खडे हुए।

देशद्रोही शेख पालटू

इतने में शेख पालटू नाम का एक मुसलमान सैनिक मंगल की ओर बढने लगा ।वह अपनी पलटन का होने के कारण अपनी सहायता करने आ रहा होगा, ऐसा मंगल पांडे को लगा; परंतु वैसा नहीं हुआ । शेख पालटूने मंगल पांडे को पीछे से दबोच लिया ।पांडेने स्वयं को छुडा लिया । भारतीय सैनिक शेख की ओर पत्थर तथा जूते फैकने लगे ।प्राणों के भय से शेख पालटू भाग गया । थोडी ही देर में कर्नल व्हीलर वहां आया । उसने सैनिकों को मंगल पांडे को पकडने का आदेश दिया । कर्नल व्हीलर से सभी सैनिकोंने स्पष्ट कहा, “हम इस पवित्र ब्राह्मण के केश को हाथ भी नहीं लगाएंगे ।” हिंदुस्तान की भूमिपर गोरे अधिकारियों का रक्त तथा सामने धर्माभिमानी सैनिकों को देखकर कर्नल व्हीलर अपने बंगले की ओर भाग गया । तत्पश्चात जनरल हिअर्स कई यूरोपियन सैनिक लेकर मंगल पांडे की ओर बढा । तबतक दोपहर हो चुकी थी । मंगल पांडे थक चुके थे ।स्वयं फिरंगियों के हाथ लग जायेंगे, यह देखते ही उन्होंने अपनी बंदूक से अपने सीनेपर स्वयं गोली मार ली । मंगल पांडे धरतीपर गिर पडे, वे निश्चेतन हो गए । तब ही ब्रिटिश उन्हें पकड सके । घायल मंगल पांडे को सैनिक चिकित्सालय ले जाया गया ।एक सप्ताह में ही उनपर सैनिक न्यायालय में अभियोग चलाया गया । स्वधर्मपर प्राणार्पण करनेवाले एवं निष्ठावान इस युवा क्षात्रवीर से न्यायालयने अन्य सहयोगी षडयंत्रकारियों के नाम पूछे; परंतु मंगल पांडेने किसी का भी नाम नहीं उगला । उन्हें फांसी का दंड दे दिया गया । अपने देशबंधुओं के अपमान के कारण अपने प्राण न्योछाव रकरनेवाले इस क्रांति अग्रदूतपर लोगों में अटूट श्रद्धा निर्माण हो गयी थी । सारे बैरकपुर में उन्हें फांसी देने के लिए एक भी व्यक्ति नहीं मिला । अंततः इस अपवित्र कार्य के लिए कोलकता से चार व्यक्ति बुलाए गए । मंगल पांडे जिस टुकडी के सैनिक थे, उसके सूबेदार को अंग्रेजोंने मार डाला । १९ तथा ३४ दोनों पलटनों को शस्त्रविहीन कर खालसा कर दिया गया । इसका परिणाम विपरीत ही पडा । सैनिकों को भय लगना तोदूर, सैकडों सैनिकोंने स्वतः ही दासत्व के चिह्न सैनिक गणवेश फाड डाले । इस अधीनता की शृंखला को आजतक पहनने के पाप के प्रक्षालन के लिए उन्होंने वास्तव में भागीरथी में स्नान कर लिया ।

स्वतंत्रता संग्राम के सूर्य को रक्त का अध्र्य

८ अप्रैल की सुबह मंगल पांडे को फांसी के तख्तेपर लाया गया । उनके सर्व ओर सैनिकों का पहरा था । मंगल पांडे साहस से तख्तेपर चढे । ‘`मैं किसी का नाम नहीं बताऊंगा”, पुन: एक बार ऐसा कहते ही उनके पांवों के नीचे का आधार हटा दिया गया ।मातृभूमिके चरणोंपर अपने रक्त का अध्र्य देकर मंगल पांडे १८५७ स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम क्रांतिकारी बन गए । उनके नाम का प्रभाव इतना अद्वितीय था कि इस स्वतंत्रता संग्राम के सर्व सैनिकों को अंग्रेज `पांडे’के नाम से पुकारने लगे ।

८ अप्रैल १८५७ को बैरकपुर की कारागृह में मंगल पांडे का धारोष्ण रक्त इस भारत भूमिपर गिरा । उनके इस रक्तसिंचन से देश तथा धर्म के लिए स्वयं को बलिदान करने के लिए अनेक देशभक्त आतुर हो उठे !