वस्तू अर्पित करते समय उसके मूल्य की अपेक्षा उस समय रखा गया भाव महत्त्वपूर्ण है ! – गुरु गोविंदसिंह

यमुना के पावन तटपर शिखों के दसवे एवं अंतिम गुरु गोविंदसिंह अपने अमृतवचनोंद्वारा श्रोतागणों के हृदय प्रफुल्लित कर रहे थे । Read more »

लालबहादुर शास्त्रीजी की तत्त्वनिष्ठता

श्री. लालबहादुर शास्त्रीजी कारावास में थे । कारागृह में कडा पहरा था । किसीसे भी मिलने की अनुमति नहीं दी जा रही थी । कठोर प्रयासों के उपरांत उनकी माता रामदुलारी अथवा पत्नी ललितागौरी इनमें से किसी एक को उनसे मिलने की अनुमति मिल पाई । Read more »

लालबहादुर शास्त्रीजी की सीधी रहन-सहन

भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्रीजी सरलता और महानता की प्रतिकृति थे ! उनके जीवन के अनेक प्रसंग प्रेरणाप्रद हैं । जब वे देश के प्रधानमंत्री थे तब की बात है । Read more »

स्वामी विवेकानंदजी की सीख

आप स्वामी विवेकानंदजी से तो अवश्य परिचित होंगे । वे रामकृष्ण परमहंस के परमशिष्य थे । दशदिशाओं में अध्यात्म की ध्वजा फहराते हुए उन्होंने जीवनभर अध्यात्म का प्रचार किया । विदेश में भी उनके प्रवचनों को बडी मात्रा में भीड लगी रहती थी । Read more »

स्वामी विवेकानंदजी का उनके सद्गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस के प्रति का भाव !

स्वामी विवेकानंदजी धर्मप्रसार के लिए भारत के प्रतिनिधी के रूप में ‘सर्व धर्म परिषद’के लिए शिकागो गए थे । वहां उपस्थित श्रोता गणों के मन जितकर वहां ‘न भूतो न भकिष्यति !’ ऐसा अद्भभूत प्रभाव डाला । वहा घटित एक प्रसंग इस कथा से देखेंगे । Read more »

धर्म-अधर्म के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण समान सारथी होने का ध्येय रखनेवाले स्वामी विवेकानंद

नरेंद्र ने (स्वामी विवेकानंदजी ने) केवल भारत में ही नहीं, अपितु पश्‍चिमी देशों में भी ‘सनातन धर्म’की ध्वजा फहरायी । उनकी बालक अवस्था मे घटित एक प्रसंग इस कथा से पढेंगे । Read more »

लोकमान्य तिलक !

‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है तथा मैं वह अवश्य प्राप्त करूंगा’ इस सुपरिचित वाक्य के कारण हम उन्हें ‘लोकमान्य ‘के नाम से जानते हैं; परंतु तिलकजी की वृत्ति बाल्यावस्था से ही निर्भयी एवं तेजस्वी किस प्रकार थी, यह हम इस कथा से समझ लेते हैं । Read more »