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त्याग

कुछ ७०-८० वर्ष पूर्व की कथा है । ६-७ वी कक्षा में पढनेवाला एक विनू नामक बालक था, जो एक भव्य भुवन में रहा करता था । उनके भुवन के आंगन में एक कटहल पेड था । एक दिन उस पेड को बडे-बडे कटहल लदे । दिनू की माता ने कटहल निकालकर मगज निकाले । तत्पश्चात उसने दिनू को पांच दोनें लाने के लिए कही । माता ने उन पांचों दोनों में थोडे-थोडे मगज डाले । यह देखकर दिनू को लगा कि अब पहला दोन मुझे ही मिलेगा । माताने कहा, ‘‘जाओ, यह दोन भगवानजी को चढाओ और प्रणाम कर आओ ।’’ विनू ने माता की आज्ञा का पालन किया । जब वह लौटा तो उसे लगा कि अब मां यह दूसरा दोन मुझे ही देगी ! उसी क्षण मां ने कहा, ‘‘बेटा, यह दोन पडोसवाली भाभी को दे आओ ।’’

तत्पश्चात रिक्त दो दोनों में से एक देते हुए मां ने कहा, ‘‘यह उस गली में रहनेवाली भाभी को दे आओ ।’’ माता का यह वर्तन देखकर अंत में विनू चिढा । सोचने लगा कि अब यह बचा हुआ दोन किस के लिए होगा ? तभी मां ने उस दोन का मगज विनू को खिलाया । विनू ने पूछा, ‘‘मां, हमारे घर का कटहल पहले सारे गांव को और बाद में मुझे ? आपने ऐसा क्यूं किया ?’’ मां ने कहा, ‘‘विनू बेटा, हमें कटहल किसने दिया ? उस पेडने । यह पेड हमारे आंगन में कैसे बढा ? ईश्वर ने ही दिया न ? तो क्या केवल हम ही उसके फल खाएंगे ?’’ मां की यह बात सुनकर उसके उपरांत कभी भी विनू ने ‘मैं, मुझे, मेरा..’ ऐसा नहीं किया; इसलिए वह विनू, आचार्य विनोबा भावे, जो ईश्वर के परमभक्त है, बन सके ! संस्कृत में रची भगवद्गीता का उन्होंने मराठी में अनुवाद किया । उसका गीताई नामकरण किया ।

बच्चो, हमें भी भगवानजी के समान बनना है न ? तब हम भी दूसरों की सहायता करेंगे, झगडा नहीं करेंगे । यदि हमें कुछ अच्छा मिलता है तो, दूसरों के साथ बाटेंगे ।