निरपेक्ष प्रेम ! 

भगवान श्रीकृष्‍ण

एक गांव में एक बूढी माई रहती थी । उसका इस संसार में कोई नहीं था । इसलिए वह अकेली ही अपना जीवन बिता रही थी ।
एक दिन उस गांव में एक साधु महाराज आए । बूढी माई ने भक्‍ति-भाव तथा प्रेम से उन साधु महाराज का आदर सत्‍कार किया । जब साधु महाराज जाने लगे तो बूढी माई ने कहा, ‘महात्‍मा जी ! आप तो ईश्‍वर के परम भक्‍त है । कृपा करके मेरा अकेलापन दूर करने का उपाय बताएं । मैं अकेलेपन से ऊब चुकी हूं ।

साधु महाराज ने मुस्‍कुराते हुए अपनी झोली से बाल-गोपालजी की एक मूर्ति निकाली और बूढी माई को देते हुए बोले, ‘माई, यह लो ! यह आपका बालक है, इसका अपने बच्‍चे की तरह प्रेम पूर्वक लालन-पालन करती रहना ।’

बूढी माई आनंद से झूम उठी । वह बडे लाड-प्‍यार से कान्‍हाजी का लालन-पालन करने लगी । कान्‍हाजी के आने से माई का सारा अकेलापन दूर हो गया था । उसका पूरा दिन कान्‍हाजी की सेवा में बीतने लगा ।

एक दिन गांव के कुछ शरारती बच्‍चों ने देखा कि माई एक मूर्ति को अपने बच्‍चे की तरह लाड-प्‍यार कर रही है । नटखट बच्‍चो ने माई का उपहास उडाया तथा बोले, ‘माई, जंगल से एक भेडिया गांव में घुस आया है, जो छोटे बच्‍चों को उठाकर ले जाता है और मारकर खा जाता है । तुम अपने लाल का ध्‍यान रखना, कहीं भेडिया इसे उठाकर ना ले जाए !’

बूढी माई ने अपने बाल-गोपाल को उसी समय कुटिया में विराजमान किया और स्‍वयं लाठी (छडी) लेकर दरवाजे पर पहरा देने बैठ गई । अपने लाल को भेडिये से बचाने के लिए बूढी माई भूखी-प्‍यासी दरवाजे पर पहरा देती रही । पहरा देते-देते एक दिन बीता, फिर दुसरा, तीसरा, चौथा और पांचवा दिन बीत गया । बूढी माई पांच दिन और पांच रातें लगातार, बगैर पलके झपकाए अपने बाल-गोपाल की भेडिये से रक्षा करने के लिए पहरा देती रही ।

उस भोली-भाली माई का यह भाव देखकर, भगवान श्रीकृष्‍णजी का ह्रदय प्रेम से भर गया । अब उन्‍हें माई का प्रेम प्रत्‍यक्ष रूप से पाने की इच्‍छा हुई ।

भगवानजी ने बहुत ही सुंदर रूप धारण किया और वस्‍त्र आभूषणों से सुसज्‍जित होकर माई के पास आए । भगवानजी की आहट पाकर माई डर गई । उसे लगा कि दुष्ट भेडिया उसके लाल को उठाने आ गया है । माई ने लाठी उठाई और भेडिये को भगाने के लिये उठ खडी हुई ।

तब भगवानजी ने कहा, ‘माई मैं हूँ ! मैं तेरा वही बालक हूं, जिसकी तुम रक्षा कर रही हो !’

माई ने कहा, यह नहीं हो सकता, तुम जहां से आए हो वहीं लौट जाओ ।’ मैं तुम्‍हें अपनी कुटिया में घुसने नहीं दूंगी । मेरे लाल के समान इस संसार में कोई दूसरा हो ही नहीं सकता ।

भगवानजी माई का यह भाव और एकनिष्ठता देखकर और अधिक प्रसन्‍न हो गए । भगवान अपने वास्‍तविक रूप में प्रकट हो गए और बोले, ‘मेरी भोली माई, मैं श्रीकृष्‍ण हूं, मैं तुम्‍हारी भक्‍ति से बहुत प्रसन्‍न हूं, मुझसे जो चाहे वर मांग लो ।’ यह सुनकर माई भगवान श्रीकृष्‍ण के चरणों में गिर पडी और बोली, ‘मैं आपको सौ-सौ प्रणाम करती हूं ! आप मेरे प्रिय लाल की भेडिये से रक्षा कीजिए । अब ठाकुर जी और अधिक प्रसन्‍न होते हुए बोले, ‘चलिए माई, मैं आपको और आपके लाल को अपने निज धाम लिए चलता हूं, वहां भेडिये का कोई भय नहीं है । इस तरह प्रभु बूढी माई को अपने निज धाम ले गए ।

इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि, भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग है, भगवान को सच्चे मन से प्रेम करो । निरपेक्ष प्रेम अर्थात कोई भी कामना न रखकर किया जानेवाला प्रेम, जैसे बूढी माई ने किया । इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि भगवान से निष्‍काम प्रेम करने से वे कितना प्रसन्‍न होते हैं । भगवान को केवल सच्‍चा प्रेम और भक्‍ति ही अच्‍छी लगती है । भगवान से बूढी माई जैसा सच्‍चा प्रेम करने से साक्षात भगवान मिल जाते हैं ।