सारणी -
- १. दशहरा (विजयादशमी)
- २. त्यौहार मनाकेकी पद्धति
- ३. श्रीराम, हनुमान तत्त्व तथा क्षात्रवृत्ति जागृत करनेवाला दशहरा
१. दशहरा (विजयादशमी)
अर्थ: दश यानी दस व हरा यानी हार गए हैं । दशहरेके पहले नौ दिनोंके नवरात्रिमें दसों दिशाएं देवीकी शक्तिसे प्रभारित होती हैं व उनपर नियंत्रण प्राप्त होता है, दसों दिशाओंपर विजय प्राप्त हुई होती है । आश्विन शुक्ल दशमीको विजयादशमी कहा जाता है । विजयके संदर्भमें इस दिनके दशहरा, विजयादशमी इत्यादि नाम हैं । यह साडेतीन मुहूर्तोंमेंसे एक है । दुर्गानवरात्रिकी समाप्तिपर यह दिन आता है; इसलिए इसे `नवरात्रिका समाप्ति-दिन' भी मानते हैं । कुछ स्थानोंपर नवराथि नवमीके दिन, तो कुछ स्थानोंपर दशमीके दिन विसर्जित करते है । इस दिन सीमोल्लंघन, शमीपूजन, अपराजितापूजन व शस्त्रपूजा, ये चार विधियां की जाती हैं ।
१.१. इतिहास
रामके पूर्वज अयोध्याधीश रघुने विश्वजीत यज्ञ किया । सर्व संपत्ति दान कर वे एक पर्णकुटीमें रहने लगे । वहां कौत्स आया । उसे गुरुदक्षिणा देने हेतु १४ करोड सुवर्णमुद्राओंकी आवश्यकता थी । रघु कुबेरपर आक्रमण करने तैयार हो गए । कुबेरने आपटा (अश्मंतक) व शमी (श्वेत कीकर) के वृक्षोंपर सुवर्णका वर्षाव किया । फिर भी कौत्सने केवल १४ करोड सुवर्णमुद्राएं लीं । शेष सुवर्ण प्रजाजन ले गए ।'
श्रीराम प्रभुने इस दिन रावण वधके लिए प्रस्थान किया था । रामचंद्रने रावणपर विजयप्राप्तिके पश्चात् इसी दिन उनका वध किया, ऐसी मान्यता है । अज्ञातवास समाप्त होते ही, पांडवोंने शक्तिपूजन कर शमीके वृक्षमें रखे अपने शस्त्र पुन: हाथोंमें लिए व विराटकी गउएं चुरानेवाली कौरवसेनापर हमला कर इस दिन विजय प्राप्त की ।
दशहरेके दिन इष्टमित्रोंको सोना देनेकी प्रथा है । इस प्रथाका भी ऐतिहासिक महत्त्व है । मराठा वीर शत्रुके देशपर मुहिम चलाकर उनका प्रदेश लूटकर सोने-चांदीकी संपत्ति घर लाते थे । जब ये विजयी वीर या सिपाही मुहिमसे लौटते, तब उनकी पत्नी या बहन द्वारपर उनकी आरती उतारतीं । फिर परदेससे लूटकर लाई संपत्तिकी एक-दो मुद्रा वे आरतीकी थालीमें डालते थे । घर लौटनेपर लाई हुई संपत्तिको वे भगवानके समक्ष रखते थे । तदुपरांत देवता तथा अपने वयोवृद्धोंको नमस्कार कर, उनका आशीर्वाद लेते थे । इस घटनाकी स्मृति अश्मंतकके पत्तोंको सोनेके तौरपर बांटनेके रूपमें शेष रह गई है ।
यह त्यौहार आरंभमें एक कृषिविषयक लोकोत्सव था । वर्षा ऋतुमें बोई गई धानकी पहली फसल जब किसान घरमें लाते, तब यह उत्सव मनाते थे । नवरात्रिमें घटस्थापनाके दिन कलशके स्थंडिल (वेदी) पर नौ प्रकारके अनाज बोते हैं व दशहरेके दिन उनके अंकुरोंको निकालकर देवताको चढ़ाते हैं । अनेक स्थानोंपर अनाजकी बालियां तोड़कर प्रवेशद्वारपर उसे बंदनवारके समान बांधते हैं । यह प्रथा भी इस त्यौहारका कृषिविषयक स्वरूप ही व्यक्त करती है । आगे इसी त्यौहारको धार्मिक स्वरूप दिया गया व इतिहासकालमें यह एक राजकीय स्वरूपका त्यौहार बना ।
२. त्यौहार मनाकेकी पद्धति
सीमोल्लंघन: अपराह्न काल (तीसरे प्रहर, दोपहर) में गांवकी सीमाके बाहर ईशान्य दिशाकी ओर सीमोल्लंघन हेतु जाते हैं । जहां शमी (जांटी अथवा खेजडा) का वृक्ष या अश्मंतक (कोविदार अथवा कचनार) का वृक्ष होता है, वहां रुक जाते हैं । (शमी (अपराजिता) तथा अश्मंतक, दोनोंका अर्थ है, `शत्रुओंका नाश करनेवाला ।')
शमीपूजन: निम्न श्लोकोंसे शमीकी प्रार्थना करते हैं ।
शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका ।
धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी ।।
करिष्यमाणयात्रायां यथाकाल सुखं मया ।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वंभवश्रीरामपूजिते।।अर्थ: शमी पापोंका शमन करती है । शमीके कांटे तांबेके रंगके होते हैं । शमी रामकी स्तुति करती है तथा अर्जुनके बाणोंको भी धारण करती हैं । हे शमी, रामने तुम्हारी पूजा की है । मैं यथाकाल विजययात्रापर निकलूंगा । तुम मेरी इस यात्राको निर्विघ्न व सुखकारक करो ।
अश्मंतकका पूजन: अश्मंतककी पूजामें इस मंत्रका जप करना चाहिए -
अश्मन्तक महावृक्ष महादोषनिवारण ।
इष्टानां दर्शनं देहि कुरु शत्रुविनाशनम् ।।अर्थ: हे अश्मंतक महावृक्ष, तुम महादोषोंका निवारण करनेवाले हो । मुझे मेरे मित्रोंका दर्शन करवाओ और मेरे शत्रुका नाश करो ।
तदुपरांत उस वृक्षके नीचे चावल, सुपारी व सुवर्ण (पर्यायसे तांबे) की मुद्रा रखते हैं । फिर वृक्षकी प्रदक्षिणा कर उसके मूलके पासकी थोड़ी मिट्टी व उस वृक्षके पत्ते घर लाते हैं ।
अश्मंतकके पत्तोंको सोनेके रूपमें देना: शमीके नहीं; अपितु अश्मंतकके पत्ते सोनेके तौरपर भगवानको अर्पण करते हैं व इष्टमित्रोंको देते हैं । बडे बुजुर्गोंको सोना दें, ऐसा संकेत है ।
अपराजितापूजन: जिस स्थानपर शमीकी पूजा होती है, उसी स्थानकी भूमिपर अष्टदल बनाकर अपराजिताकी मूर्ति रखते हैं व उसकी पूजा कर आगे दिए गए मंत्रद्वारा प्रार्थना करते हैं ।
हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला ।
अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम ।।अर्थ: गलेमें विचित्र हार धारण करनेवाली, कमरपर जिसके जगमगाती स्वर्णकरधनी (मेखला) है व (भक्तोंके) कल्याण हेतु जो तत्पर रहती है, ऐसी हे अपराजितादेवी मुझे विजयी करे । कुछ स्थानोंपर अपराजिताकी पूजा सीमोल्लंघन हेतु निकलनेसे पूर्व भी करते हैं ।
शस्त्र व उपकरणोंका पूजन: इस दिन राजा व सामंत-सरदार, अपने शस्त्रों व उपकरणोंको साफ कर व कतारमें रखकर उनकी पूजा करते हैं । उसी प्रकार किसान व कारीगर अपने औज़ारों व हथियारोंकी पूजा करते हैं । कुछ लोग यह शस्त्रपूजा नवमीके दिन भी करते हैं ।
राजविधान: दशहरा विजयका त्यौहार है, इसलिए इस दिन राजाओंके लिए विशेष विधान बताया गया है ।
३. श्रीराम, हनुमान तत्त्व तथा क्षात्रवृत्ति जागृत करनेवाला दशहरा
दशहरेके दिन ब्रह्मांडमें श्रीराम तत्त्वके तारक व हनुमान तत्त्वकी मारक तरंगोंका एकत्रीकरण होता है । दशहरेके दिन जीवका क्षात्रभाव जागृत होता है । इस क्षात्रभावसे ही जीवपर क्षात्रवृत्तिका संस्कार होता है । दशहरेके दिन श्रीराम व हनुमानजीके स्मरणसे जीवमें दास्यभक्ति निर्माण होकर प्रभु श्रीरामका तारक तत्त्व अर्थात् आशीर्वादरूपी तत्त्व प्राप्त होता है ।
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अधिक जानकारी हेतु अवश्य पढे सनातनका ग्रंथ -त्योहार धार्मिक उत्सव व व्रत |
सनातन संस्था विश्वभरमें धर्मजागृति व धर्मप्रसारका कार्य करती है । इसीके अंतर्गत इस लेखमें `दशहरेके दीन की जानेवाली धार्मिक कृतियां व उनका आधारभूत शास्त्र' इस विषयपर अंशमात्र जानकारी प्रस्तुत की गई है । अधिक जानकारीके लिए संपर्क करें: sanatan@sanatan.org

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